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Thursday
March 18, 2010
6:11am EDT

  >> Book >> Emotional >> ID #1510374  |   Show DetailsPrinter Friendly PageTell A Friend
 HINDI POEMS-2, गज़ल
Second part of Hindi poems in Hindi script, mainly ghazals, from 701-1225.
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E
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Entry #626946, added on 12-31-08 @ 4:41 am EST.
   [Entry Access Restriction] None.

Title: Poems / ghazals , no. 726- 750 in Hindi script




७२६. कोई दुनिया की शय इंसान को ज़न्नत नहीं देती

कोई दुनिया की शय इंसान को जन्नत नहीं देती
बिना उस की रज़ा के फल कोई मन्नत नहीं देती

तमन्नाएं मुझे कब से इशारे कर रही हैं पर
मेरी खुद की ही मज़बूरी मगर फ़ुरसत नहीं देती

मुझे ऊपर से आते हैं बहुत पैगाम रूहानी
ज़माने की परेशानी अभी रुखसत नहीं देती

मोहब्बत की हकीकत से बखूबी हो गया वाकिफ़
कोई रंगीं फ़िज़ां इस दिल को अब हरकत नहीं देती

खलिश दिल में किसी के हो तो चारागर करेगा क्या
गमेदिल की दवा इंसान को हिकमत नहीं देती.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१२ फ़रवरी २००७










७२७. हम ने ज़फ़ाएं प्यार में कितनी सनम सहीं

हम ने ज़फ़ाएं प्यार में कितनी सनम सहीं
पलकें तुम्हारी याद में नित भीगती रहीं

दिखता नहीं है दर्द ग़र तुम को मेरे दिल का
इस का ये मतलब तो नहीं कि दर्द ही नहीं

कम फ़ासला न हो सका दोनों के दरमियां
हम भी वहीं खड़े रहे तुम भी रहे वहीं

ये प्यार की राहें बनीं हैं भूल-भुलैय्यां
हम ढूंढते ही रह गये दिल खो गया कहीं

ये ही वो मन्ज़र है जहां हम तुम मिले ख़लिश
तुम बढ़ गये आगे मगर हम रह गये यहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१४ फ़रवरी २००७









७२८. दुश्मनी का दोस्ती से इन्तकाम लो—२-३-०७ की गज़ल, ई-कविता को २-३-०७ को प्रेषित


दुश्मनी का दोस्ती से इन्तकाम लो
छोड़ो दिमाग को सिरफ़ इक दिल से काम लो

माफ़िक नहीं आती है हमें मुफ़्त की शराब
दाम कुछ तो लो कि तुम बराएनाम लो

जब सब तरफ़ घिरे हों मुश्किलात के पहाड़
गम को भुला के सिर्फ़ उस खुदा का नाम लो

पहले नशा तो न हुआ ऐसा कभी मुझे
गिरने से पेशतर कोई तो बांह थाम लो

पीना पड़े ज़हर तो पियो प्यार में खलिश
अमरत समझ के हाथ से साकी के जाम लो.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१४ फ़रवरी २००७








७२९. सोचा था जीवन में मेरे एक खुशियों का साया होगा—१५-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को १५-२-०७ को प्रेषित


सोचा था जीवन में मेरे एक खुशियों का साया होगा
साजन संग दिन यूं बीतेंगे उन्माद नया छाया होगा

लगता था मुझ को जैसे मैं तुम को पा कर के धन्य हुई
तुम ने भी हो कर मंत्र मुग्ध कोई प्रेम गीत गाया होगा

मालूम नहीं क्या कारण है क्यों दृष्टि तुम्हारी बदल गयी
जो रूप तुम्हें अब खलता है पहले तुम को भाया होगा

सौ अवगुण मुझ में दिखते हैं गुण मानो मुझ में एक नहीं
अपनाया जब तुम ने मुझ को कुछ तो मुझ में पाया होगा

कल तक तो जान छिड़कते थे प्रियतम क्या आज हुआ तुम को
कोई तो रूप कहीं होगा जिस ने यूं भरमाया होगा

तन भी कोमल मन भी कोमल कहते थे मैं हूं कोमलता
कोई गात अधिक कोमल पा कर मन मुझ से उकताया होगा

तुम तो न थे ऐसे साजन कोई जादू तुम पे कर बैठा
वश में कर तुम को सौतन ने संसार मेरा ढाया होगा

रह रह मेरे मन में आता है इतना केवल ख्याल खलिश
जब प्यार मेरा ठुकराया तब कुछ तो दिल शर्माया होगा.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१४ फ़रवरी २००७








७३०. वज़ह कोई तो है कि ज़िन्दगी खोई सी लगती है—१-३-०७ की गज़ल, ई-कविता को १-३-०७ को प्रेषित

वज़ह कोई तो है कि ज़िन्दगी खोई सी लगती है
मेरी तकदीर जैसे आजकल सोई सी लगती है

उड़ा है रंग चेहरे का, बुझी सी हैं निगाहें भी
किसी की याद में वो रात भर रोई सी लगती है

हुई मुद्दत मेरी उल्फ़त फली न आज तक शायद
फ़सल ये प्यार की सहरा में ज्यों बोयी सी लगती है

सुनी जो शायरी इक दिन हमारे दोस्त यूं बोले
गज़ल ये आप की ज्यादा ही कुछ धोई सी लगती है

खलिश दिल तोड़ के अफ़सोस तो वे कर रहे हैं पर
अदा उन की ये झूठी सिर्फ़ दिलजोई सी लगती है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१४ फ़रवरी २००७








७३२. किस्सा-ए-ताजमहल—१६-२-०७ की नज़्म, ई-कविता को १६-२-०७ को प्रेषित


ताज महल इक भव्य इमारत
गढ़ी श्वेत संगमरमर से
याद दिलाती किस को किस की
पूछो यह कवि के दिल से

जाते प्रेमी युगल वहां पर
खाने कसमें मरने की
जहां मरी मुमताज़महल
थी जन कर के ग्यारह बच्चे

देने जान प्यार की खातिर
कसमें खाते लोग वहां
जहां दफ़न है हुनर हज़ारों
आज़िम संगतराशों के

कहीं से कारीगर आये और
कहीं से आया संगमरमर
सालों साल इक कबर बनी
और कटा पेट था जनता का

लाशों के मकबरे बने और
ज़िन्दा लोग मरे भूखे
उन के त्याग और बलिदानों का
नाम पड़ गया ताजमहल

सुनो हकीकत दुनिया वालो
प्यार अमर तब होता है
जब दूजे की खातिर कोई
करता अनुपम त्याग कभी

ताजमहल जब बना शाहजहां
ने कुछ अर्पण नहीं किया
राज-कोष, जनता की थाती,
को ही महज़ लुटाया था

कुछ तो होगी बात कि जिस का
सिला मिला उस को ऐसा
किया कैद खुद अपने ही
बेटे ने कारा में उस को

जैसा बोओ वैसा काटो
नियम पुराना जग का है
खलिश नज़र में मेरी इतना
किस्सा ताजमहल का है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१६ फ़रवरी २००७
०००००००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com
date Feb 16, 2007 4:51 AM


Khalish ji achhi hai aapki kavita aur sachh hai jo aapne likha hai. yahi nahin aur bhi us badshah ki barbarta history men hai. Usi baadshah ne early christians ko India men baDi berahmi se khatam kar diya tha./'Habeeb'

०००००००००००००००००






७३३. खौफ़-ए-खुदा—बिना तिथि की नज़्म, ई-कविता को १६-२-०७ को प्रेषित


न जिस को कभी ज़िन्दगी ने सताया
कभी एक दिन जो न भूखा रहा है
जिसे ऐश-ओ-आराम सारे मिले हैं
न जिस ने कभी दर्द दिल का सहा है

न जिस का गमों से पड़ा वास्ता है
वो दुनिया में इंसां बहुत है अभागा
इस से तो बेहतर कहीं उस का जीना
जो हो कर परेशान फिरता है भागा

कि मिल जाये रोटी उसे शाम की और
सोने को मिल जाये छत का सहारा
वो सो जायेगा यूं तो सड़कों किनारे
मुसीबत के दिन वो बिताता है लेकिन
जबां पर है नाम-ए-खुदा भी तो आता
जो महलों में रहते हैं महफ़ूज़ हो कर
खुदा का नहीं खौफ़ उन को सताता

यही है वज़ह कि कहर उन पे टूटे
साबित हुए स्वप्न शाहों के झूठे
महल संगमरमर का जिस ने बनाया
उस को ही बेटे ने बंदी बनाया.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१६ फ़रवरी २००७
०००००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com
date Feb 16, 2007 5:36 AM
subject Re: [ekavita] (Mum...) Taj Mahal

Khalish ji, mere naam do do gazals nazar kare to vo aap pahle hain. Shayaad aap ko nahin malum ki aap bhi aik gazal hain , jise zamana chup chaap sun raha hai.
Gazal jab gazal ke naam aaye,
aaye aik aur bhara jaam aaye .
leker sara zamana salaam aye,
Khalish jab lekar paigaam aye./ SHUKRIA /'Habeeb'

००००००००००००००००








७३४. रूह का चैन—बिना तिथि की नज़्म, ई-कविता को १६-२-०७ को प्रेषित


गमों के अन्धेरे में जीता रहा हूं
मगर दिल में लौ एक जलती रही है
जो करती है रौशन मेरी सोच को और
रह रह के मुझ से ये कहती रही है

ये माना कि तू मुफ़लिसी में रहा है
न रंगीनियां तेरी साथी बनी हैं
न शौकों को तूने है अपने संवारा
उदासी से मन्ज़िल-ओ-राहें भरी हैं

मगर तूने इखलाक खोया नहीं है
तू अपने असूलों पे कायम रहा है
ये दुनिया बशर्ते न पहचान पाई
तू अल्लाह के रास्ते पर चला है

तुझे वो नियामत बख्शेगा इक दिन
जायेगा जिस दिन खलिश तू जहां से
तेरी रूह को चैन होगा खुदा का
अमीरों को हासिल जो होता नहीं है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१६ फ़रवरी २००७









७३५. उठता है दिल में दर्द मेरे तो ग़म के नग़मे गाता हूं—१७-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को १७-२-०७ को प्रेषित--RAMAS


उठता है दिल में दर्द मेरे तो ग़म के नग़मे गाता हूं
जो दर्द भरा है गीतों में, मैं उससे दिल बहलाता हूं

दिल की बरबादी के किस्से ज़ाहिर सब पर कैसे कर दूं
ये नग़मे गाकर ही सबको मैं दिल का हाल सुनाता हूं

जब याद मुझे कोई उनकी महफ़िल में कभी दिलाता है
दिल तो रोता है भीतर से मैं बाहर से मुस्काता हूं

याद आते हैं वो दिन अकसर जो हंसकर साथ बिताये थे
रो लेता हूं तनहाई में और एक सुकूं-सा पाता हूं

क्या कभी मोहब्बत में तुमने भी चोट ज़िगर पे खाई है
जब कोई पूछे है मुझसे खा़मोश ख़लिश रह जाता हूं.


महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१६ फ़रवरी २००७

०००००००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com>
date Feb 17, 2007 9:30 AM
Khalish ji,
kaya sadagi aur kaya dard chhupa hai aapki gazal men ,
jaise tanhayee men koi khud gazal -numa hokar kisi saaz par dil nkal kar baja raha ho../ Bahut khoob !/'Habeeb'

००००००००००००००००

from Anoop Bhargava <anoop_bhargava@yahoo.com
date Feb 17, 2007 10:08 AM

खलिश साहब:

अच्छी गज़ल है , विशेष रूप से मकता बहुत खूबसूरत बन पड़ा है ।

सादर

अनूप

०००००००००००००००००००००००






७३६. आप के दिल में कभी हम भी बसर करते थे—१९-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को १९-२-०७ को प्रेषित


आप के दिल में कभी हम भी बसर करते थे
आप ये जान के अपने पे फ़खर करते थे

माफ़िकेअजनबी बैठे तो हैं आप आज मग़र
कल तलक आप हमें दिल को नज़र करते थे

आप को याद न हो भूल नहीं हम सकते
इन्हीं राहों में कभी संग सफ़र करते थे

हम ने जो गेसू में सजाये गुंचे
दिल पे वो आप के जादू का असर करते थे

कोई पैगाम हमें जाते हुए दे जाते
प्यार आप सच्चा खलिश हम से अगर करते थे.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१६ फ़रवरी २००७

०००००००००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com>

date Feb 20, 2007 2:27 AM

"Hamane jo gesu men sajaye gunche,
dil pe vo aapke jaadoo ka asar karte the..."
Wah ! Khalish sahib, khoob mara ,sari gazal men jadoo bhar gaya aur hamare dil par bhi asar aa pahuncha./Jio/'Habeeb'

००००००००००००००००











७३७. कुछ कहते उन के बारे में मेरा दिल यूं शरमाता है

कुछ कहते उन के बारे में मेरा दिल यूं शरमाता है
कि बंद जुबां हो जाती है जब नाम लबों पे आता है

वो यादों में जब आते हैं तो लाख खुशी दे जाते हैं
एक एक अदा पे उन की ये दिल धड़क धड़क रह जाता है

पूछे कोई तो क्या कहिये क्या उन से मेरा रिश्ता है
वो कहने को तो गैर हैं पर यूं जनम जनम का नाता है

न वस्ल है ये न हिज्र है ये वो पास भी हैं और पास नहीं
ख्वाबों में गर न आएं तो दिल में न सुकूं आ पाता है

जुग बीत गये जब से बिछुड़े न सन्देसा न पाती है
राह खलिश रोज़ तकता है कि नामावर कब खत लाता है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१७ फ़रवरी २००७







७३८. मैं तेरी नज़र का दीवाना तेरे ख्यालों में रहता हूं—-२६-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को २६-२-०७ को प्रेषित


मैं तेरी नज़र का दीवाना तेरे ख्यालों में रहता हूं
इज़हार करूं कैसे खुल कर कविता में ही बस कहता हूं

मैं गया दीन और दुनिया से कुछ काम नहीं मैं कर पाता
तू पास नहीं होती है तो तेरे ख्वाबों में बहता हूं

रुसवाई के डर से चाह कर भी नाम तेरा मैं लूं कैसे
दिल-लगी नहीं छिप पाती है दुनिया के ताने सहता हूं

मिलने की सूरत कोई नहीं तू है कि खबर ही नहीं तुझे
चुप दिखता हूं पर मैं दिल के भीतर ही भीतर दहता हूं

हो करम खलिश तेरा मुझ पर तो सिला प्यार का मिले मुझे
नाउम्मीदी की नदिया में टूटे तिनके को गहता हूं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१७ फ़रवरी २००७






७३९. जाने किस रोज़ मैं दुनिया से किनारा कर लूं—२२-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को २२-२-०७ को प्रेषित--RAMAS

जाने किस रोज़ मैं दुनिया से किनारा कर लूं
आओ दीदार मैं इक बार तुम्हारा कर लूं

तुमसे इक लमहा जवानी में मुलाकात हुई
जो गुनाह था, दो इज़ाज़त तो दोबारा कर लूं

आखिरी रात है परदे ये हटा दो सारे
वक्ते-रुख्सत में ज़माने का नज़ारा कर लूं

तुझे रुसवाई-ओ-तोहमत से बचाने खा़तिर
दिल को समझाऊं तेरे बिन भी गुज़ारा कर लूं

मेरी आंखों में नमी तेरी निगाहों में हंसी
ऐसे अन्दाज़ ख़लिश कैसे गवारा कर लूं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१९ फ़रवरी २००७

०००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com>
date Feb 22, 2007 9:34 AM

'waqat-e-rukhsat men zamane ka nazara kar luN..."
bahut achha jaga. Vaise gazal sari achhi hai. aur meri salah yeh ki jo karna hai kar lo fir mouka hatth nahin aayega.na jane kis ki gal ka sheyer hai,haN 'Taki Mir ka hai. " fursat gunah ki mili , vo bhi chaar din, dekheN haiN hamane honsale Parwardigaar ke... Lo jaa raha hai koi shab-e-gam gujaar ke.."/'Mir'
Mubarak ho/'Habeeb'

०००००००००००००००००००००००

from harsh_y71 <harsh_y71@hotmail.com>
date Feb 22, 2007 6:26 PM


भई वाह गुप्त जी,

बहुत अच्छी उड़ान ली
है। खासकर ये लाईनें
तो बहुत पसंद आई।

तुम से इक लमहा जवानी में मुलाकात हुई
वो गुनाह भूला नहीं आज दोबारा कर लूं
हर्ष
००००००००००००००००








७४०. शब-ए-वस्ल—२१-२-०७ का नगमा, ई-कविता को २१-२-०७ को प्रेषित

हर तरफ़ दिलकशीं नज़ारे हैं
आज से वो हुए हमारे हैं

हुस्न की है फ़िज़ाओं में खुशबू
आलम-ए-इश्क छाया है हरसू

मेरी चाहत ने उन को पाया है
दिल मेरा आज मुस्कराया है

ये हकीकत है या कि सपने हैं
जो पराये थे आज अपने हैं

कोई अरमान अब नहीं बाकी
आज मय भी है और है साकी

जो भी होना है आज हो जाये
कोई हसरत न आज रह जाये

आज की रात मैं अमर कर लूं
प्यार में ही खलिश सहर कर लूं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२० फ़रवरी २००७






७४१. तुक्का लगाया हम ने पर वो तीर बन गया—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को १९-२-०७ को प्रेषित

तुक्का लगाया हम ने पर वो तीर बन गया
दिल पे लगा तो वो ही दिल की पीर बन गया

लोहा जो पांव में पड़ा था बन के बेड़ियां
पिघला सितम की आग से, शमशीर बन गया

एहसास-ए-दुनिया भूल कर एहसास-ए-खुदा अब
उतरा जो रूह में मेरी जागीर बन गया

बीते जनम में जो भी किया ज़ुल्म-ओ-करम
इस ज़िन्दगी में हाथ की लकीर बन गया

शौक-ए-गज़ल को छोड़ कर नहीं है कोई शौक
दुनिया से दूर हो खलिश फ़कीर बन गया.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२० फ़रवरी २००७











७४२. सजाने वाले ख्वाबों को मेरी दुनिया सजा देना—२३-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को २३-२-०७ को प्रेषित


सजाने वाले ख्वाबों को, मेरी दुनिया सजा देना
मेरे दिल को न ठुकराना, मोहब्बत का सिला देना

कभी हम पे नज़र डालो, निगाहें तुम को तकती हैं
मेरी जानिब कभी तो देख कर तुम मुस्करा देना

मिलें बेपर्दगी से हम, कभी ऐसा भी दिन आये
हमें भी देखना दीदार अपना भी करा देना

लिखो तुम प्यार का नगमा, ये दिल का साज़ हाज़िर है
वफ़ा के राग पर तुम तान उल्फ़त की सुना देना

तुम्हारे दम पे जीते हैं खलिश हम तुम पे मरते हैं
भुला बैठे हो जो दिल से न नज़रों से गिरा देना.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२२ फ़रवरी २००७

००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com>
date Feb 23, 2007 4:04 PM

Khalish Sahib bahut acchi gazal hai sab ke sab sheyer umda hain ,Lekin hamko aap se yehi shikayat hai ki aap gazal bhejne men bahut jaldbazi karte hain,zara dobara soch kar isi gazal ko bhejeN ,kuchh naya rang nazar aayega./'Habeeb'
००००००००००००००००











७४३. जीना है फ़कत दो पल सामान है बरसों का—-२५-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को २५-२-०७ को प्रेषित


जीना है फ़कत दो पल सामान है बरसों का
मालूम नहीं कल का क्या सोचना परसों का

जनता चाहे रोटी पर वोट गिने नेता
कहने को सियासत है पर खेल है फरसों का

इंसान को लाज़िम है रखे वो जबां बस में
लमहों के लफ़्ज़ों का अन्ज़ाम है अरसों का

क्यों सोच पे इंसां की फ़रमान हों लीडर के
बेकार तमाशा है भाषण और जलसों का.

रुखसार सजाता है बेला का फूल खलिश
पर खेत सजाता है जो फूल है सरसों का.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२२ फ़रवरी २००७











७४४. वफ़ा कितनी है मेरे दिल में दिल से आंक कर देखो—-२४-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को २४-२-०७ को प्रेषित


वफ़ा कितनी है मेरे दिल में दिल से आंक कर देखो
ये दिल का मामला है दिल में दिल से झांक कर देखो

यकीं मेरी मोहब्बत का न जीते जी तुम्हें होगा
यही बेहतर है खंजर से मेरा दिल चाक कर देखो

कदम रखने से पहले सोच लो अंज़ाम क्या होगा
ज़हर का हो शुबा, नादां न हरगिज़ फांक कर देखो

तुम्हारे भी गुनाहों को भुला देगा ज़माना पर
कभी तुम भी तो औरों की बुराई ढांक कर देखो

खलिश तुम को मसीहा मान के दुनिया ये पूजेगी
मगर है शर्त कि सूली पे खुद को टांक कर देखो.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२४ फ़रवरी २००७

०००००००००००००

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com
date Feb 24, 2007 11:30 PM

Khalish Sahib aakhari sheyer jaan lewa hai., ab manta hun ki aap bhi SHAYER ho gaye hanin. /Jio/'Habeeb'

०००००००००००००००००००००









७४५. बहुत सोचा मगर हम सोच कर भी न समझ पाये—-बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को २४-२-०७ को प्रेषित


बहुत सोचा मगर हम सोच कर भी न समझ पाये
खता की कौन सी हम ने जो हम से आप गुस्साये

बहुत आसां है कह देना भुला दो प्यार का मंज़र
भला कैसे मिटा दूं दिल पे जो हैं आप के साये

नहीं मालूम था दिल से धुआं ये जा नहीं सकता
भुलाया जितना उतना ही रहे दिल पे मेरे छाये

अभी हर सू मेरे तनहाई ही तनहाई है बरपा
कभी वो दिन भी आये ज़िन्दगी फिर मेरी मुस्काये

वो आया दो दिनों का साथ दे कर के हुआ रुख्सत
करूं क्या जो खलिश फिर से मेरे जीवन में वो आये.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२४ फ़रवरी २००७










७४६. सनद मुझ को उन्हों ने प्यार में कुछ इस तरह दी है—-बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को २४-२-०७ को प्रेषित


सनद मुझ को उन्हों ने प्यार में कुछ इस तरह दी है
जलाने को मेरा दिल जैसे कोई दिल्लगी की है

ज़फ़ाओं का उलाहना अब तलक देते रहे मुझ को
करेंगे वो वफ़ा मेरी तरह ऐसी कसम ली है

न पीने का किया वादा निभा पाये न पर उस को
बहुत बेखौफ़ हो नज़रों से उन की रात भर पी है

मुखातिब हैं मेरे वो होश में आखिर रहूं कैसे
मेरे सीने में भी तो महज़ इंसान का जी है

बड़ा मुश्किल है दिल को रोकना जब ज़िक्र तेरा हो
बहुत दिल पे ज़बर करके खलिश मैंने जबां सी है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२४ फ़रवरी २००७







७४७. कवियों की महफ़िल में आया --बिना तिथि की कविता, ई-कविता को २६-२-०७ को प्रेषित


कवियों की महफ़िल में आया
मैंने भी इक नगमा गाया
पर किस ने उस में क्या पाया
यह राज़ मुझे मालूम नहीं

कुछ ने सुन कर मुंह बिचकाया
कोई देते दाद न थक पाया
कोई सोता रहा न सुन पाया
क्या असर हुआ मालूम नहीं

मैंने तो हृदय उंडेला था
मैं ही बस एक अकेला था
जो खेल अश्रु का खेला था
क्या सफ़ल हुआ मालूम नहीं

मैं कवि चरणों में झुकता हूं
उन से न विमुख हो सकता हूं
पर नहीं सोच ये थकता हूं
मैं भी कवि हूं? मालूम नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ फ़रवरी २००७










७४८. सामने है तू मगर मुझ को न देखे, गम नहीं—-२७-२-०७ की गज़ल, ई-कविता को २७-२-०७ को प्रेषित


सामने है तू मगर मुझ को न देखे, गम नहीं
ये तेरी नज़रें चुराने की अदा भी कम नहीं

यूं तो उल्फ़त में बहारों का ही रहता है समां
पर मोहब्बत हो नहीं सकती जो आंखें नम नहीं

हम चले जाते हैं मन्ज़िल गर मिले या न मिले
कारवां ये सांस का जाता है जब तक थम नहीं

एक दिन हो जायेंगे हम खाक-ए-सहरा में दफ़न
चुक गया है वक्त अब पांवों में बाकी दम नहीं

दूर तो तुम जा रहे हो रूठ कर हम से खलिश
एक दिन ढूंढोगे हम को जब रहेंगे हम नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ फ़रवरी २००७







७४९. मेरा दिल है बहुत नाज़ुक ये जल्दी टूट जाता है—-३-३-०७ की गज़ल, ई-कविता को ३-३-०७ को प्रेषित-- RAMAS

मेरा दिल है बहुत नाज़ुक ये जल्दी टूट जाता है
ग़मों से ज़िन्दगी भर का बनाया दिल का नाता है

किसी ग़म से मेरे होठों पे आती मुस्कुराहट है
कोई ग़म याद आता है, बहुत आके रुलाता है

किसी ग़म से मेरे सीने की धड़कन थरथराती है
कोई ग़म आज भी यादों को मेरी गुदगुदाता है

कोई ग़म है जिसे चाहा मग़र मैं भूल न पाया
कोई ऐसा भी ग़म है जो मेरे दिल को लुभाता है

मेरा दिल एक है लेकिन हज़ारों ग़म हैं दिलबर के
ख़लिश ग़म एक जाता है तो दूजा लौट आता है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश [reverse start]
२ मार्च २००७
0000000000000

from roop hans <roophanshabeeb@yahoo.com
date Mar 3, 2007 9:26 AM

बहुत अच्छा खयाल है खलिश जी,

बहर में बेसाखता जो जज़्बा-ए तलातुम उठाकर,
या हर रंग ज़हर का प्याला हो मुश्किल पीने में ।
ऒर कुछ न सूझा तोफ़ा ज़िन्दगी का खुदा को 'हबीब',
तो रख दिया सजाकर गमे-हुज़ूम मेरे इक दिल सीने में ।

'हबीब'

-------
बहर=समुन्दर ।
बेसाख्ता=अचानक /बिना सोच के अचम्भे में ।
जज़्बे-तलातुम=अकांकशाओं का (पानी में) तूफ़ान ।
गमे-हुज़ूम= गमों का , दुखों का समूह, झुण्ड ।











७५०. कहने को तो आज़ादी है

कहने को तो आज़ादी है
पर छाई इक बरबादी है

सरकार बनी है जनता की
यह चारों तरफ़ मुनादी है

नेता कहते खुल कर बोलो
जो बोला उसे सज़ा दी है

दारोगा डांट लगाता है
जाओ अब रपट लिखा दी है

मुज़रिम घूमे सीना ताने
और जेल सड़े फ़रियादी है

भड़काता है सब लोगों को
कहते हैं खलिश फ़सादी है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२ मार्च २००७







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