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| Poems / ghazals , no. 1201- 1225 in Hindi script | Entry #626972 |
१२०१. मेरे दिल में क्या अरमां है कैसे तुम्हें बताऊं मैं --२९ नवम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को २९ नवम्बर २००७ को प्रेषित
मेरे दिल में क्या अरमां है कैसे तुम्हें बताऊं मैं
मुमकिन है ये नहीं ज़ुबां पर अहसासों को लाऊं मैं
कतरा कतरा कर के कितने ख्वाब संजोये हैं मैंने
पल में सब खोने का ज़ोखिम कैसे भला उठाऊं मैं
डर लगता है कह कर दिल की बात तुम्हें न खो बैठूं
बेहतर है सपनों में जी कर जीवन शेष बिताऊं मैं
अंदर तुम हो बाहर तुम हो, ख्यालों में हो तुम ही तुम
तुम बिन सब सूना लगता है कौन डगर को जाऊं मैं
ख़लिश कोई दिन आयेगा जब समझोगे इस दिल का राज़
ऐसा न हो इस से पहले ही रुखसत कर जाऊं मैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ नवम्बर २००७
१२०२. प्यार निभाओगी या रिश्ता हमें तर्क करना होगा --३० नवम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को ३० नवम्बर २००७ को प्रेषित
प्यार निभाओगी या रिश्ता हमें तर्क करना होगा
अच्छा हूं या बुरा जान कर ही मुझ को वरना होगा
अब न और बदल पाऊंगा अपने को मेरी प्रियतम
आगा पीछा सभी सोच कर पग तुम को धरना होगा
बेहतर है कि अपने दिल की बात ज़ुबां तक ले आयें
जो सच है उस को कहने से कब तक यूं डरना होगा
ये सच है कि प्रेम पंथ में दर्द भरा लेकिन फिर भी
अश्कों को कब तक आंखों से रात-दिवस झरना होगा
ख़लिश फ़ैसला करें साथ चलेंगे हम या बिछुड़ेंगे
मसला है संज़ीदा, जीवन कठिन बहुत वरना होगा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ नवम्बर २००७
१२०३. आज जो तुम से मोहब्बत है रहेगी कल भी
आज जो तुम से मोहब्बत है रहेगी कल भी
राह आयेंगी कठिन और मिलेंगे हल भी
रोज़ पूनम ही नहीं, होती अमावस भी है
यहां खुशियों के ज़माने हैं तो काले पल भी
चार दिन बाद सभी मिल के बिछुड़ जायेंगे
याद आयेगी तो आंखों से गिरेगा जल भी
हाथ पे हाथ रखे बैठ रहे क्या होगा
काम दुनिया में करोगे तो मिलेगा फल भी
आज की रात अगरचे कि बहुत काली है
रौशनी होगी ख़लिश कल की सुबह उज्ज्वल भी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ नवम्बर २००७
१२०४. जब भोर भई सूरज चमका दिन निकला तब दीपक बोला –बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को २९ नवम्बर २००७ को प्रेषित
जब भोर भई, सूरज चमका, दिन निकला, तब दीपक बोला
बिसराओ मत तुम मुझे चमकता देख आग का ये गोला
चढ़ते सूरज को सब प्रणाम करते आये हैं दुनिया में
चिनगारी ही काम आये है, बुझ जाये जब जलता शोला
कुछ देर बरस के सूरज भी जब शाम हुई छिप जायेगा
दुनिया को पहना जायेगा घनघोर तिमिर का फिर चोला
नयनों वाले भी बरबस ही जब नयन-हीन हो जायेंगे
तब मैं ही फिर से आऊंगा, मद्धिम किरणों का ले झोला
सूरज को देख ख़लिश मेरी परवाह नहीं तुझ को रहती
है शून्य बहुत अनमोल, भुला मत, मानव तू कितना भोला.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ नवम्बर २००७
१२०५. हुस्न वही जिस को जी भर के देख नहीं कोई पाये –बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को २९ नवम्बर २००७ को प्रेषित
हुस्न वही जिस को जी भर के देख नहीं कोई पाये
जिस के ज़ुल्फ़-ओ-रुखसारों से नज़र फिसल के लौट आये
वो हसीन है जिस का न दीदार किये इंसां माने
न फिर से देखूंगा ऐसी कितनी ही कसमें खाये
नाज़नीन के अन्दाज़ों का मतलब कैसे समझे कौन
मतलब जो न समझे उस को भी हर एक अदा भाये
हुस्न वही बोले सर चढ़ के करे दिलों का कत्लेआम
फिर बन के मासूम बहुत भोलेपन से जो मुसकाये
ख़लिश गज़ल पहुंचे शायर की ऐसी ही कुछ होती है
समझ न आये पढ़ने वाला फिर भी पढ़ता ही जाये.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ नवम्बर २००७
१२०६. है हर ख़ुशी में ग़म छिपा – २ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को २ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
है हर ख़ुशी में ग़म छिपा
मुसकान में है सितम छिपा
जो छोड़ कर के चल दिया
वो दिल में है हमदम छिपा
मत भूल ये कि बहार का
पतझड़ में है मौसम छिपा
आदम में इक हैवान है
हैवान में आदम छिपा
आवाज़ कुदरत की सुनो
हर शय में है सरगम छिपा
निकला है जो तनहाई में
उस अश्क में प्रीतम छिपा
न नकाब मेरा यूं उठा
इस में है दीदा-ए-नम छिपा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० नवम्बर २००७
१२०७. आज निर्बल बहुत और तनहा हूं मैं, कौन है थाम ले जो मेरे हाथ को
आज निर्बल बहुत और तनहा हूं मैं, कौन है थाम ले जो मेरे हाथ को
आज सम्बल मुझे मीत देता नहीं, मैं तड़पता किसी स्पर्श को, साथ को
कंटकों में घिरा जी रहा हूं ख़ुशी कोई आती नहीं है मेरे पास अब
दिल को बहला रहा हूं तसव्वुर में ला ज़िन्दगी की भुलाई हुई गाथ को
हार कर मुश्किलों से जो बैठा रहा, ज़िन्दगी यूं ही इक दिन गुज़र जायेगी
ग़र जुटायेगा हिम्मत तो जीतेगा तू, पार कर लेगा कांटों भरे पाथ को
जो अकड़ के चला पस्त वो ही हुआ, तू झुका रह मग़र मत गु़लामी को सह
जैसे गांधी लड़ा लड़ तू अन्याय से, कौन काटेगा तेरे झुके माथ को
मूल इच्छा का है दुख सभी ने कहा, अंत तेरे दुखों का भी होगा नहीं
ग़र ख़लिश तू न इच्छाओं को त्याग दे, और करे कर्म फल सौंप कर नाथ को.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० नवम्बर २००७
१२०८. वो क़लम कहां से लाऊं मेरा दर्द जो जता दे –बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को १ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
वो क़लम कहां से लाऊं मेरा दर्द जो जता दे
कोई राज़ शायरी के हम को ज़रा बता दे
कैसे कहूं ग़ज़ल का माहिर मैं हो गया हूं
हो न हो सिर्फ़ कोई इक सिफ़्त-ए-कता दे
तुझ से मिलेगा जो भी, मुझ को कबूल होगा
फिर चाहे मुझ को कोई इलज़ाम-ए-खता दे
मैं तेरे दर से खाली हाथों न जाऊंगा अब
तू दाद दे या चाहे महफ़िल में बस धता दे
गलियों में घूम कर भी तुझ को मैं ढूंढ लूंगा
मुझ को ख़लिश न अपने घर का अग़र पता दे.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ दिसम्बर २००७
तर्ज़--
wo dil kahaan se laaun, teri yaad jo bhula de,
वो दिल कहाँसे लाउँ, तेरी याद जो भुला दे,
लता : भरोसा
वो दिल कहाँसे लाउँ, तेरी याद जो भुला दे,
मुझे याद आनेवाले, कोई रास्ता बता दे,
वो दिल कहाँ से.....
रहेने दे मुझको अपने, क़दमों की खाक़ बन कर,
जो नहीं तुझे गवारा, मुझे खाक़ में मिला दे
वो दिल कहाँ से.....
मेरे दिल ने तुझको चाहा, क्या यही मेरी ख़ता है,
माना ख़ता है लेकिन, ऐसी तो ना सज़ा दे,
वोह दिल कहाँ से.....
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१२०९. लोग कहते हैं ख़ुदा के पास जाओ –४ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को ४ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
लोग कहते हैं ख़ुदा के पास जाओ
मैं कहूं दिल में उसे अपने बिठाओ
एक माया जाल से तुम घिर रहे हो
सिर्फ़ ये दरकार है पर्दा हटाओ
न मिलेगा वो अकड़ जब तक रहेगी
शीश कदमों में जरा उस के झुकाओ
राम, नानक हो कि या ईसा, मोहम्मद
जिस तरह चाहो उसे दिल से बुलाओ
वो ख़लिश हरगिज़ नहीं है दूर तुम से
काश इतनी असलियत तुम जान पाओ.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ दिसम्बर २००७
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from santosh kumar <ksantosh_45@yahoo.co.in
date Dec 5, 2007 2:58 PM
राम, नानक हो कि या ईसा, मोहम्मद
जिस तरह चाहो उसे दिल से बुलाओ
वो ख़लिश हरगिज़ नहीं है दूर तुम से
काश इतनी असलियत तुम जान पाओ.
Khalish Ji
Bahut hee sach kaha hai aapane.
Is aadhyatmit gajal ke liye badhayee.
Santosh Kumar Singh
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१२१०. ठीक कहा दानिशमन्दों ने दुनिया केवल माया है –६ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को ६ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
ठीक कहा दानिशमन्दों ने दुनिया केवल माया है
माया में जो डूब गया उस ने ही धोखा खाया है
देता ही मैं रहा जगत को पर न इस का पेट भरा
आज अगर कुछ मांग लिया तो नाम भिखारी पाया है
मैंने बांटा दर्द सभी का सब के आंसू पौंछे हैं
मेरे दुख को देख न कोई उफ़ तक लब पे लाया है
करते हैं मेहनत ग़रीब और नेता माल उड़ाते हैं
फैला चारों ओर जहां में एक फ़रेबी साया है
बेहतर है न रमें ख़लिश इस इंसानों की बस्ती में
नाम ख़ुदा का लेना ही बस अब तो मन को भाया है.
दानिशमन्द = ज्ञानी
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
५ दिसम्बर २००७
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खलिश जी, रचना अच࣠छी लगी.... आज नीन࣠द नहीं आई, सो जो रचना स࣠बह प࣠नी थी वो आधी रात में ही प࣠ डाली है। ठक ओर भेजिये अच࣠छी सी :) I will be waiting for it. रिप࣠दमन
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सच कह रहे है आप...बहुत खूबसूरत गज़ल हैं...
देता ही मैं रहा जगत को पर न इस का पेट भरा
आज अगर कुछ मांग लिया तो नाम भिखारी पाया है
बहुत सही �¤"र सटीक बात की है आपने...
आप अपना विडियो देख सकते है यहाँ...www.youtube.com/shanoo03
सुनीता(शानू), 7 Dec. 07
एद
R
हमें मत देखिये ऐसे कभी हम भी तुम्हारे थे
जो ये नज़रें चुराते हो, इन्हीं नज़रों के प्यारे थे
नहीं अब रूप पहले की तरह बाकी बचा मेरा
कभी हम आपकी नज़रों में इस दुनिया से न्यारे थे
हिकारत से हमें न देखिये न टूट जाये दिल
कभी मरते थे तुम हम पे, कभी दिल हम पे वारे थे
मुलाकातों में अब न आपकी वो गर्मजोशी है
वो क्या दिन थे कभी आगोश में हमने गुज़ारे थे
ख़लिश क्या कीजिये कि लौट आये वक्त वो बीता
कहा करते थे जब कि जी रहे मेरे सहारे थे.
१२११. हमें मत देखिये ऐसे कभी हम भी तुम्हारे थे –८ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को ८ दिसम्बर २००७ को प्रेषित—RAMAS-R
हमें मत देखिये ऐसे कभी हम भी तुम्हारे थे
जो ये नज़रें चुराते हो, इन्हीं नज़रों के प्यारे थे
नहीं अब रूप पहले की तरह बाकी बचा मेरा
कभी हम आपकी नज़रों में इस दुनिया से न्यारे थे
हिकारत से हमें न देखिये न टूट जाये दिल
कभी मरते थे तुम हम पे, कभी दिल हम पे वारे थे
मुलाकातों में अब न आपकी वो गर्मजोशी है
वो क्या दिन थे कभी आगोश में हमने गुज़ारे थे
ख़लिश क्या कीजिये कि लौट आये वक्त वो बीता
कहा करते थे जब कि जी रहे मेरे सहारे थे.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ दिसम्बर २००७
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from pachauriripu
Dec 8, 2007 11:04 PM
यह ग़ज़ल अच࣠छी लगी।
१२१२. एक शायर लिख गया दिलों की दास्तां –१० दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को १० दिसम्बर २००७ को प्रेषित
एक शायर लिख गया दिलों की दास्तां
एक निशानी दे गया रो के आसमां
कुछ जो हसीन राज़ थे दिलों में छिप रहे
आ के मेरी वो गज़ल में हो गये निहां
बादलों पे तैरने के दिन गुज़र गये
प्यार बन गया है ज़िन्दगी का इम्तिहां
दोस्त जो बुला रहे थे कल तलक मुझे
उन की मेरे वास्ते हैं बन्द खिड़कियां
महफ़िलों के दिन ख़लिश खत्म हो गये
लग रहा है आज कुछ बुझा बुझा समां.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० दिसम्बर २००७
P१२१३. न मुझे आवाज़ देना दोस्तो, जा रहा हूं लौट कर न आऊंगा –११ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को ११ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
न मुझे आवाज़ देना दोस्तो, जा रहा हूं लौट कर न आऊंगा
सिर्फ़ ख्वाबों में मुझे अब पाओगे, न यहां का रुख कभी कर पाऊंगा
जब तलक जीया तुम्हें ग़म ही दिये, तुम गि़ले शिकवे रहे पाले सदा
आज मेरी सब ख़ता तुम बख्श दो, कल यहां से कूच मैं कर जाऊंगा
लाख भूलो तुम मुझे पर एक दिन, जब घिरे होगे कभी तनहाई में
याद आयेगी कभी मेरी सनम, फिर तुम्हारा दिल कभी तड़पाऊंगा
रात दिन मैंने गु़लामों की तरह, इस ज़माने की बजाई हाज़री
अब चला आज़ाद हो इकबारगी, बन के इक बादल कहीं लहराऊंगा
आखिरी लमहे हैं सूरत को मेरी, तुम अग़र चाहो तो आ के देख लो
एक टूटा सा ख़लिश तारा हूं मैं, न पलट के फिर झलक दिखलाऊंगा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० दिसम्बर २००७
from pachauriripu <pachauriripu@yahoo.com
date Dec 11, 2007 8:45 PM
mool geet par maiMne bhee kareeban ek saal pahley ek geet likhaa
thaa :)
aap ki gazal acchi lagi, khalish ji.
वैसे आप सैड-सैड मत लिखा कीजिये; मैं वाकई द࣠खी हो जाता हूं। सादर प࣠रणाम रिप࣠दमन
०००००००००००००
from Rakesh Khandelwal <rakesh518@yahoo.com>
date Dec 11, 2007 9:27 PM
महेशजी, अच࣠छा लगा आपका यह शेर रात दिन मैंने ग़࣠लामों की तरह, इस ज़माने की बजाई हाज़री अब चला आज़ाद हो इकबारगी, बन के फिर बादल कहीं लहरा352ৠंगा सादर राकेश
००००००००००००००
from "sunita(shanoo)" <shanoo03@yahoo.com>
date Dec 11, 2007 9:43 PM
महेश जी आप तो दिल्ली में ही रहते है मुझे भी गज़ल लिखना सीखा दिजिये...बहुत ही भावपूर्ण और खूबसूरत लिखा है आपने...अच्छा लगा...
सादर नमस्कार
सुनीता(शानू)
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from rhymes n roses <rhymes_n_roses@yahoo.ca
date Dec 12, 2007 10:48 PM
This is a very touching piece of poetry,I really felt the nderlying emotions portrayed.How are You ,I hope you are doing well.Takecare ...Anji
000000000000000
from anand krishna <anandkrishan@yahoo.com
date Dec 13, 2007 4:03 PM
Khalish jee aapkee gazal bahut achhi rahi. Is gazal
men ek atrupti aur awsaad kaa bhaav jhalaktaa hai jo
samkaaleen evam yugeen paristhitiyon men samekit
sarokaaron aur sandarbhon se upajtaa hai. Samkaaleen
kavitaa ki dhaara vastutah in nakaaraatmak bhaavon ko
shabdaayit kar unko naye arth de rahi hai aur aap bhi
in anubhootiyon ko saarthak shabd dene men poori tarah
se kaamyaab rahe hain.
Ek achhi rachnaa ke liye badhaayee.
Saadar
anandkrishan "jabalpur"
mob- 09425800818
१२१४. हर रोज़ तुम्हारी मूरत पर मैं फूल चढ़ाया करता हूं
हर रोज़ तुम्हारी मूरत पर मैं फूल चढ़ाया करता हूं
तुम यादों में जब आती हो कुछ नग़मे गाया करता हूं
तुम नहीं, तुम्हारे ख्यालों से ही ख़ुशी मुझे मिल जाती हैं
मन ही मन तुम से मिलने के मैं ख्वाब सजाया करता हूं
ऐसा भी दिन आ जाये कभी जब प्यार करो ख़ुद ही मुझ से
दिल ही दिल में मन्नत अपने मैं रोज़ मनाया करता हूं
यूं तो दुनिया कहती है आशिक बनो नहीं न इश्क करो
तुम से कुछ रिश्ता नहीं, ज़माने को दिखलाया करता हूं
कोई दोस्त अग़र पूछे मुझ से, क्यों हर दम चुप से रहते हो
कोई वज़ह ख़लिश कुछ ख़ास नहीं, उन को बतलाया करता हूं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
११ दिसम्बर २००७
१२१५. गज़ल ख़ुद बन ही जाती है, गज़ल लिखी नहीं जाती –१२ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को १२ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
गज़ल ख़ुद बन ही जाती है, गज़ल लिखी नहीं जाती
मोहब्बत हो ही जाती है, मोहब्बत की नहीं जाती
कभी होती है उलझन इस तरह उल्फ़त के वादों से
कसम तोड़ी नहीं जाती, निभाई भी नहीं जाती
बड़ी तकलीफ़ के होते हैं वो लमहात, चाह कर भी
न आती मौत जब है, ज़िन्दगी भी जी नहीं जाती
अग़र आ जाये बू-ए-बेवफ़ाई मय-ए-उल्फ़त में
ज़हर की घूंट की मानिन्द फिर वो पी नहीं जाती
ख़लिश पड़ जाये कोई गांठ राह-ए-इश्क में तो फिर
हज़ारों कोशिशें कीजे, वो सुलझाई नहीं जाती.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ दिसम्बर २००७
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from Shilpa Bhardwaj <greatshilps@yahoo.com>
date Dec 13, 2007 2:31 AM
अग़र आ जाये बू-ठ-बेवफ़ाई मय-ठ-उल࣠फ़त में ज़हर की घूंट की मानिन࣠द फिर वो पी नहीं जाती खलिश जी, खूबसूरत पंक࣠तियाठ........ शिल࣠पा
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from Sharad Tailang <sharadtailang@yahoo.com>
date Dec 13, 2007 4:38 PM
Khalish ji
Ghazal achchhi hai par yah sher 'Takti' ke hisaab se Bahar se kuchh baahar lag raha hai. Ho sakta hai main sahi na houoon.
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१२१६. जिस दिन हम दोनों एक हुए उस दिन की कहानी क्या कहिये –१४ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को १४३ दिसम्बर २००७ को प्रेषित. ब्लौग पर प्रकाशित
जिस दिन हम दोनों एक हुए उस दिन की कहानी क्या कहिये
एक नूर सा बरपा है रुख पर लफ़्ज़ों की ज़ुबानी क्या कहिये
वो सामने जब आ जाते थे, दिल की धड़कन बढ़ जाती थी
जज़्बात न रहते थे बस में वो ज़ोर-ए-जवानी क्या कहिये
एक प्यार की शय से बढ़ कर कुछ दुनिया में हमें न वाज़िब था
रखते थे जान हथेली पर, वो दिन तूफ़ानी क्या कहिये
बरसात तो थम भी जाती है, आंखें लेकिन थमतीं ही नहीं
बहती है मोहब्बत अश्कों में, अब इन की रवानी क्या कहिये
मुमकिन ऐसा भी हो पाता कि बीते लमहे जी लेते
रह रह के ख़लिश तड़पाती है, वो याद पुरानी क्या कहिये.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ दिसम्बर २००७
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Anoop Bhargava <anoop_bhargava@yahoo.com>
date Dec 14, 2007 12:15 PM
>ठक नूर सा बरपा है र࣠ख पर लफ़࣠ज़ों की ज़࣠बानी क࣠या कहिये बह࣠त खूबसूरत मिसरा है खलिश साहब । सादर अनूप
००००००००००००००
१२१७. रोना किस ने किसे सिखाया, आंसू ख़ुद आ जाते हैं –१३ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को १३ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
रोना किस ने किसे सिखाया, आंसू ख़ुद आ जाते हैं
गज़ल और नग़मों में उन को हम अकसर गा जाते हैं
नहीं मिले हमसफ़र कोई, जब जीवन राहें सूनी हों,
तनहाई के भाव हृदय पर स्वयमेव छा जाते हैं
जब गुरबत हद से बढ़ जाये, हाथ कोई जब न थामे,
खुद अपने आंसू पी कर हम अपने ग़म खा जाते हैं
मुफ़लिस होने पर भी हमने हाथ पसारा नहीं कभी
लेकिन कंजूसी के ताने और सितम ढा जाते हैं
ख़लिश न जाने दुनिया दिल की बात, मग़र अपने रब से
जब दिल मिले इबादत में तब कुछ सुकून पा जाते हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ दिसम्बर २००७
१२१८. क्या होगा आगे पता नहीं —बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को १२-१२-०७ को प्रेषित
क्या होगा आगे पता नहीं
कब सो कर जागे पता नहीं
किस्मत ने आफ़त के गोले
क्यों हम पर दागे पता नहीं
सुलझेंगे कैसे जीवन के
ये उलझे धागे पता नहीं
क्यों सभी असलियत से फिरते
हैं भागे भागे पता नहीं
क्यों अनजाना भी कभी ख़लिश
अपना सा लागे पता नहीं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ दिसम्बर २००७
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from Ghanshyam Gupta <gcgupta56@yahoo.com>
date Dec 14, 2007 7:21 PM
महेश जी,
आपकी रचना सं०१२१८. क्या होगा आगे पता नहीं —बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को १२-१२-०७ को प्रेषित
बहुत सुन्दर लगी। बधाई!
सादर,
- घनश्याम
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१२१९. चल पड़ी ये क़लम अब न रूक पायेगी —बिना तिथि की गज़ल, ई-कविता को १४-१२-०७ को प्रेषित
चल पड़ी ये क़लम अब न रूक पायेगी
भाव दिल के प्रकट आज कर जायेगी
जब तलक मौन था सुप्त थी लेखनी
आज सारे ज़माने से टकरायेगी
अब नहीं ज़ुल्फ़ोरुखसार इस के लिये
आज विद्रोह का गान ये गायेगी
लिख चुकी ये बहुत सिर्फ़ मेरी व्यथा
अब रवानी में ग़म और के लायेगी
मत जियो फ़क्त अपने लिये तुम ख़लिश
बात अब ये ज़माने को समझायेगी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१३ दिसम्बर २००७
१२२०. उन को तो कुछ तकलीफ़ न थी हम नाहक दिल में जला किये
उन को तो कुछ तकलीफ़ न थी हम नाहक दिल में जला किये
चल निकले इश्क की राहों में हम बुरा किये या भला किये
बेखबर रहे हम से ऐसे, जैसे हम को देखा ही नहीं
हम दिल को उन के छू न सके, नज़दीक गये, फ़ासला किये
लमहे उन से मिलने के जो दो चार मुयस्सर हो पाये
बन के आंसू वो प्यार के मंज़र इन पलकों पर पला किये
न प्यार है अब न मिलना है न उन्हें वास्ता है हम से
यादें हैं कि घुस आती हैं हम दिल को चाहे किला किये
वो न आयें तो गिला नहीं अहसान ख़लिश क्या ये कम है
आये हैं तसव्वुर में जब भी यादों का हम सिलसिला किये.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१५ दिसम्बर २००७
१२२१. हम उन से मिलने आये हैं पर उन के दिल को ख़बर नहीं—हिन्दी युग्म में १५-१२-०७ को प्रेषित
हम उन से मिलने आये हैं पर उन के दिल को ख़बर नहीं
होता है फ़रियादों का कुछ उन के दिल पर असर नहीं
उन को अपने दिल में हम बा-अदब बिठाये जाते हैं
मगर बेरुखी दिखलाने में उन ने रखी कसर नहीं
नादां हैं वो बहुत उन्हें कैसे कोई ये समझाये
हो सकता है कभी अकेले इस जीवन का सफ़र नहीं
पा कर हुस्न भला हो जाता है ग़रूर इतना क्योंकर
ख़त का वो जवाब दे देते, मिलना चाहते अगर नहीं
यूं वो कत्लेआम निगाहों से करते हैं रोज़ ख़लिश
हम पर ही क्यों भूले से भी पड़ती उन की नज़र नहीं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१५ दिसम्बर २००७
१२२२. नाखतम उम्मीद है जिस के सहारे जी रहा—१५ दिसम्बर २००७ की गज़ल, ई-कविता को १५ दिसम्बर २००७ को प्रेषित
नाखतम उम्मीद है जिस के सहारे जी रहा
एक मीठा ज़हर है जो रात दिन मैं पी रहा
२ १ ११, ११ २ १, २,११, २, १२२, २,१ २
२१, २२, १११, २, २, २१, ११, २, २, १२
कोशिशें नाकाम हैं मेरी वफ़ा भी है फ़िज़ूल
यूं लगे जैसे दुआ में न असर कुछ भी रहा
उन को हम से बेरुखी है क्या करें फ़रियाद अब
ज़ब्त सब अहसास कर के होंठ अपने सी रहा
दीनोदुनिया से गया चाहा मुझे न मिल सका
यूं बढ़ी दीवानगी मैं बन के सौदाई रहा
लुट गया मैं इश्क में मंज़िल न हासिल हो सकी
न हुआ उन का ख़लिश और न मैं अपना ही रहा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१५ दिसम्बर २००७
१२२३. दे गये गहरे घाव हमें पर उन को ये अठखेली थी
दे गये गहरे घाव हमें पर उन को ये अठखेली थी
क्यों आंखों में अश्क हमारी, उन को एक पहेली थी
दोष किसी को क्या देते हम जब देखा तो पता चला
धुंधली रेखा वाली हम ने पायी एक हथेली थी
सब ने हम से दिल बहलाया अपना दिल पर नहीं दिया
जो भी हम से मिला उसी ने चाल दुरंगी खेली थी
ज़ुलम ज़माने ने वो ढाये सूरत कितनी बदल गई
एक समय था छुई मुई सी दुलहन नई नवेली थी
खलिश नहीं मुश्किल था ख़ुद को बेकसूर साबित करना
चुप रहने की कसम किसी ने लेकिन हम से ले ली थी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१६ दिसम्बर २००७
१२२४. कोई प्यार न करना भूले से
कोई प्यार न करना भूले से
इसरार न करना भूले से
हो जाये अग़र जो प्यार कभी
इज़हार न करना भूले से
तुम दिल से दिल के रिश्ते में
व्यापार न करना भूले से
दिलबर के नाज़ उठाना तुम
तकरार न करना भूले से
ग़र ख़लिश जान भी मांगें वो
इन्कार न करना भूले से.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१६ दिसम्बर २००७
१२२५. कामनाएं त्याग दोगे तुम अग़र संसार में
कामनाएं त्याग दोगे तुम अग़र संसार में
न जियोगे ज़िन्दगी तुम इस कदर बेकार में
ज्ञान, कर्म और भक्ति योगों के न चक्कर में पड़ो
थाम लो उस की शरण जब भी पड़ो मंझधार में
कर्म बन्धन काटने में तुम सफल हो जाओगे
आस्था निष्काम रखो कर्म की तलवार में
ध्यान कर विषयों का उन में संग पैदा कर रहे
कर रहे सूराख इच्छा-शक्ति की दीवार में
चाहे पत्नी चाहे बेटा स्वार्थ है सब में भरा
क्यों उलझ कर रह गये हो तुम ख़लिश घर बार में.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१६ दिसम्बर २००७
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