Sign up now for a
Free Email Account &
your own Online
Writing Portfolio!
Username:
Password:  
Sponsored Links

Click Here To Bid  

Read a Newbie
Badges
Reviewing
Presented To:
Dr M C Gupta

Testimonials
Tell a Friend
Know someone who'd
like this page?

Email Address:

Optional Comment:

Who's Online?
Members: 513    
Guests: 594    

   
Total Online Now: 1107    
Writing.Com Time

Tuesday
February 14, 2012
6:39pm EST


  >> Book >> Cultural >> ID #1510158  |   Show DetailsPrinter Friendly Page Tell A Friend
HINDI POEMS-1, गज़ल
Hindi poems in Hindi script, mainly ghazals, Serial no. 1-700
Rated:
E
by
This item has no ratings.
Entry #626919, added on 12-31-08 @ 12:43 am EST
   Entry Access Restriction: None.
Poems / ghazals , no. 626- 650 in Hindi scriptEntry #626919



६२६. आप से तुम और फिर वो तुम से तू पर आ गये -- २३ दिसम्बर की गज़ल, ईके को २३-१२-०६ को प्रेषित


आप से तुम और फिर वो तुम से तू पर आ गये
प्यार ज्यों बढ़ता गया वो मेरे दिल पे छा गये

वो हसीं तो हैं मगर उन की नज़ाकत क्या कहें
हम ने जो आंखों से छूआ किस कदर शरमा गये

एक दिन ऐसा हुआ कि राह में वो मिल गये
नाम जो हौले से पूछा मुफ़्त में घबरा गये

दिन-ब-दिन बढ़ता गया यूं उन के चेहरे का शबाब
बाद मुद्दत आज जो देखा तो धोखा खा गये

क्या कयामत है कि चल के आज खुद आये हैं पास
प्यार में उन के खलिश हम आज सब कुछ पा गये.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१९ दिसम्बर २००६






ऎड





६२७. मुझे क्या इस जहां से वास्ता मैं तो अकेला हूं-- २१ दिसम्बर की गज़ल, ईके को २१-१२-०६ को प्रेषित---RAMAS


मुझे क्या इस जहां से वास्ता मैं तो अकेला हूं
ग़मों के साये से ही आज तक दुनिया में खेला हूं

खु़शी अब खु़श नहीं करती असर ग़म का नहीं होता
न अब दिल ही धड़कता है अजब कोई झमेला हूं

सिवा इन चन्द अशआरों के क्या दूं और मैं तुमको
कमा पाया न दुनिया में, बचा पाया न धेला हूं

न रंगो-बू है कुछ मुझ में, न घर है न ठिकाना है,
लहर हूं इक समन्दर की, हवा का एक रेला हूं

वज़ूद अपना मुझे मालूम है, हूं राग दो सुर का
न जाने खत्म हो किस पल, ख़लिश साँसों का मेला हूं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१९ दिसम्बर २००६








६२८. दिल ही न हो सीने में तो क्या अश्कों का काम यहां-- २० दिसम्बर की गज़ल, ईके को २०-१२-०६ को प्रेषित--RAMAS

दिल ही न हो सीने में तो क्या अश्कों का काम यहां
रुसवाई से डरना कैसा जीना है गु़मनाम यहां

चप्पे-चप्पे कांटे हैं और अंगारे हैं राहों में
बच कर इनसे चल पाया है बिरला ही दो गाम यहां

अदब निभाओ, मीठा बोलो, चाहे सबकी मदद करो
पर नेकी का भूले से भी मत ढूंढो अंज़ाम यहां

जाओ बुज़ुर्गों से पूछो कि बेकदरी क्या होती है
उम्र बढ़े है ज्यों अपने ही घर में गिरता दाम यहां

खुशियां हैं न ग़म है कोई, अश्क नहीं न आहें हैं
धड़कन दिल में कोई नहीं, है ख़लिश बहुत आराम यहां.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१९ दिसम्बर २००६

0000000000000000000

from Devi Nangrani <devi1941@yahoo.com>
date Dec 22, 2006 7:17 PM

Maheshji
Sachai se mulakaat karwane ke liye ek uttam prayas hai. Anokh
madhyam hai kavita jo dil ki baat shabdoN mein pirokar prastut karti
hai
Daad kabool ho
Devi

0000000000000000







६२९. मैं जश्न क्या मनाऊं नये साल का हुज़ूर, मैं साल देखता नये पुराना हो चला-- २२ दिसम्बर की गज़ल, ईके को २२-१२-०६ को प्रेषित


मैं जश्न क्या मनाऊं नये साल का हुज़ूर, मैं साल देखता नये पुराना हो चला
तीन सौ पैसंठ कदम उठा के थक गया, कहने को नया साल था पुर-शान जो चला

अपना ही घर अपना ही दिल अपने ही हों असूल, तब ही बशर सुकून पाता है जहान में
था गम से दूर मैं भले तनहा जिया किया, तुम मिल गये तो अपना चैन-ए-दिल ही खो चला

मैं तो तुम्हारी चाह में बर्बाद हो गया, मेरी वफ़ा में तुम को ज़फ़ा ही दिखाई दी
होता न मैं तो रहते तुम सभी गमों से दूर, मैं जाते जाते तोहमतें ऐसी भी ढो चला

तुम हो जवान लुत्फ़ जीने का मनाओ खूब, ये हड्डियां नहीं हैं नाच कूद के लायक
तुम को हज़ार बार मुबारक हो नया साल, मेरा है साल आखिरी दुनिया से लो चला

न हसरत-ओ- शिकवा न जीने की मुझे उम्मीद, करना मुआफ़ हर खता जो मुझ से हो गयी
आवाज़ न देना कि अब मैं आ न पाऊंगा, है शब-ए-ज़िन्दगी खलिश मैं आज सो चला.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२२ दिसम्बर २००६

००००००००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com
date Dec 22, 2006 12:37 PM

Khalih Bhai, apki gazal acchi hai, aakhri sheyer umda hai. LEKIN naye saal par aapki udasi mujhe bha nahin rahi hai. Jab rassi ka aakhri kinara khatam ho jaye khudaa apna hath dikha raha hota hai. THAAM LO KHUDAA ka hath, aur fir jano PAYAR KAYA HOTA HAI> APKE LIYE KHAAS

००००००००००००००००००००









६३०. मैं चला जाता हूँ लेकिन कोई भी मन्ज़िल नहीं -- ३ जनवरी की गज़ल, ईके को ३-१-०७ को प्रेषित

मैं चला जाता हूँ लेकिन कोई भी मन्ज़िल नहीं
हो गया हूं कत्ल लेकिन कोई भी कातिल नहीं

खुद पे कुछ काबू नहीं जब से दिया है दिल उन्हें
इश्क तो करता हूँ मेरे सीने में अब दिल नहीं

प्यार जो मिल जाये सच्चा तो न कीमत देखिये
मैं लुटा बैठा जो सब कुछ, था कोई गाफ़िल नहीं

किस तरह इंसाफ़ करने का भला मैं दम भरूँ
मेरे सीने में भी दिल है, मैं कोई आदिल नहीं

कुछ समझ आता नहीं ये नये ज़माने का चलन
दीजिये रुखसत खलिश को अब रहा काबिल नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२३ दिसम्बर २००६

000000000000000

from harsh_y71 <harsh_y71@hotmail.com reply-to ekavita@yahoogroups.com
to ekavita@yahoogroups.com
date Jan 6, 2007 4:31 PM



+++++ जाने ना देंगे हम, प्यारे से इस दिलदार को, +++++

जाने ना देंगे हम, प्यारे से इस दिलदार को,

रूखसत ना मांग खलिश, तू कोई गाफिल नहीं.

इश्क कर बैठा है तू मासूम सच्चे प्यार से,
अहमक है जो कहता, सीने में मेरे दिल नहीं

खुद पे काबू रहेगा कैसे, दिल लुटाया है जब उसे,
तेरे सीने में भी दिल है, तू कोई कातिल नहीं ।

हर्ष

0000000000000000

from S.M.Chandawarkar <chandawarkar@vsnl.net
date Jan 4, 2007 2:42 PM

डॉ. गुप्त जी,

रुख़सत तो देंगे, इस लिए नहीं कि आप काबिल नहीं रहे
मगर इस लिए कि साहबजादे की शादी में आप मुश्तग़िल रहें
उन को पहूंचाइए हमारी चुनीदा मुबारकबादें, बराहे करम
जल्द लौट आना, कि बज़्मे शुअरा में करते हैं इन्तेज़ार हम

चिरंजीव डॉ. नमित को अनेक शुभ कामनाएं!

सस्नेह
सीताराम चंदावरकर

०००००००००००००००

















६३१. इन प्यार की मीठी राहों में कुछ तल्ख ज़माने देखे हैं-- १ जनवरी की गज़ल, ईके को २-१-०७ को प्रेषित --RAMAS

इन प्यार की मीठी राहों में कुछ तल्ख ज़माने देखे हैं
रहने के गै़र की बाहों में रंगीन बहाने देखे हैं

वो कसम वफ़ा की खाते हैं और भरी ज़फ़ा है फ़ितरत में
रातों को रहने के उन के नापाक ठिकाने देखे हैं

हम कभी फ़लक पर रहते थे और आज गिरे हैं धरती पर
ज़ोरे-उल्फ़त में हमने भी कुछ ख्वाब सुहाने देखे हैं

कुछ नग़मे सुन कर अश्कों का थमना मुश्किल हो जाता है
जो दुखिया दिल को बहला दें, पुरकशिश तराने देखे हैं

जब मेरी कश्ती डूबी तो अनजान बचाने वाले थे
अपने भी ख़लिश ज़रूरत पर होते बेगाने देखे हैं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२३ दिसम्बर २००६

०००००००००००

from Anoop Bhargava <anoop_bhargava@yahoo.com
date Jan 2, 2007 7:56 PM
subject < Khalish sahab > Re: [ekavita] ६३१. इन प्यार की मीठी राहों में कुछ तल्ख ज़माने देखे हैं-- १ जनवरी की गज़ल

खलिश साहब:

नये साल की शुरुआत आप नें एक खूबसूरत गज़ल से की है ।

ये बात अलग है टूट गये जब गिरे फ़लक से धरती पर
हमने भी उल्फ़त में खो कर कुछ ख्वाब सुहाने देखे हैं

नया वर्ष आप को मंगलमय हो ..

सादर

अनूप

००००००००००

harsh_y71 <harsh_y71@hotmail.com
date Jan 2, 2007 7:03 PM

Bhai Mahesh Ji,

Aap la-jawaab hai.n. Bahut hi sundar rachna ke liye dher saari Badhai.

Ye linai.n bahut achhi lagi.

कुछ नगमे सुन कर अश्कों का थमना मुश्किल हो जाता है
रोता दिल सुन के झूम उठे, ऐसे भी तराने देखे हैं

जब कश्ती डूबी खलिश मुझे अनजान बचाने वाले थे
जो थे अपने वो ऐन वक्त होते बेगाने देखे हैं.

Harsh

००००००००००००००००







६३२. है शुक्रिया कि एक बार हम से वो मिले-- २५ दिसम्बर की गज़ल, ईके को २५-१२-०६ को प्रेषित


है शुक्रिया कि एक बार हम से वो मिले
कुछ गम नहीं अगरचे सिर्फ़ जाने को मिले

उम्र भर करते रहे हम जिनका इन्तज़ार
मरने से पहले एक बार आ के तो मिले

मर जाये बूढ़ा जल्द है औलाद की दुआ
हिस्सा उसे भी अपना वसीयत में जो मिले

बिरहा की आग में झुलसते दो दिल-ओ-बदन
मुद्दत के बाद जो मिले हर लाज खो मिले

नज़रें चुराये जा रहे थे हम से अब तलक
हो कर के बेनकाब खलिश आज लो मिले.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२३ दिसम्बर २००६










६३३. अब कोई दिल में लहर आती नहीं-- ३१ दिसम्बर की गज़ल, ईके को २-१-०७ को प्रेषित --RAMAS


अब कोई दिल में लहर आती नहीं
इक उदासी है कि अब जाती नहीं

दोस्ती जब से खिज़ाओं से हुई
अब फ़िज़ां दिल में खुशी लाती नहीं

दिल मेरा तनहाई में लगने लगा
शय कोई रंगीन अब भाती नहीं

हैं पिया परदेस, मैं तड़पूं यहां
कोई सन्देसा नहीं, पाती नहीं

यूं ख़लिश दिल में अन्धेरे छा गये
रोशनी दिल में जगह पाती नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२३ दिसम्बर २००६







६३४. न प्यार जता पाये अपना चाहे मौके सौ बार पड़े-- २४ दिसम्बर की गज़ल, ईके को २४-१२-०६ को प्रेषित


न प्यार जता पाये अपना चाहे मौके सौ बार पड़े
डरते थे सिर पर जूती हो, न गलबहियों का हार पड़े

औरत कमाऊ जो चाहते हैं क्या कहिये ऐसे मर्दों को
बीबी की तनख्वाह को पी कर शौहर घर में बेकार पड़े

माँ बाप पिसे जब चक्की में तो घर में दौलत आई थी
बूढ़ों की सुनता नहीं कोई लुटते देखें लाचार पड़े

बीबी बच्चे नाराज़ कि घर को वक्त नहीं देते हो तुम
दिन भर सुनते हैं ये ताने हम क्यों ऐसे व्यौपार पड़े

है खलिश झमेला शादी का न करते तो ही अच्छा था
न छोड़ सकें न निभा सकें कुछ ऐसे हम मझधार पड़े.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२३ दिसम्बर २००६












६३५. आए दिन वो प्यार की कसमें बहुत खाते रहे-- ३० दिसम्बर २००६ की गज़ल, ईके को ३१-१२-०६ को प्रेषित


आए दिन वो प्यार की कसमें बहुत खाते रहे
पर वफ़ा की राह से उन के कदम जाते रहे

वो हमें देते रहे अपनी ज़फ़ाओं के सबूत
देख कर भी हम हकीकत हाय झुठलाते रहे

लुट रहा था धीरे धीरे मेरी उल्फ़त का जहां
बेखबर नगमा मोहब्बत का मगर गाते रहे

है बहुत मुश्किल निभाना छोड़ भी सकते नहीं
तोड़ दें नाता कि रखें, दिल को उलझाते रहे

जानते थे ज़िन्दगी बाकी बची है चार दिन
बेफ़िकर हो कर खलिश हर शौक फ़रमाते रहे.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२४ दिसम्बर २००६








६३६. आये थे दिल लगाने दिल जला के चल दिये-- २९ दिसम्बर २००६ की गज़ल, ईके को ३१-१२-०६ को प्रेषित


आये थे दिल लगाने, दिल जला के चल दिये
हम ने न कुछ कहा वो तिलमिला के चल दिये

सोचा किये पिलायेंगे मय-ए-शबाब वो
तलखियों के घूंट वो पिला के चल दिये

ज़न्नत की इक परी जिन्हें समझा किये थे हम
दोज़ख की याद हम को वो दिला के चल दिये

दरयादिली पे उन की जितना इतमिनान था
झटके से एक ज़ुल्फ़ के हिला के चल दिये

ज़ाहिर न हम पे की खलिश कोई भी अपनी बात
हम से वो दिल के राज़ सब खुला के चल दिये.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ दिसम्बर २००६

०००००००००

S.M.Chandawarkar <chandawarkar@vsnl.net
date Jan 2, 2007 4:49 PM
subject Re: [ekavita]६३६. आये थे दिल लगाने दिल जला के चल दिये-- २९ दिसम्बर २००६ की गज़ल


डॉ. गुप्त जी
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल!

ज़न्नत की एक परी जिन्हें समझा किये थे हम
दोज़ख़ की याद हम को वो दिला के चाल दिये
आप के इस शेर से वहीद अखतर साहब की ग़ज़ल याद आई, जिसे आप की नज़र पेश कर रहा हूं :

जिस को माना था खुदा, मिट्टी का पैकर निकला
हाथ जो आया था यक़ीं, वहम सरासर निकला

कल जहां ज़ुल्म ने काटीं थीं सरों की फ़सलें
नम हुई तो उशी खाक से लश्कर निकला

ठिठरी थी हर शाख खिज़ां थी जब तक
फ़स्ले गुल आई तो हर शाख से खंज़र निकला

दूरियां संग से भी शम'अ बना लेती हैं
छूके देखा तो जो दिल मोम था, पत्थर निकला

हर पयंबर से सहीफ़े का तक़ाज़ा न हुआ
हक़ का यह क़र्ज़ निकला तो हमीं पर निकला

सस्नेह
सीताराम चंदावरकर




६३७. पत्थर से हम चलते हुए ठोकर जो खा गये-- २६ दिसम्बर २००६ की गज़ल, ईके को २६-१२-०६ को प्रेषित

गुल देहलवी साहिब ने एक शेर लिख भेजा था—

सूरज की क्या खता है अगर जिस्म जल गया
तुम भी तो ऐ गुल शम्म जलाने कहां गये

यह कुछ इस कदर पसन्द आया कि इस की तर्ज़ पर एक गज़ल लिखने की मन में हूक सी उठी. पेश है. उम्मीद है गुल साहिब गुस्ताखी माफ़ करेंगे.

***

पत्थर से हम चलते हुए ठोकर जो खा गये
मालूम तब हुआ कि गल्त राह आ गये

वो जानते थे हम को है तौबा शराब से
मय फिर भी हम को जाम-ए-लब से वो पिला गये

जो उन से मिल के हम चले तो था ग़रूर यूं
मानो कि फ़तह कर के हम कोई किला गये

बेपरदा हो के आज वो बाहों में आये हैं
कर के हमारा खत्म सब शिकवा-गिला गये

गम के अन्धेरे छा रहे थे दिल के आस पास
आ के खलिश वो दिल में इक शम्म जला गये.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ दिसम्बर २००६









६३८. किस के लिये जिऊं मेरा कोई यहां नहीं-- २७ दिसम्बर २००६ की गज़ल, ईके को ३०-१२-०६ को प्रेषित


किस के लिये जिऊं मेरा कोई यहां नहीं
सब हैं पराये दोस्ती लायक जहां नहीं

दर दर पे ढूंढता रहा ता-उम्र मैं उसे
जिस दर भी मैं गया मिला कोई वहां नहीं

बिछुड़ा जो एक बार न मुझ से कभी मिला
भटका किया तलाश में उस की कहां नहीं

थी कौन सी घड़ी कि यार से जुदा हुआ
है कौन सा वो दर्द जो मैंने सहा नहीं

न आयेगा पलट के वो नाहक है इन्तज़ार
फ़ितरत का राज़ उस का खलिश से निहां नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ दिसम्बर २००६









६३९. हम ने खुद ही ज़िन्दगी कितने गमों से सान ली -- २८ दिसम्बर २००६ की गज़ल, ईके को ३०-१२-०६ को प्रेषित


हम ने खुद ही ज़िन्दगी कितने गमों से सान ली
ज़िन्दगी है नाम-ए-गम ये बात हम ने जान ली

ज़िन्दगी की तल्खियां कुछ इस कदर बढ़ती गईं
इस जहां को अलविदा कहने की हम ने ठान ली

वो ये कहते हैं ज़हर दे दो हमें खुद हाथ से
कैसे कह दें ये तुम्हारी बात हम ने मान ली

बारहा वादा वफ़ा का दिन-ब-दिन करते रहे
हम ने उन की असलियत अच्छी तरह पहचान ली.

दर्द हद से बढ़ गया तो शुक्रिया मय का खलिश
गम भुला के सो गये ऊपर से चादर तान ली.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ दिसम्बर २००६









६४०. नव वर्ष की कामना-- २ जनवरी की गज़ल, घनश्याम गुप्त जी के ६१वें जन्मदिन पर समर्पित एवं ईके को २-१-०७ को प्रेषित


दर्द-ए-दिल होता रहे
अश्रु जल बहता रहे
लेखनी चलती रहे
काव्य उमड़ता रहे

युग समय चलता रहे
काल बदलता रहे
जीर्ण क्षय होता रहे
सूर्य नव उगता रहे

भाव नये उठते रहें
भावना जवां रहे
कल्पनाओं का प्रवाह
छन्द में ढलता रहे

वर्ष है नया खलिश
न्याय का चलन बढ़े
शांति व्यापती रहे
आततायी न रहे.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२ जनवरी २००७








६४१. ज़िन्दगानी की झलक कोई नज़र आती नहीं-- ४ जनवरी की गज़ल, ईके को ६-१-०७ को प्रेषित

ज़िन्दगानी की झलक कोई नज़र आती नहीं
आस जीने की मगर दिल से अभी जाती नहीं

गो कि गुल कांटों के ही दम पे बड़े महफ़ूज़ हैं
खार की जानिब कली कोई भी मुस्काती नहीं

हो गया है इस कदर सस्ता चलन-ए-शायरी
दाद संज़ीदा कलम है आजकल पाती नहीं

ज़िन्दगी भर झेलने के बाद लाखों गम सितम
आंख में मेरी नमी अब कोई झलकाती नहीं

बज़्म-ए-शुअरा छोड़ कर किस बज़्म मैं जाऊं खलिश
एक गज़ल को छोड़ कोई और शय भाती नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
६ जनवरी २००७








६४२. मेरी तनहाई में आ कर मुझे क्योंकर सताते हो—३० जुलाई ०७की गज़ल, ईके को ३०-१-०७ को प्रेषित


मिरी तनहाई में आ कर मुझे क्योंकर सताते हो
नहीं मिलना अगर तो क्यों मेरे ख्वाबों में आते हो

यूं ही गम के अन्धेरों में मेरे दिल को भटकने दो
किरण क्यों सिर्फ़ पल भर को मुझे झूठी दिखाते हो

कंवल खिलता नहीं दिल का कि अब मुरझा गया हूं मैं
सिरफ़ इक टीस उठती है कि जब तुम मुस्कराते हो

वफ़ा तुम न निभा पाये मुझे शिकवा नहीं कोई
ज़फ़ा करने का क्यों इलज़ाम तुम मुझ पर लगाते हो

कभी का छोड़ आया हूं खलिश उम्मीद की दुनिया
मेरे सीने में नाहक आस क्यों आ कर जगाते हो.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७



एद
मेरी तन्हाई में ग़म ही मेरे दिल को लगाते हैं
कभी न हो सके अपने जो अकसर याद आते हैं

फ़कत मिलना था दो दिन का, तड़पना उम्र भर का है
गुज़ारे थे जो उन के संग वो लमहे सताते हैं

कभी मिलने नहीं आते पलट कर छोड़ने वाले
मग़र बीते हुए लमहे हमें अकसर बुलाते हैं

मैं होता हूं अकेला जब, कभी ऐसा भी होता है
वो मीठी तान हौले से मुझे आ कर सुनाते हैं

अन्धेरा दिल भी हो जाता है थोड़ी देर को रौशन
ख़लिश ख़्वाबों में आ के वो कभी जब मुस्कराते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
७ जनवरी २००७




६४३. मेरी तनहाई में गम ही मेरे दिल को लगाते हैं—ईके को २४-१-०७ को प्रेषित--RAMAS

मेरी तन्हाई में ग़म ही मेरे दिल को लगाते हैं
कभी न हो सके अपने जो अकसर याद आते हैं

फ़कत दो दिन का मिलना था तड़पना उम्र भर का है
गुज़ारे थे जो उनके संग वो लमहे सताते हैं

कभी मिलने नहीं आते पलट कर छोड़नेवाले
मग़र बीते हुए लमहे हमें अकसर बुलाते हैं

अकेला जब मैं होता हूं कभी ऐसा भी होता है
वो मीठी तान हौले से मुझे आकर सुनाते हैं

अन्धेरा दिल भी हो जाता है थोड़ी देर को रौशन
ख़लिश ख्वाबों में आके वो कभी जब मुस्कराते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
७ जनवरी २००७








६४४. उल्फ़त से बढ़ कर दुनिया में कुछ काम अहमतर होते हैं—१८ जनवरी की गज़ल, ईके को १८-१-०७ को प्रेषित

उल्फ़त से बढ़ कर दुनिया में कुछ काम अहमतर होते हैं
फूलों की सेज किसी को है कांटों पर कोई सोते हैं

माना कि गल्त कमाई से कुछ मना रहे हैं रंगरलियां
कानून यही है दुनिया का काटें उस को जो बोते हैं

कुछ करें इबादत मस्जिद में कुछ पूजें धन और दौलत को
जो रमते हैं इस दुनिया में दूजी दुनिया को खोते हैं

जिस ने अल्लाह का नाम लिया वह भवसागर से पार हुआ
जो बशर भुलाते हैं उस को वो जग में खाते गोते हैं.

है खलिश खुदा का फ़ज़ल कि उस ने बख्शी बहुत नियामत हैं
क्यों मिला पड़ोसी को ज्यादा कोई यही सोच कर रोते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७





६४५. नफ़रत झलक रही है साफ़ उन की दाद में—१६ जनवरी की गज़ल, ईके को १७-१-०७ को प्रेषित

नफ़रत झलक रही है साफ़ उन की दाद में
जैसे मिला रहे ज़हर गुलशन की खाद में

जब से दिया है दिल गमों की आ गयी बहार
करने से पहले इश्क गो रहता था शाद मैं

है वक्त-ए-जवानी फ़कत उल्फ़त के वास्ते
कर लेंगे इबादत कभी फ़ुर्सत से बाद में

चाहते हो राह-ए-इश्क से हट जाएं डर के हम
ललकारते हो शेर को क्यों उस की मांद में

न अब पलट के आएंगे वो भूल जा खलिश
बेहाल बन गया है तू क्यों उन की याद में.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७





एद
सुनता नहीं है जब कोई तो बोलता है क्यों
आहों से काम ले, जु़बान खोलता है क्यों

शिकवे-शिकायतों से कुछ हासिल न हो सका
सह दर्द, अपने फ़र्ज़ से तू डोलता है क्यों

है कौन जो आंसू भी तेरी आंख के पौंछे
मोती ये कीमती पलक पे तोलता है क्यों

दिल का ज़हर ज़ुबान के रस्ते निकाल दे
अल्फ़ाज़ में झूठा शहद तू घोलता है क्यों

आये न वो ख़लिश किया ता-उम्र इन्तज़ार
जो चार दिन बचे हैं उन्हें रोलता है क्यों.






६४६. सुनता नहीं है जब कोई तो बोलता है क्यों—१० जनवरी की गज़ल, ईके को १०-१-०७ को प्रेषित --RAMAS

सुनता नहीं है जब कोई तो बोलता है क्यों
आहों से काम ले, जु़बान खोलता है क्यों

शिकवे-शिकायतों से कुछ हासिल न हो सका
सह दर्द, अपने फ़र्ज़ से तू डोलता है क्यों

है कौन जो आंसू भी तेरी आंख के पौंछे
मोती ये कीमती पलक पे तोलता है क्यों

दिल का ज़हर ज़ुबान के रस्ते निकाल दे
अल्फ़ाज़ में झूठा शहद तू घोलता है क्यों

आये न वो ख़लिश किया ता-उम्र इन्तज़ार
जो चार दिन बचे हैं उन्हें रोलता है क्यों.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७

०००००००

from smullick@comcast.net <smullick@comcast.net
date Jan 11, 2007 3:08 AM
subject Re: [ekavita] ६४६. सुनता नहीं है जब कोई तो बोलता है क्यों—१० जनवरी की गज़ल

bahut sunder, Gupta ji.

०००००००००००००००००




६४७. मैं प्रीत लगा के हार गया—९ जनवरी का नगमा, ईके को १०-१-०७ को प्रेषित

मैं प्रीत लगा के हार गया
कितनी टेढ़ी ये गलियां हैं

डूबे है कभी दिल की कश्ती
है कभी वस्ल की शब हंसती
गम हैं तो कभी रंगरलियां हैं

मैं प्रीत लगा के हार गया
कितनी टेढ़ी ये गलियां हैं

शिकवे हैं कभी ज़फ़ाओं के
वादे हैं कभी वफ़ाओं के
हैं खार कभी तो कलियां हैं

मैं प्रीत लगा के हार गया
कितनी टेढ़ी ये गलियां हैं

जो हैं रंगीन मुलाकातें
जैसे हैं खंजर की घातें
ज़हरीली मीठी फलियां हैं

मैं प्रीत लगा के हार गया
कितनी टेढ़ी ये गलियां हैं

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७







६४८. कभी मिलना हमारा भी किसी कातिल से हो जाये—८ जनवरी की गज़ल, ईके को ९-१-०७ को प्रेषित


कभी मिलना हमारा भी किसी कातिल से हो जाये
हमारा दिल किसी की झील सी आंखों में खो जाये

पता रहता नहीं मन्ज़िल का राहों में मोहब्बत की
न बाहर आ सके इक बार इन गलियों में जो जाये

मेरे ख्वाबों में बीते दिन मुझे आ के रुलाते हैं
न मेरी आंख नम हो ऐसी कोई शाम तो जाये

चला जाता हूं मन्ज़िल का नहीं हूं मुन्तज़िर लेकिन
न जाने किस घड़ी हौले से चलती सांस सो जाये

करम फल भोगना लाज़िम है इस दुनिया में इन्सां को
करम का बीज गर पिछले जनम में कोई बो जाये.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७









२५५. हमें मालूम न था एक दिन ऐसा भी आयेगा-- ५ जनवरी की [गैरमुरद्दफ़] गज़ल, ईके को ८-१-०७ को प्रेषित

हमें मालूम न था एक दिन ऐसा भी आयेगा
हमारी बेबसी पर ये ज़माना मुस्करायेगा

खबर न थी कि राह-ए-इश्क में वो दिन बदा होगा
ज़फ़ा कर के हमारा यार खुद तोहमत लगायेगा

न सोचा था कि दिल के हाथ हम मज़बूर यूं होंगे
हमारा दिल बयां राज़-ए-मोहब्बत कर न पायेगा

नहीं मिल पाये तो क्या गम खुदा हाफ़िज़ मेरे हमदम
हमारा प्यार अगले जन्म में हम को मिलायेगा

यही किस्मत है आशिक की बहाये प्यार में आंसू
गम-ए-दिल को खलिश गम ही सुकूं आखिर दिलायेगा.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२२ फ़रवरी २००६







६४९. ज़िन्दगानी का ये मेला यूं ही चलता जायेगा-- ६जनवरी की गज़ल, ईके को ९-१-०७ को प्रेषित


ज़िन्दगानी का ये मेला यूं ही चलता जायेगा
कीजिये कोशिश मगर कोई बदल न पायेगा

बाट क्यों तुम डाकिये की जोहते हो दिन-ब-दिन
कोई खुश-खबरी तुम्हारे वास्ते न लायेगा

जो ज़फ़ा करते हैं उन से क्यों वफ़ाओं की उम्मीद
कौन दर्द-ए-मौत कातिल को भला समझायेगा

चल रहा है राह-ए-दौलत पे ज़माना आजकल
जो चलेगा राह-ए-दिल वो ठोकरें ही खायेगा

किसलिये दुनिया के गम से दिल दुखाते हो खलिश
कोई भी आंसू तुम्हारे पौंछने न आयेगा.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७







६५०. ज़िन्दगी की शाम का अन्ज़ाम मतवाला रहा—७ जनवरी की गज़ल, ईके को ९-१-०७ को प्रेषित

ज़िन्दगी की शाम का अन्ज़ाम मतवाला रहा
एक मेरी बोतल बची और एक मेरा प्याला रहा

हो गया अपने ही घर में अजनबी मेरा वज़ूद
न ये मेरा घर रहा और न मैं घर वाला रहा

पार्टी क्लब में मनाते रोज़ घर वाले मगर
बन के कुत्ता दर पे मैं मानिन्द-ए-रखवाला रहा

मत चबाओ पान गुटका सब नसीहत दे गये
ढल गया कैन्सर में वो जो सिर्फ़ इक छाला रहा

टैक्स में सब कट गया जितना भी पैसा था सफ़ेद
पास में मेरे खलिश रुपया सिरफ़ काला रहा.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
७ जनवरी २००७

०००००००००००००००००

from Shyamal Kishor Jha <shyamalsuman@yahoo.co.in>
date Jan 12, 2007 6:33 AM

हो गया अपने ही घर में अजनबी मेरा वजूद।
एक मेरी बोतल बची और एक मेरा प्याला रहा।।

क्या बात है खलिश साहब। बहुत ही बेहतरीन ढंग से आपने सजाया है। बधाई।

कुछ इसी तरह के भाव लिये मेरे स्थानीय मित्र उदय प्रताप हयात की कुछ पंक्तियां पेशे नजर हैः

तन्हाईयों से दिल्लगी अपने मकान में।
हम हो गये हैं अजनबी अपने मकान में।।

होता है उनका सामना हर शाम आपसे।
मिलते नहीं हैं मिल के भी अपने मकान में।।

आदर सहित
श्यामल सुमन

०००००००००००००००००

from Renu Ahuja <renu_poetry@yahoo.co.in
date Jan 15, 2007 11:42 AM

हो गया अपने ही घर में अजनबी मेरा वज़ूद
न ये मेरा घर रहा और न मैं घर वाला रहा

वाह क्या बात है खलिश साहब, " न मैं घर वाला रहा".....अपने ही वजूद को अपने घर की दीवारों में ढूंढने की तड़्प को क्या खूब अर्ज़ किया है आपने, बस यही जज़्बा एक इंसान को शायर की पदवी दिला देता है,

शुभांकांक्षी
-श्रीमति रेणू आहुजा.


--------------------------------------------------------------------------------





© Copyright 2008 Dr M C Gupta (UN: mcgupta44 at Writing.Com). All rights reserved.
Dr M C Gupta has granted Writing.Com, its affiliates and its syndicates non-exclusive rights to display this work.


Log In To Leave Feedback
Username:
Password:
Not a Member?
Signup right now, for free!

All accounts include:
*Bullet* FREE Email @Writing.Com!
*Bullet* FREE Portfolio Services!