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Tuesday
February 14, 2012
9:46pm EST


  >> Book >> Emotional >> ID #1510374  |   Show DetailsPrinter Friendly Page Tell A Friend
HINDI POEMS-2, गज़ल
Second part of Hindi poems in Hindi script, mainly ghazals, from 701-1225.
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Entry #626958, added on 12-31-08 @ 5:53 am EST
   Entry Access Restriction: None.
Poems / ghazals , no. 926- 950 in Hindi scriptEntry #626958




९२६. हमसफ़र मिला था जो हम को वो राहों में ही छूट गया

हमसफ़र मिला था जो हम को वो ही राहों में छूट गया
नाज़ों से दिल को पाला था इक ठेस लगी और टूट गया

ठोकर पाई गश खा बैठे जब आंख खुली तो तनहा थे
दिल ने तब जाना प्यार दिखा कर कोई हम को लूट गया

शम्म की तरह ता-उम्र जले औरों को रौशन करने को
अमृत के बदले कोई हमें दो पिला ज़हर के घूंट गया

अपनी अपनी करनी का फल पाते हैं सभी ज़माने में
कोई गाज़ गिरी हम पर ऐसी कि भाग हमारा फूट गया

गर्दिश ही गर्दिश है अब तो उम्मीद खलिश अब क्या कीजे
पैदल सहरा में चलना है हाथों से मेरे ऊंट गया.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३० जून २००७











९२७. क्यों तुम से मैं उम्मीद रखूं कि अपना हाथ बढ़ाओगे

क्यों तुम से मैं उम्मीद रखूं कि अपना हाथ बढ़ाओगे
क्यों सोचूं वक्त-ए-ज़रूरत पर तुम राह दिखाने आओगे

हर जवां कली की किस्मत में कुचला जाना मसला जाना
है रीत मोहब्बत की ये ही क्यों इसे बदल तुम पाओगे

तुम चले ज़फ़ा की राहों पर और एक ज़माना बीत चुका
अब सबक वफ़ाओं का अपने को खुद कैसे सिखलाओगे

हम हम न रहे तुम तुम न रहे वो वक्त पुराना बीत गया
वो याद तसव्वुर में ला कर कब तक तुम ख्वाब सजाओगे

मत ढूंढ खलिश खोए मन्ज़र कोई मर के लौट नहीं आता
माज़ी की खातिर पेश अगर खोओगे तो पछताओगे.


महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३० जून २००७









९२८. आप से आंख जो मिल गयी एक दिन दिल पे जादू मेरे इस कदर छा गया—१-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को १-७-०७ को प्रेषित


आप से आंख जो मिल गयी एक दिन दिल पे जादू मेरे इस कदर छा गया
आप को देख कर सोचता ही रहा चान्द कैसे ज़मीं पर उतर आ गया

जाने क्या आप की वो नज़र कह गयी और क्या आप ने इस नज़र में पढ़ा
एक लमहे को चेहरा दिखा था मगर उम्र भर के लिये वो मुझे भा गया

ज़िन्दगी का सफ़र तो बहुत कर चुके हमसफ़र न मिला प्यार की राह में
आप को देख कर आज ऐसा लगा राग उल्फ़त का दिल में कोई गा गया

जानते हम न थे आप को, आप भी हम से अनजान थे हर तरह कल तलक
आज नज़रें मिलीं दिल में दोनों तरफ़ कोई एहसास था पास जो ला गया

प्रीत की आग दिल में तो पलती रही पर ज़ुबां पर कभी बात न आ सकी
हाल-ए-दिल जो गज़ल में लिखा है तुम्हें आज पढ़ के खलिश मैं ही शरमा गया.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३० जून २००७








९२९. भला इक संगदिल को दाग-ए-दिल हम क्यों दिखा बैठे—२-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को २-७-०७ को प्रेषित


भला इक संगदिल को दाग-ए-दिल हम क्यों दिखा बैठे
तराना प्यार का नफ़रत भरे दिल को सुना बैठे

ग़मेहस्ती, ग़मेदुनिया, ग़मेगुरबत ही क्या कम थे,
न जाने इन के ऊपर क्यों ग़मेउलफ़त लगा बैठे

हकीकत में न कोई इश्क न माशूक था अपना
हसीं ख्वाबों की महफ़िल हम यूं ही दिल में सजा बैठे

न आना था वो न आये रहे हम उन के भरमाये
कि हर आहट पे हम चौखट पे नंगे पांव जा बैठे

है उन की याद तड़पाती सुकूं भी वो ही देती है
करें क्यों ग़म खलिश कि चैन दिल का हम लुटा बैठे.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३० जून २००७









९३०. बैठे हैं तुम्हारे कदमों में उम्मीद है कि तुम शाद करो

बैठे हैं तुम्हारे कदमों में उम्मीद है कि तुम शाद करो
हम को न गिला होगा तुम से चाहे हम को नाशाद करो

हम भी तो नहीं दुश्मन कोई गो आशिक तुम को और भी हैं
आ जाओ हमारे पहलू में इस दिल को सनम आबाद करो

बस जाये हमारी दुनिया भी हो जाये करम इतना हम पे
हम देंगे दुआएं ही फिर भी,चाहे हम को बरबाद करो

जो दिल से तराना निकला है वो हम तो सुनाते जायेंगे
धड़कन तो दिल में होगी ही, चाहे तुम न इरशाद करो

या पास मेरे तुम आ जाओ मुमकिन जो खलिश ये हो न सके
तुम अपने हाथों ही हम को यूं जीने से आज़ाद करो.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१ जुलाई २००७


एद





९३१. मेरे इन उजड़े ख़्वाबों को तुमने ही कभी जगाया था—RAMAS—ईकविता १७ सितंबर २००८

मेरे इन उजड़े ख़्वाबों को तुमने ही कभी जगाया था
जाना था इक दिन छोड़ अग़र, क्योंकर मुझको भरमाया था

सच है कि मैं ग़फ़लत में था, न तुमने वादा कोई किया
कच्चे रस्ते पर तुमने तो मुझको न कभी चलाया था

यह जीवन एक हकी़कत है सपनों का कोई मोल नहीं
जो स्वप्न सुहाना लगता था वो केवल झूठा साया था

है शुक्र फ़लक से धरती पर तुम आज अचानक ले आये
गलती मेरी थी चोट लगी, मैं क्यों इतना इतराया था

ये ख़लिश दिलों की बातें हैं इन पर न कोई ज़ोर चले
आता है फिर भी ख़्याल मग़र क्यों तुम पर प्यार लुटाया था.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२ जुलाई २००७






९३२. एक वो भी तमन्ना थी एक ये भी हकीकत है—३-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ३-७-०७ को प्रेषित


एक वो भी तमन्ना थी एक ये भी हकीकत है
जो शोख अदा तब थी वो आज फ़जीहत है

पलकों में कभी पलते थे ख्वाब सुहाने भी
यादों को भुला पाना अब एक मुसीबत है

रंगीन नज़ारों में रहते थे कभी, पर अब
दुनिया की हर एक शै से बेज़ार तबीयत है

करते हैं दुआएं सब कि बाप का दम निकले
बेटों की निगाहों में बस एक वसीयत है

दुनिया के अलम में वो दिन रात परेशां हैं
कहते हैं खलिश जिन की मौला में अकीदत है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२ जुलाई २००७

अकीदत = श्रद्धा









९३३. बदक़िस्मत होने की क्यों तुझे शिकायत है—११-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ११-७-०७ को प्रेषित


बदक़िस्मत होने की क्यों तुझे शिकायत है
मिलती है अगर ठोकर मौला की इनायत है

बढ़ जाये ग़रूर-ए-दिल इंसां का अगर हद से
बन्दे को सबक देना अल्लाह की रवायत है

क्यों फूलते हो इतना दौलत तो खु़दा की है
बेकस पे करम करना मज़हब की हिदायत है

लेता है खु़दा से जब तो सब्र नहीं होता
बनता है ज़काती तो क्यों करे किफ़ायत है

क़तरा आंसू कोई न ख़लिश बहायेगा
ख़ूं चूसने वालों की अकसर बहुतायत है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३ जुलाई २००७

ज़काती = ज़कत देने वाला. इस्लाम के अनुसार आमदनी का ढाई प्रतिशत अंश ग़रीबों को दान करना चाहिये








९३४. जब कोई प्रशंसा करता है मैं मौन खड़ी रह जाती हूं—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को ३ जुलाई को प्रेषित

जब कोई प्रशंसा करता है मैं मौन खड़ी रह जाती हूं
न जाने क्या हो जाता है मैं ठगी-ठगी रह जाती हूं

जब रास रचाये है कान्हा और मिलन अधर का होता है
मन में मुझ को यूं लगता है मैं बन वंशी रह जाती हूं

मन तो बस में था नहीं किन्तु अब तन भी पड़ जाये ढीला
मैं छुई-मुई सी शरमाऊं, ज्यों गड़ी-गड़ी रह जाती हूं

कुछ मोहन माया है उनकी नूतन जीवन मिल जाता है
मैं उन की बाहों में जब भी बस एक घड़ी रह जाती हूं

वे मेरे हैं बस एक खलिश, पर क्या मैं भी उन की कुछ हूं
शंका उठती है रातों में तो सोच पड़ी रह जाती हूं.


महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३ जुलाई २००७












९३५. एहसान तुम्हारा है असलियत दिखा दी है—४-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ४-७-०७ को प्रेषित

एहसान तुम्हारा है असलियत दिखा दी है
मुज़रिम ठहरा कर के क्या खूब सजा दी है

एक जाल भरम का था वो टूट गया आखिर
औकात मेरी मुझ को हमदम समझा दी है

दस्तक न कभी दूंगा चौखट पे तुम्हारी अब
हद मेरी कहां तक है ये बात बता दी है

ग़म जीने का क्योंकर अब करूं ज़माने में
दिल से ख्वाहिश जीने की आज मिटा दी है

जीता है तू क्योंकर अब छोड़ खलिश जीना
हो रही मेरे दिल में दिन रात मुनादी है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
४ जुलाई २००७











९३६. जब याद कोई मन आंगन में बरबस आ कर पल जाती है—५-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ५-७-०७ को प्रेषित

जब याद कोई मन आंगन में बरबस आ कर पल जाती है
एक हूक सी दिल में उठती है और कविता में ढल जाती है

वेदना किसी जीवन क्षण की जो वर्तमान से दबी रही
जब बान्ध टूटता है सहसा बन के आंसू गल जाती है

लौट आएं जब बीते क्षण तो वे सपने अब जो नहीं रहे
साकार पुन: हो जाते हैं कल्पना सहज छल जाती है

मन की गहराई में मेरे यूं तो बस एक अन्धेरा है
जानी सी आहट होती है, इक लौ दिल में जल जाती है

यह प्यार का बन्धन ऐसा है यमदूत भी तोड़ न पाएं जो
हो चलने की बेला तो भी पल भर को तो टल जाती है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
४ जुलाई २००७

०००

from Ghanshyam Gupta <gcgupta56@yahoo.com>
date Jul 5, 2007 8:24 AM


"यह प्यार का बन्धन ऐसा है यमदूत भी तोड़ न पाएं जो
हो चलने की बेला तो भी पल भर को तो टल जाती है"

बहुत खूब, महेश जी

- घनश्याम

००००००००००००

from ramadwivedi <ramadwivedi@yahoo.co.in>
date Jul 5, 2007 9:27 PM


महेश जी,

बहुत सुन्दर ग़ज़ल है....दिल को छू गई....आपसे ही ई कविता में रौनक है...मुबारक
हो ...

डा. रमा द्विवेदी








९३७. अब और न तड़पाओ ज़ख्मों से भरा दिल है—६-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ५-७-०७ को प्रेषित


अब और न तड़पाओ ज़ख्मों से भरा दिल है
राहों में मिले कांटे, नज़रों में न मन्ज़िल है

दुनिया के अलम इतने हैं कैसे गुज़र होगा
तूफ़ान है सिर पर और नज़दीक न साहिल है

मुंसिफ़ की शकल में है मुद्दई छिपा बैठा
वो कहने को यूं तो इंसाफ़ का आदिल है

पैरवी भला मेरी कैसे हो अदालत में
महंगा है वकील इतना मेरे नाकाबिल है

बचने की कोई सूरत क्या खलिश मेरी होगी
जिस ने इलज़ाम लगाया वो ही तो कातिल है.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
४ जुलाई २००७

अलम = दु:ख
मुंसिफ़ = न्यायकर्ता
मुद्दई = मुकदमा / शिकायत करने वाला
आदिल = न्यायप्रिय

०००००००००००

from singhkw <singhkw@indiatimes.com

date Jul 6, 2007 4:33 PM

खलिश जी.. अच्छी लगी गज़ल..

००००००००००००००





९३८. है कौन जिसे दिल के हालात बताऊं मैं—१०-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को १०-७-०७ को प्रेषित


है कौन जिसे दिल के हालात बताऊं मैं
बेहतर न ज़माने को यूं अश्क दिखाऊं मैं

दुनिया में किसे फ़ुरसत औरों के ग़मों की है
अफ़साना सुना के क्यों रुसवाई कमाऊं मैं

गर्दिश के सभी अपनी फिरते हैं यहां मारे
राग अपनी मुसीबत का क्यों गा के सुनाऊं मैं

हंसते हैं सभी सुन कर मजनू की कहानी को
हाल अपना बयां कर क्यों दीवाना कहाऊं मैं

बन के आशिक खुद ही डरता हूं ज़माने से
माशूक पे तोहमत क्यों फिर खलिश लगाऊं मैं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
४ जुलाई २००७

000000000000000

from singhkw <singhkw@indiatimes.com>
date Jul 10, 2007 2:46 PM
subject Re: [ekavita] ९३८. है कौन जिसे दिल के हालात बताऊं मैं—१०-७-०७ की गज़ल
दाद कबूल कीजिए खलिश जी..बहुत भावपूर्ण गज़ल के लिए..
कवि कुलवंत सिंह

0000000000000









९३९. याद आई मुझे जब तुम्हारी प्रिये, भाव कितने उठे और मचलते रहे—९-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ९-७-०७ को प्रेषित


याद आई मुझे जब तुम्हारी प्रिये, भाव कितने उठे और मचलते रहे
स्वप्न साकार पल में सभी हो गये रात भर वे मेरी नीन्द छलते रहे

दो हृदय एक दूजे से मिल न सके एक दीवार सी बीच में चिन गयी
भाव तुम से मैं दिल के जो कह न सका वे नयन अश्रु बन के निकलते रहे

छू न पाया कभी मैं तुम्हारा हृदय, भेद क्या था मैं न जान पाया कभी
वेदना किन्तु सुन के हृदय की मेरे पत्थरों के कलेजे पिघलते रहे

प्यार की रीत है यह पुरानी बहुत कोई जीता यहां कोई हारा यहां
रात भर मस्त लौ नृत्य करती रही और पतंगे हो निर्भीक जलते रहे

साध्य मिल जायेगा साधना में सदा कोई साधक को इस का भरोसा नहीं
न मिलेगा हमें लक्ष्य मालूम था चल पड़े तो खलिश यूं ही चलते रहे.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
४ जुलाई २००७












९४०. दाद दीजिये मगर न मुस्कराइये—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को ५ जुलाई को प्रेषित


दाद दीजिये मगर न मुस्कराइये
न इन अदाओं से हमें करीब लाइये

मन्ज़र अभी हैं और भी इस राहेइश्क में
उन से गुज़र तो लीजिये फिर पास आइये

हम ने छिपा के जो रखे हैं सब से आज तक
वो दाग़ेदिल आ के हमारे देख जाइये

माना कि हम से प्यार आप को है इन्तहा
कोई सबूत-ए-वफ़ा हम को दिखाइये

अब भर चुका है दिल मसर्रतों से ये ख़लिश
हम को कोई अफ़साना-ए-ग़म तो सुनाइये.


महेश चन्द्र गुप्त खलिश
५ जुलाई २००७












९४१. इतना न हम पे रीझिये, ऐसा न हो हज़ूर—बिना तिथि की गैर-मुरद्दफ़ गज़ल, ई-कविता को ५ जुलाई को प्रेषित


इतना न हम पे रीझिये, ऐसा न हो हज़ूर
अपने पे हम को भूल से होने लगे ग़रूर

दीवानगी हद से ज़ियादा इस कदर बढ़ी
उठने लगा दिलों में अब दोनों तरफ़ सरूर

कुछ तो खता बताइये जो आप रो पड़े
माना कि हम को इश्क का आता नहीं शऊर

जो प्यार की खातिर भुलाये बेवफ़ाई को
कोई मिलेगा आप को हम सा कहां सबूर

आदम तो खलिश खुल्द को वापस न जा सका
कूचे में लौट आयेंगे हम आप के ज़रूर.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
५ जुलाई २००७









९४२. जमुना तट न बाजे वंशी कोई रचे न रास—बिना तिथि की कविता, ई-कविता को ५ जुलाई को प्रेषित

जमुना तट न बाजे वंशी कोई रचे न रास
कान्हा छोड़ गये वृन्दावन बीत रहा मधुमास
कन्हैय्या लौट आओ
कन्हैय्या लौट आओ

बैरन सखियां ताना दें और सास सुनाये बोल
किसे दिखाऊं अपनी हालत दिल के परदे खोल
संवरिया लौट आओ
संवरिया लौट आओ

ताल तलैय्या सूखे सारे सूखे क्यारी पौधे
सूरज बरसे काम न होवे, पड़े रहें बस औन्धे
बदरिया लौट आओ
बदरिया लौट आओ

दिन बीते हफ़्ते बीते अब बीता चाहे मास
आओगे कब लौट कलेजे में रहती ये आस
भदौरिआ लौट आओ
भदौरिआ लौट आओ.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
६ जुलाई २००७

०००००००००००

from singhkw <singhkw@indiatimes.com
date Jul 6, 2007 4:58 PM

बहुत खूब खलिश जी..

०००००००००००००००००








९४३. अपना ही दिल अपना न हुआ ग़ैरों की शिकायत क्या कीजे—८-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ८-७-०७ को प्रेषित

अपना ही दिल अपना न हुआ ग़ैरों की शिकायत क्या कीजे
ग़ैरों ने हमेशा साथ दिया अपनों की हिमायत क्या कीजे

हम रोज़ उसे खत लिखेंगे पर उस को फ़ुरसत न होगी
अपना न रहेगा, बेटे को हम भेज विलायत क्या कीजे

हर एक ज़फ़ा को वफ़ा समझ सौ ज़ुल्म सहे हम ने उन के
न कदम चूमने पर भी हो दिलवर की इनायत क्या कीजे

कुदरत से दूर रहेगा तो इंसां मशीन बन जायेगा
धरती पर पैर न होने की बन चुकी रवायत क्या कीजे

है खलिश शिकायत ये उन को कि प्यार का सौदा महंगा है
हम मुफ़्त उन्हें दिल दे बैठे अब और रियायत क्या कीजे.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
६ जुलाई २००७





P ९४४. ज़िन्दगी की रौ में हम कुछ इस तरह से बह गये—७-७-०७ की गज़ल, ई-कविता को ७-७-०७ को प्रेषित

ज़िन्दगी की रौ में हम कुछ इस तरह से बह गये
ज़िन्दगी तो चुक गयी हम देखते ही रह गये

कुछ न अपने साथ दुनिया से कोई ले जायेगा
हाथ खाली ये सिकन्दर का सन्देसा कह गये

जिन के दम पे शहन्शाह मग़रूर थे वो ही किले
वक्त की बिजली गिरी तो एक पल में ढह गये

सातवें दिन मौत का तक्षक तुझे डस जायेगा
एक दिन ही रह गया है बीत बाकी छह गये

ज़िन्दगी की मैं हकीकत से ख़लिश अनजान था
राज़ जब खुलने लगे, खुलते वो तह-दर-तह गये.


महेश चन्द्र गुप्त खलिश
६ जुलाई २००७





०००००००००००००००००

from Ghanshyam Gupta <gcgupta56@yahoo.com>
date Jul 7, 2007 5:53 PM


सातवें दिन मौत से डस जायेगा तक्षक तुझे
एक दिन बाकी बचा है बीत बाकी छह गये

महेश जी,

केवल यही एक नहीं, गज़ल के सभी अशआर उम्दा हैं; हां, चाहें तो मकते की तरफ (दूसरा मिसरा) ध्यान दे सकते हैं।

००००००००००००००

from Kavita Vachaknavee <kvachaknavee@yahoo.com
date Jul 7, 2007 6:17 PM
बहुत ही बढ़िया । ’ छह’ वाला कफ़िया तो कमाल बन पडा़ है।
शायद चौथी पंक्ति में कोई प्रूफ़ की चूक रह गई है, ऐसा मुझे भी लगा, किन्तु वहां दुनिया से जाते समय खुले हुए हाथों से तात्पर्य है-----------यह अब स्पष्ट है। बधाई लें ।

===वाचक्नवी

०००००००००००००००








९४५. जाने किधर को मैं जाता रहा हूं--- ईकविता, ८ जुलाई २००८

जाने किधर को मैं जाता रहा हूं
मकसद को अपने भुलाता रहा हूं

जहां पर भी साया मिला एक पल का
मन्ज़िल का धोखा मैं खाता रहा हूं

कहती है दुनिया कि नाकाम हूं मैं
ये याद ख़ुद को दिलाता रहा हूं

कभी तो मिलेगी किसी की मोहब्बत
उम्मीद दिल में जगाता रहा हूं

किये थे खलिश पाप बीते जनम में
फल मैं उन्हीं का भुनाता रहा हूं.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१४ जुलाई २००७

०००००००००००
Wednesday, July 9, 2008 9:37 AM
From: "Devi Nangrani" devi1941@yahoo.com

Khalishji
कहती है दुनिया कि नाकाम हूं मैं
ये याद ख़ुद को दिलाता रहा हूं

bahut acha laga khayal

अजब है ये दुनिया अजब हादसे , लोग
ये अक्सर मैं हर दिन भुलाता रहा हूँ
देवी









९४६. सब चाहने वाले हैं लेकिन मेरा कोई अपना नहीं रहा—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को २० जुलाई २००७को प्रेषित

सब चाहने वाले हैं लेकिन मेरा कोई अपना नहीं रहा
गर्दिश में रहना सीख लिया मेरा कोई सपना नहीं रहा

जब थे गृहस्थ तब खटते थे, अब पहन फ़कीरी बाने को
खुश हैं हम फ़ाकामस्ती में जीवन भर खपना नहीं रहा

हम रोज़ ज़माने से दिल के सौ राज़ छिपाये फिरते थे
जीते अब खुली हवा में हैं दुनिया से छिपना नहीं रहा

पहले जब भी दिल भागे था बस में तसबीह उसे करती
जब से वो दिल में आ बैठा माला का जपना नहीं रहा

अब खलिश छोड़ कर के दुनिया आज़ादी ही आज़ादी है
हर आन खुशी का आलम है अब ग़म में तपना नहीं रहा.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२० जुलाई २००७







९४७. आज मैं थक गया हूं मेरे हाथ को कोई तो हो जो आ कर कभी थाम ले—२२ जुलाई की गज़ल, ईके को २२-७-०७ को प्रेषित


आज मैं थक गया हूं मेरे हाथ को कोई तो हो जो आ कर कभी थाम ले
कल न मैं होऊंगा न कोई और ही जो कि भूले से मेरा कभी नाम ले

किसलिये मैं जिया और क्योंकर जिया इन सवालों की अब कोई कीमत नहीं
चल दिया आज मैं छोड़ कर ये जहां अब ज़माने से कह दो कि विश्राम ले

एक दिल था मेरे पास जो दे दिया दिल गया दोस्ती भी न मुझ को मिली
आज कोई नहीं पास बैठे मेरे हाथ से जो मेरे प्यार का जाम ले

गम उठाने को मैं तो जिये जाऊंगा कोई उम्मीद दिल में नहीं अब बची
कोई ऐसा नहीं जो दे रंगीनियां और बदले में तनहाई की शाम ले

जिन को अपनाया मैंने उन्हें सब दिया मेरा कोई भी अपना नहीं हो सका
जो खरीदा वो हासिल मुझे न हुआ चल दिये सब खलिश माल का दाम ले.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२२ जुलाई २००७








९४८. जाते जाते हम को कोई उल्फ़त की निशानी दे जाओ—२५ जुलाई की गज़ल, ईके को २५-७-०७ को प्रेषित


जाते जाते हम को कोई उल्फ़त की निशानी दे जाओ
रातों को सहारा हो जाये थोड़ी सी जवानी दे जाओ

जाने फिर कब मिलना होगा तड़पेंगे हम तनहाई में
सीने से लगा लें हम जिस को तस्वीर पुरानी दे जाओ

मालूम नहीं क्या कर बैठें दिल पर ऐसे में जोर नहीं
जीने का बहाना मिल जाये पहचान अजानी दे जाओ

मौसम तो कितने आयेंगे बरसात रहेगी पर हर दम
बहला पाये जो इस दिल को इक याद सुहानी दे जाओ

पूछेंगे जब दुनिया वाले क्यों ख़लिश जुदा हम हो बैठे
बचने को इस रुसवाई से तुम कोई कहानी दे जाओ.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२४ जुलाई २००७










९४९. क्या करोगे दोस्त तुम मिल के मुझे, मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दे पाऊंगा—२६ जुलाई की गैर-मुरद्दफ़ गज़ल, ईके को २६-७-०७ को प्रेषित


क्या करोगे दोस्त तुम मिल के मुझे, मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दे पाऊंगा
था नहीं बायस खुशी का मैं कभी, सिर्फ़ अपने दर्द ही दे जाऊंगा

भूल जाओ वो पुराने रात दिन, मत बुलाओ प्यार के अन्दाज़ से,
रास है आने लगी तनहाई अब, सिर्फ़ कुछ लमहात को ही आऊंगा

रंगरलियां तुम मनाओ, हो जवां, क्यों बनाते हो मुझे तुम हमसफ़र
राह में ग़र गीत गाने को कहा, जो रुला दे गीत वो ही गाऊंगा

किसलिये आहें भरूं, शिकवा करूं, क्यों सुनाऊं दास्तान-ए-ग़म तुम्हें
मुस्कराहट तो कभी देखी नहीं, आंख में दुनिया की आंसू लाऊंगा

मत करो उम्मीद पहलू में मेरे, दो घड़ी तुम को सुकूं मिल जायेगा
एक शय मनहूस हूं केवल खलिश, आज़मा लो मैं तुम्हें न भाऊंगा.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२५ जुलाई २००७






९५०. आग दिल में लगी प्यार की इस तरह, कोई शय दिल लगी को बुझा न सकी—२७ जुलाई की गज़ल, ईके को २७-७-०७ को प्रेषित


आग दिल में लगी प्यार की इस तरह, कोई शय दिल लगी को बुझा न सकी
था ज़माने की रुसवाई का डर बहुत, दर्द दिल का किसी को दिखा न सकी

दूरियां प्यार में इस तरह कुछ रहीं, जो मिला हमसफ़र वो जुदा हो गया
जाना उस की गली में न मुमकिन हुआ, और अपनी गली में बुला न सकी

लाख शिकवे लिये पास उस के गयी, थी ज़फ़ाओं की फ़हरिस्त लम्बी बहुत
सामने जब वो आया तो बस रो उठी, कर मैं ज़ाहिर में उस से गिला न सकी

चार दिन की मुलाकात किस्मत में थी और रुखसत का लमहा बहुत पास था
एक सीटी बजा कर चली रेल जब, कोई तदबीर भी काम आ न सकी

सिर्फ़ यादें ही मेरी हैं ज़ागीर अब, मैं लुटी और मेरी लुटी ज़िन्दगी
आखिरी वक्त का वो समां मैं खलिश, आज बीते बरस पर भुला न सकी.

महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२५ जुलाई २००७

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kusum sinha khalishji namaskar kitna achha likhte hain aap?kitni bhaopurn aur komal pakti...
Jul 27, 2007
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from ramadwivedi <ramadwivedi@yahoo.co.in

date Jul 29, 2007 11:18 PM


--- खलिश जी,

सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए यह गज़ल बहुत सुन्दर बन पड़ी है..बाकी गज़ल के
जानकार ही बता सकते हैं...बहुत बहुत बधाई......

डा.रमा द्विवेदी
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from Devi Nangrani <devi1941@yahoo.com> hide details Jul 28 (2 days ago)
date Jul 28, 2007 10:19 PM

Khalishji
aap ki udaan ke saamne to bauna kad pada hai parchaiyon ka, Bahut achi
lagi aapki yeh gazal
था ज़माने की रुसवाई का डर बहुत,
दर्द दिल का किसी को दिखा न सकी.

Hasti hi meri tanha, ik dweep si rahi hai
Charon taraf hai paani, phir bhi bachi hui hai.
Daad kabool ho
saadar
Devi
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© Copyright 2008 Dr M C Gupta (UN: mcgupta44 at Writing.Com). All rights reserved.
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