Entry #626959, added on 12-31-08 @ 5:58 am EST Entry Access Restriction: None.
| Poems / ghazals , no. 951- 975 in Hindi script | Entry #626959 |
९५१. रस्ता जो तुम ने दिखाया न होता—२८ जुलाई की गज़ल, ईके को ३०-७-०७ को प्रेषित
रस्ता जो तुम ने दिखाया न होता
तो मन्ज़िल तलक मैं आया न होता
बख्शी जो तुम ने खुशियां न होतीं
हर्गिज़ कभी मुस्कराया न होता
तुम जो न मिलते ज़माने में मुझ को
किसी और से दिल लगाया न होता
तुम्हारे अलावा किसी और ने भी
नग़मा-ए-उल्फ़त सुनाया न होता
साथी हमारी तो तनहाई होती
अगर तुम ने साथी बनाया न होता.
साये में ग़म के ही जीते ख़लिश हम
दिल पे तुम्हारा जो साया न होता.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२६ जुलाई २००७
९५२. चलते हुए मैं कहीं खो गया हूं—३१ जुलाई की गज़ल, ईके को ३१-७-०७ को प्रेषित
चलते हुए मैं कहीं खो गया हूं
मन्ज़िल से अपनी जुदा हो गया हूं
मुझे खौफ़ ग़म का नहीं अब सताता
गर्दिश की हद तक समझ लो गया हूं
अपनाओ, ठुकराओ, मर्ज़ी तुम्हारी
तुम्हारे करीब आज आ तो गया हूं
जुदाई में कैसे मैं दिल को सम्हालूं
तुम्हें याद कर के मैं फिर रो गया हूं
थकान उम्र भर की उतर जायेगी अब
खलिश आखिरी नींद अब सो गया हूं.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२७ जुलाई २००७
९५३. देखा है उन के हुस्न का जमाल बारहा
देखा है उन के हुस्न का जमाल बारहा
सपनों में बन के आये वो खयाल बारहा
हो के भी मेरे हो सके न दिल से वो कभी
दिल में मेरे रहा यही मलाल बारहा
हारा है वो ही, जंग जो मैदान में जीता
देखा है हम ने ऐसा भी कमाल बारहा
बिन मतला-ओ-मकता रही ये ज़िन्दगी गज़ल
अशआर मेरे गो बने मिसाल बारहा
तहज़ीब-ए-हिन्दुस्तान का क्या राज़ है ख़लिश
ग़ैर-हिन्दियों ने पूछा है सवाल बारहा.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२८ जुलाई २००७
९५४. एक दिन ऐसा ज़माना आयेगा
एक दिन ऐसा ज़माना आयेगा
सिर्फ़ दो गज़ ही निशां रह जायेगा
किसलिये करता है तू अपनों पे नाज़
कोई अपना ही तुझे दफ़नायेगा
जिस की राहों पे सदा चलता रहा
वो ज़माना ही तुझे ठुकरायेगा
सोच मत दुनिया से जाने पर तेरे
कोई न तेरी कमी भर पायेगा
है ख़लिश का दिल बहुत मस्ती भरा
ग़र्दिशों में भी तराने गायेगा.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२९ जुलाई २००७
९५५. खुशियों के इन्तज़ार में क्यों ग़म बढ़ा रहे
खुशियों के इन्तज़ार में क्यों ग़म बढ़ा रहे
वाज़िब नहीं कि फ़िक्र में इंसां पड़ा रहे
रूह पर खुदा की बन्दगी, इबादतों का रंग
चढ़ जाये जो इक बार हमेशा चढ़ा रहे
होता है अल्लाह की रज़ा से सारा कारोबार
इलज़ाम क्यों इंसान के सर पर मढ़ा रहे
फ़ितरत है ये इंसान की पी ले शराब तो
लगता है ज्यों शैतान उस के सर खड़ा रहे
नापाक है ख़लिश बहुत उन की ही ज़िन्दगी
इखलाक का जो कायदा सब को पढ़ा रहे.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२९ जुलाई २००७
९५६. कौन जाने कल कहां खो जायेगा
कौन जाने कल कहां खो जायेगा
आखिरी पल आज का सो जायेगा
ज़िन्दगी भर को न सूखेगा कभी
प्यार का जो बीज वो बो जायेगा
छोड़ कर नेकी बदी की राह पर
शख्स वह पछतायेगा जो जायेगा
आज हम हैं साथ क्या कल की खबर
कोई जाने किस जहां को जायेगा
फ़िक्र कल की किसलिये नाहक करें
जो भी होना है ख़लिश हो जायेगा.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३० जुलाई २००७
९५७. जल रही है ज़िन्दगी इक आग में
जल रही है ज़िन्दगी इक आग में
खेलतीं चिनगारियां हैं फाग में
एक समन्दर में उठा तूफ़ान यूं
फंस गयी नन्ही सी किश्ती झाग में
किस तरह इस से अलग हो कर जिऊं
एक अफ़साना भरा है दाग में
त्याग दुर्योधन की मेवा हो रहे
कृष्ण आनन्दित विदुर के साग में
ज़िन्दगी ने गीत हम को है ख़लिश
क्यों सुनाया बेसुरे से राग में.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३० जुलाई २००७
९५८. हर रोज़ मैं करता रहा गो उस का इन्तज़ार—३ अगस्त २००७ की ग़ैर-मुरद्दफ़ ग़ज़ल, ई-कविता को ३ अगस्त २००७ को प्रेषित
हर रोज़ मैं करता रहा गो उस का इन्तज़ार
उस को न आना था कभी था मुझ को एतबार
देखा न पलट के कभी भेजा न सन्देसा
वो छोड़ कर मुझ को गया है जब से एक बार
अर्थी भी न उठायेगा वो डाल कर पेट्रोल
सपनों में जो आया कभी घोड़े पे हो सवार
लड़ के चुनाव आज बन बैठे हैं जो वज़ीर
हैं ज़ुर्म उन के सर पे ज़माने में बेशुमार
आंसू बहाने से ख़लिश बढ़ती है और याद
अश्कों से निकलता नहीं दिल में भरा गुबार.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३१ जुलाई २००७
९५९. सखि मैं अब धीर धरूं कैसे—२ अगस्त २००७ की कविता, ई-कविता को १ अगस्त २००७ को प्रेषित
आवन कह गये पर न आये
और सपनों से भी न जाये
नयनों में याद आंसू लाये
सखि मैं अब धीर धरूं कैसे
सखियां सब देतीं हैं ताना
जीते जी है अब मर जाना
कैसे हो अब उन को पाना
सखि मैं अब धीर धरूं कैसे
अब नहीं अन्य को है वरना
इस मन में जो है चित्र बना
क्या सम्भव है उस का मिटना
सखि मैं अब धीर धरूं कैसे
मैं खड़ी चौराहे पर बिकती
अब नहीं कोई सूरत दिखती
मैं चाहूं जीवन से मुक्ति
सखि मैं अब धीर धरूं कैसे.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३१ जुलाई २००७
९६०. अब दिल को पत्थर कर लिया—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को ३१ जुलाई २००७को प्रेषित
अब दिल को पत्थर कर लिया
दिल बेखुदी से भर लिया
कांपेगा क्या ये संगदिल
बोसा भी उस ने ग़र लिया
अब तोड़ दीं हैं रस्म सब
दुनिया से काफ़ी डर लिया
उस के ही घर के सामने
मैंने भी अपना घर लिया
न प्यार रुसवा हो ख़लिश
इलज़ाम अपने सर लिया.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
३१ जुलाई २००७
९६१. खुशी खैरात में पाऊं तो न मैं झेल पाऊंगा—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को १ अगस्त २००७ को प्रेषित
खुशी खैरात में पाऊं तो न मैं झेल पाऊंगा
मेरे दिल में भरा है दर्द न मैं खेल पाऊंगा
मैं एकाकी ही आया था मुझे जीना है एकाकी
मैं तनहा ही रहूंगा न किसी का मेल पाऊंगा
बहुत थक सा गया हूं अब नहीं हिम्मत रही मुझ में
ये गाड़ी ज़िन्दगी की किस तरह मैं ठेल पाऊंगा
चमन से दोस्ती कर के मुझे हासिल मिलेगा क्या
नहीं फूलों की मैं कांटों की केवल बेल पाऊंगा
ख़लिश बेहतर यही है कोई मेरा हमसफ़र न हो
किया जो इश्क तो खुद को यकीनन फ़ेल पाऊंगा.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१ अगस्त २००७
९६२. आवाज़ जो तुम दिये जा रहे हो—१ अगस्त २००७ की गज़ल, ई-कविता को १ अगस्त २००७ को प्रेषित
आवाज़ जो तुम दिये जा रहे हो
खुद से छलावा किये जा रहे हो
नहीं आयेगा वो, है मालूम तुम को
क्यों आस झूठी लिये जा रहे हो
आज़ाद सांसों को कर के तो देखो
मरने के डर में जिये जा रहे हो
निकलने दो बाहर जो दिल में छिपा है
क्यों हौंठ अपने सिये जा रहे हो
समझ के ख़लिश कि मसर्रत की मय है
प्याला ज़हर का पिये जा रहे हो.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१ अगस्त २००७
000000000000000
from
"Laxmi N. Gupta" <lngsma@rit.edu> 5:02 pm (11 minutes ago)
date Aug 4, 2007 5:02 PM
बहुत सुन्दर खलिश जी, ख़ास कर:
"आज़ाद सांसों को कर के तो देखो
मरने के डर में जिये जा रहे हो"
लक्ष्मीनारायण
000000000000000000
खलिश जी:
मुझे भी ये शेर बहुत अच्छा लगा ।
>आज़ाद सांसों को कर के तो देखो
>मरने के डर में जिये जा रहे हो"
सादर
अनूप
९६३. चार दिन को वो सूरत दिखा के हमें फिर न आने को जाने कहां चल दिये—६ अगस्त २००७ की ग़ज़ल, ई-कविता को ६ अगस्त २००७ को प्रेषित
चार दिन को वो सूरत दिखा के हमें, फिर न आने को जाने कहां चल दिये
सिर्फ़ कांटे बचे हैं चुभेंगे सदा, फूल खिल के सुहाने कहां चल दिये
ख्वाब देखे बहुत ज़िन्दगी में मगर, वो ज़मीं की हकीकत से टकरा गये
धार दरया की सह न सके कागज़ी किश्तियों के ज़माने कहां चल दिये
जिन को दिल में बिठाया था वो ही मेरा दिल चुरा के किसी और के हो गये
अश्क बहते हैं आंखों से दिन रात अब, प्यार के वो तराने कहां चल दिये
वक्त की ग़र्द में खो गया बालपन, याद माज़ी की धुंधली बहुत हो गयी
गांव की वो गली, झाड़ियां, तितलियां, पुरसुकूं वो ठिकाने कहां चल दिये
बढ़ रही है ख़लिश मेरी तनहाई अब मैं किसी का नहीं कोई मेरा नहीं
इस बुढ़ापे में कैसे बनेंगे नये, मीत जो थे पुराने कहां चल दिये.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१ अगस्त २००७
९६४. गीत मेरे पुराने सभी खो गये—४ अगस्त २००७ की ग़ज़ल, ई-कविता को ४ अगस्त २००७ को प्रेषित
गीत मेरे पुराने सभी खो गये
ख्वाब सारे सुहाने कहीं सो गये
जिन को अब्बा अलिफ़ से, सिखाया कभी
आज हम से अकलमन्द वो हो गये
अब सम्हालो गृहस्थी के फ़र्ज़ों को तुम
जितना हम से बना बोझ हम ढो गये
रह गया है यहां क्या जो देखा नहीं
किसलिये अब जियें आज हम, लो गये
एक दिन वो समर के बनेंगे शज़र
बीज हम जो यहां पर खलिश बो गये.
अब्बा = पिता
अलिफ़ = उर्दू वर्णमाला का पहला अक्षर
समर = फल
शज़र = पेड़
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
२ अगस्त २००७
P९६५. मैं तुम्हारे लिये गीत गाता रहूं, तुम यूं ही दूर से मुस्कराती रहो—५ अगस्त २००७ की ग़ज़ल, ई-कविता को ५ अगस्त २००७ को प्रेषित
मैं तुम्हारे लिये गीत गाता रहूं, तुम यूं ही दूर से मुस्कराती रहो
गीत भावों से अपने सजाता रहूं और दिल के मेरे पास आती रहो
ज़िन्दगी का सफ़र यूं ही कट जायेगा, साथ में कोई होगा अगर हमसफ़र
शर्त ये है कि कोई गज़ल प्यार की, सिर्फ़ नज़रों से अपनी सुनाती रहो
कोई शृंगार प्रिय न अछूता रहे, पुष्प वेणी में कोमल लगाता रहूं
तुम न संकोच कोई करो प्यार में, मेरे दिल में तमन्ना जगाती रहो
मेघ अनथक धरा पर बरसते रहे, प्यास धरती की लेकिन बुझी न कभी
मेरे मन की पिपासा भी बढ़ती रहे, रस कलश से उसे तुम बुझाती रहो
वो भी मन्ज़र ख़लिश एक दिन आयेगा, रंग तुम पे मेरा छायेगा इस तरह
मैं रहूं साथ लेकिन मुझे और भी पास अपने निरंतर बुलाती रहो.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
४ अगस्त २००७
P९६६. आप की जो निगाहों से देखा किये आज खुद पे ही हम को ग़रूर आ गया—बिना तिथि की ग़ज़ल, ई-कविता को ५ अगस्त २००७ को प्रेषित
आप की जो निगाहों से देखा किये, आज खुद पे ही हम को ग़रूर आ गया
चाल में मस्तियां आ गयीं आप ही और आंखों में हलका सरूर आ गया
खेलते हम रहे संग जिन के सदा, आज उन से मिले तो नज़र झुक गयी
कल तलक बालपन की थीं नादानियां, अब जवानी का हम को शऊर आ गया
एक हौले से झौंका हवा का उठा, चूनरी मेरी लहराई मस्ती भरी
एक दिल में अजब गुदगुदी सी हुई, प्यार दिल को हवा पे हज़ूर आ गया
ख्वाब हैं आप के, ख्याल हैं आप के, मेरे होठों पे नगमात हैं आप के
आप ही आप दिखते हैं चारों तरफ़ मेरे दिल पे ये कैसा फ़ितूर आ गया
आप के दिल की दुनिया में चाहे कोई न जगह मिल सके चाह के भी हमें
देख कर कोई भौंरा चमन में ख़लिश, आप का ख्याल दिल में ज़रूर आ गया.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
५ अगस्त २००७
९६७. शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे—ई-कविता को ७ अगस्त २००७ और १५ अक्तूबर २००८ को प्रेषित
http://myfavoritepoets.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%...
or, simply, http://myfavoritepoets.blogspot.com/
फूल तो मसल दिया, विषाक्त शूल बो दिया
सूद को बटोरने में हाय मूल खो दिया
कागजों के फूल बार- बार सूंघते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे
०००
एक दिन कली हसीन मुस्कराई बाग में
स्वप्न था बनेगी फूल वो कभी सुहाग में
किन्तु और ही लिखा था ज़िन्दगी ने भाग में
जल गयी दहेज की छिपी- छिपी सी आग में
जब हमें पता चला, कि है समाज ने छला
सोचते रहे चला कियेगा यूं ही सिलसिला
चादरों में बेखबर, सिर्फ़ ऊंघते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे
०००
सब तरफ़ मची हुई है आज हाय- हाय क्यों
दानवों का राज, देवता हैं निस्सहाय क्यों
काज क्यों बिगड़ रहे हैं सुप्त तुण्डकाय क्यों
छोड़ कर घरों को लोग खोजते सराय क्यों
मंत्र श्राप बन गये, विलोम हो हवन गये
मुस्करा रहे थे कल जो, आज रो नयन गये
मन्ज़िलें तो न मिलीं कि राह खूंदते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे
०००
बुद्धि पर गुमान यूं कि भावनाएं न रहीं
तर्क यूं प्रखर हुए कि मान्यतायें न रहीं
दर्द इस कदर बढ़ा कि वेदनायें न रहीं
धर्म शत्रु बन गये कि मित्रतायें न रहीं
एक शोर सा उठा, बम कोई कहीं फटा
हैं लहू के रंग की आसमान में घटा
असलियत से हम मगर आंख मून्दते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे
०००
दोस्त तो हमें बहुत टोकते रहे सदा
किन्तु अपनी कब्र हम खोदते रहे सदा
राह थी सरल मग़र मोड़ते रहे सदा
झूठ की ही चादरें ओढ़ते रहे सदा
हम पिला रहे थे दूध आस्तीन सांप को
जानते थे तूल दे रहे हैं एक पाप को
नाग-वेणियों में किन्तु फूल गूंथते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे
०००
फूल तो मसल दिया, विषाक्त शूल बो दिया
सूद को बटोरने में हाय मूल खो दिया
कागजों के फूल बार- बार सूंघते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
६ अगस्त २००७
०००००००००
from <pachauriripu@yahoo.com
date Aug 7, 2007 8:23 PM
महेश जी,
वाह !!
बहुत ही बदिया लिखा है। दिल खुश हो गय है।
एक तो जगह कुछ छंद दोश दिख रहा है।
रिपुदमन
०००००००००००००००००००
from Anoop Bhargava
date Aug 7, 2007 9:17 PM
आदरनीय महेश जी:
नीरज जी की तर्ज़ पर अच्छा मुखड़ा है ’अर्थ सब बिखर गये कि शब्द ढूँढते रहे......’
गीतकार जी की खोज में चल रहे विवाद पर आप ने न्यायमूर्ती के रूप में घनश्याम जी , राकेश जी , गीतकार और फ़िर मेरा नाम लिया । आप नें त्रिमूर्ती की संकल्पना अच्छी की , बस यही कह सकता हूँ । 
सादर ..
अनूप
००००००००००००००००००
Wednesday, 15 October, 2008 12:50 AM
From: "Ripudaman" pachauriripu@yahoo.com
महेश जी,
बहुत बड़े अंतराल के बाद आपका कोई गीत पढ़ने को मिला....
रचना बहुत सुन्दर है ...
और यह कुछ पंक्तियाँ विशेष अच्छी लगीं:-
मंत्र श्राप बन गये, विलोम हो हवन गये
मुस्करा रहे थे कल जो, आज रो नयन गये
मन्ज़िलें तो न मिलीं कि राह खूंदते रहे
शब्द लुप्त हो गये, अर्थ ढूंढते रहे
बुद्धि पर गुमान यूं कि भावनाएं न रहीं
तर्क यूं प्रखर हुए कि मान्यतायें न रहीं
आपकी और रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
शुभकामनाएं
~रिपुदमन पचौरी
९६८. तान वह बांसुरी की सुनाता रहा—८ अगस्त २००७ की गज़ल, ई-कविता को ८ अगस्त २००७ को प्रेषित
तान वह बांसुरी की सुनाता रहा
भाव कितने हृदय में जगाता रहा
मुक्त विषयों से रह, विश्व भर के लिये
गीत वह प्रेम का नित्य गाता रहा
कर्म करते रहो, फल मिले न मिले
राह जीने की सब को दिखाता रहा
युद्ध भूमि में कर्तव्य-बोध हेतु वह
धर्म-रस-पान सब को कराता रहा
गोपियों के लिये तो वह कान्हा रहा
चाहे श्रीकृष्ण जग में कहाता रहा.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
८ अगस्त २००७
P९६९. स्वप्न क्यों मैं संजोता रहा रात भर, जानता था सुबह नष्ट हो जायेंगे—९ अगस्त २००७ की गज़ल, ई-कविता को ९ अगस्त २००७ को प्रेषित
स्वप्न क्यों मैं संजोता रहा रात भर, जानता था सुबह नष्ट हो जायेंगे
ग़र बनाओगे ख्वाबों के रंगीं महल, आंख खुलने पे वो पस्त हो जायेंगे
आग घर में थी उस के लगी किन्तु वह था कलाकार निज साधना का धनी
गीत महफ़िल में यह सोच गाता रहा, लोग सुन के सभी मस्त हो जायेंगे
देव दानव ने सागर मथा इसलिये कि पियेंगे जो अमृत तो होंगे अमर
किन्तु शिव ने हलाहल धरा कंठ में, सोच कर कि उभय त्रस्त हो जायेंगे
हैं नशेमन बनाते बड़े शौक से लाख भरते उड़ानें परिन्दे मगर
क्या ख़बर एक तूफ़ान यूं आयेगा, नीड़ पल भर में ही ध्वस्त हो जायेंगे
कर चुके देश आज़ाद बापू ने तब जान दे दी तुरत ही ये बेहतर हुआ
देख उन को ख़लिश कष्ट होता बहुत कि ये नेता सभी भृष्ट हो जायेंगे.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
८ अगस्त २००७
0000000000000000०००
from Kavi Kulwant <kavi_kulwant@yahoo.com>
date Aug 9, 2007 11:40 AM
बहुत कही...खलिश जी..
०००००००००००००००००
from Rakesh Khandelwal <rakesh518@yahoo.com>
date Aug 9, 2007 9:57 PM
किन्तु वह था कलाकार निज साधना का धनी
गीत महफ़िल में यह सोच गाता रहा
सुन्दार लिखा है महेशजी.
सादर
राकेश
००००००००००००००००००
P९७०. कहने को वो दिलरुबा हैं हमारे उन्हें चाहते पर बहुत और भी हैं—बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को ८ अगस्त २००७ को प्रेषित
कहने को वो दिलरुबा हैं हमारे, उन्हें चाहते पर बहुत और भी हैं
फ़न-ए-गज़ल से वो वाकिफ़ नहीं हैं, मगर महफ़िलों के वो सिरमौर भी हैं
खुद को सुखनवर समझते हैं आला, नहीं काफ़िया वो मिलाने के कायल
नसीहत उन्हें कोई दे तो भला क्यूं, करते नहीं वो कभी गौ़र भी हैं
यारो न हम से परेशान होवो, नहीं रास ग़र दोस्ती है हमारी
कहीं ढूंढ लेंगे कोई और महफ़िल, हमें तो बहुत से अभी ठौर भी हैं
नहीं यह गज़ल जो पसन्द आई तो हम कई और नज़्में सुना देंगे तुम को
न ठुकराओ स्वादों भरी है ये थाली, अभी इस में में दूजे कई कौर भी हैं
हिम्मत अभी से ख़लिश हार दोगे, तो पूरा न होगा सफ़र ज़िन्दगी का
हालात-ए-हाज़िर हैं मुश्किल ये माना, आने अभी तो नये दौर भी हैं.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
८ अगस्त २००७
०००००००००००००००००००००
from Devi Nangrani <devi1941@yahoo.com
date Aug 8, 2007 10:58 PM
Mahesh ji
gazal ke is sailaaab se kisi ek sher ko chunna bahut mushkil hai, har
ek mein ek naya paigaam rahta hai.
फ़न-ए-गज़ल से वो वाकिफ़ नहीं हैं,
मगर महफ़िलों के वो सिरमौर भी हैं
कला सीखने की है लँबी ये राहें
किया क्या कभी बैठ कर गौर भी है.
Devi
nayapan tajurbe se hota puraana
tareeke kya iske yahaan aur bhi hain?
kafia radeef pakdne ki koshish ki hai, bas...
bahut acha likhte hain aap, covering every possible field
wishes
Devi
००००००००००००००००
९७१. गम भरे हैं प्यार की राहों में किसलिये—१० अगस्त २००७ की गज़ल, ई-कविता को १० अगस्त २००७ को प्रेषित
गम भरे हैं प्यार की राहों में किसलिये
इतना सुकूं है दर्द की आहों में किसलिये
दीदार को बेताब जो पहले रहा किये
है बेरुखी अब उन की निगाहों में किसलिये
ये ज़ुल्फ़ थीं बायस कभी दिल के करार की
इतनी तपिश है आज इन छाहों में किसलिये
कसमें वफ़ा की आए दिन खाते रहे थे वो
पर आज हैं वो ग़ैर की बाहों में किसलिये
जो मस्त हैं फ़कीर चाह जिन की मिट चुकी
उन की ख़लिश शुमार हो शाहों में किसलिये.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१० अगस्त २००७
९७२. मैंने सोचा पीहर जा कर कुछ दिन मैं आराम करूंगी —बिना तिथि की कविता, ई-कविता को १० अगस्त २००७ को प्रेषित
मैंने सोचा पीहर जा कर कुछ दिन मैं आराम करूंगी
घर की चूल्हा चक्की से मैं दो दिन को तो दूर रहूंगी
मुझ को ये मालूम नहीं था ऐसे मन में पिया समाये
उन से रह कर अलग निरन्तर मन के भीतर कष्ट सहूंगी
बच्चों के दिल से भी याद नहीं अपने पापा की जाती
घर में तो ए सी था लेकिन यहां गांव की धूप सताती
यहां दूरदर्शन है केवल, छत पर एक एन्टेन्ना भर है
केबल टी वी नहीं यहां पर सास बहू की कथा न आती
मोटी मिस्सी रोटी शहरी बच्चों को अब रास न आये
वे तो हैं बर्गर, पिज़्ज़ा और कोका कोला के भरमाये
यहां लगे है उन्हें गन्दगी मक्खी से वे तंग बहुत हैं
कहते हैं अब शहर चलो हम नानी के घर आ कर धाये
हाय नियति दो पाटों में तू ने मुझ को ऐसा कस डाला
इधर गिरूं तो कूंआ है और उधर गिरूं तो गन्दा नाला
पीहर या ससुराल कहां तक दोनों से सम्बन्ध निभाऊं
अब तो वही बना घर मेरा जहां बसे मेरा घर वाला.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१० अगस्त २००७
९७३. कहने को बहुत कुछ है, अल्फ़ाज़ नहीं मिलते—११ अगस्त २००७ की गज़ल, ई-कविता को ११ अगस्त २००७ को प्रेषित
कहने को बहुत कुछ है, अल्फ़ाज़ नहीं मिलते
हैं गीत तो होठों पर, आगाज़ नहीं मिलते
मिलने का वादा तो अकसर वो करते हैं
पर दिल से कभी मेरे सरताज नहीं मिलते
हम मिल लेते हैं खुद, उन का ये आलम है
देते हैं अगर उन को आवाज़ नहीं मिलते
है प्यार बहुत उन से पर ये भी हकीकत है
दो दिल-ओ-दिमागों के अन्दाज़ नहीं मिलते
मरने के वादे तो करना है ख़लिश आसां
जो जान लुटा दें वो जांबाज़ नहीं मिलते.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१० अगस्त २००७
९७४. आज मेरा मन क्यों भरमाए
रंग मेरे जीवन में गये भर
दिये कल्पना को मेरी पर
फिर बिछुड़े वादा झूठा कर
कुछ कहते भी मन सकुचाये
आज मेरा मन क्यों भरमाए
मैंने प्यार की रीत न जानी
रही बहुत अनजान दीवानी
सच्ची समझी प्रेम कहानी
लाज सोच कर मुझ को आये
आज मेरा मन क्यों भरमाए
दुखड़ा अपना किसे सुनाऊं
मन की पीर न कहने पाऊं
ठौर नहीं कोई जो जाऊं
संकट के बादल घिर आये
आज मेरा मन क्यों भरमाए
दुनिया सोचे बात जरा सी
मैं हूं अन्तर्घट तक प्यासी
मन में मेरे भरी उदासी
कोई मरम समझ न पाये
आज मेरा मन क्यों भरमाए.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१० अगस्त २००७
९७५. जब तुम ही नहीं मेरे दुनिया का भरोसा क्या
जब तुम ही नहीं मेरे दुनिया का भरोसा क्या
जब प्यार नहीं दिल में तो नाम का बोसा क्या
दरकार है कपड़े की तन ढकने की खातिर
मोटा झोटा खद्दर और रंगीं कोसा क्या
बेहतर है ज़रूरत हम ग़र अपनी घटा दें तो
जब पेट ही भरना है, रोटी क्या, डोसा क्या
होशियार बनें कितने, रब देखता है सब कुछ
औरौं से ज़माने में छीना और खोसा क्या
बच्चों को बिगाड़ो मत तुम ख़लिश बुराई से
इस पाप के पैसे से पाला और पोसा क्या.
महेश चन्द्र गुप्त खलिश
१० अगस्त २००७
|
© Copyright 2008 Dr M C Gupta (UN: mcgupta44 at Writing.Com). All rights reserved. Dr M C Gupta has granted Writing.Com, its affiliates and its syndicates non-exclusive rights to display this work.
|