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Tuesday
February 14, 2012
6:39pm EST


  >> Book >> Cultural >> ID #1510442  |   Show DetailsPrinter Friendly Page Tell A Friend
HINDI POEMS--3, गज़ल
Third part of Hindi poems in Hindi script, mainly ghazals, Serial no. 1226--1775
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Entry #626989, added on 12-31-08 @ 9:19 am EST
   Entry Access Restriction: None.
Poems / ghazals , no. 1276- 1300 in Hindi scriptEntry #626989


१२७६. डूबी हुई अश्कों में तसवीर बनाई है —५ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को ५ जनवरी २००८ को प्रेषित


डूबी हुई अश्कों में तसवीर बनाई है
इज़हारेग़मे-दिल में कैसी रुसवाई है

सांसें तो चलती हैं पर जीते हैं ऐसे
सुनसान बियाबां में गूंजे शहनाई है

नक्कारा बजता है जग के चौराहे पर
ऐसे में तूती की क्योंकर सुनवाई है

हंस के चाहे रो के चुपचाप भुगतनी है
ऊपर वाले ने जो तकदीर बनाई है

हम अश्क छिपाते हैं अपने दिल ही दिल में
दुनिया न ख़लिश देखे यह सख्त मनाही है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
५ जनवरी २००८






१२७७. है आज हुआ सहरा मौसम वो वादी का

है आज हुआ सहरा मौसम वो वादी का
छा गया चमन में मौसम है बरबादी का

होगा इक दिन ये ही मुंसिफ़ या कातिल जो
मम्मी की तमन्ना है अरमान है दादी का

एक गाज़ गिरी ऐसी कान्धे पर जाता है
कल जश्न मनाया था दूल्हे ने शादी का

बेटा भी गया जां से दौलत भी हुई चोरी
जो बचा पुलिस ने वो लूटा फ़रियादी का

कातिल तो बैठा है सरहद के पार कहीं
क्या फ़र्क पड़ेगा इस बेअसर मुनादी का.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
५ जनवरी २००८




१२७८. मौला की मेहरबानी हो तो बन्दा इस काबिल हो जाये —६ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को ६ जनवरी २००८ को प्रेषित


मौला की मेहरबानी हो तो बन्दा इस काबिल हो जाये
मन में इक ख्वाहिश पैदा हो और पल में हासिल हो जाये

तुझ में वो बला की ताकत है पापी भी तेरा दास बने
ग़र तू चाहे तो नाम मेरा भक्तों में शामिल हो जाये

ये नामुमकिन है तेरे बिन इस भवसागर को पार करूं
जो तेरी नज़र की छांव पड़े, मझधार भी साहिल हो जाये

मैं आज अगर मुफ़लिस हूं तो इस में भी रज़ा है तेरी ही
वरना जो दया का दान मिले कंगाल भी कामिल हो जाये

फिरता है अभी खोया खोया दुनिया की गन्दी गलियों में
ग़र इल्म तेरा मिल जाय ख़लिश तो पाक ये ज़ाहिल हो जाये.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
५ जनवरी २००८
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From: "mouli pershad" <cmpershad@yahoo.com>
Date: Sun, 6 Jan 2008 02:43:59 -0800 (PST)
खलिश साहब , आप ने ठीक कहा है - मौला की मेहर्बानी से ही सब कुछ हो सकता है। तभी तो पुरानी मसल मशहूर है - अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान!
0000000000000




१२७९. हर बात पे वे यूं कहते हैं कुछ बात नहीं सब चलता है —८ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को ८ जनवरी २००८ को प्रेषित


हर बात पे वे यूं कहते हैं कुछ बात नहीं सब चलता है
मालूम नहीं उन को दिल पर फ़रमान कोई कब चलता है

ऐसे भी ज़माने आते हैं तदबीर कोई जब न सूझे
कोशिश तो बशर करता है मग़र उस का न कोई ढब चलता है

जब मौत खड़ी हो सिरहाने और चारागर सब हारे हों
इंसान का ज़ोर न चल पाये तो जो़रेख़ुदा तब चलता है

दुनिया में कहर मच जाता है, इंसाफ़ पे आफ़त आती है
सर ले के मुज़ाहिद मज़हब का पैग़ाम कोई जब चलता है

पाक और नापाक जहां सब को मिलता है बराबर का दर्ज़ा
जीने की वहां कुछ चाह नहीं, बदनाम ख़लिश अब चलता है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
७ जनवरी २००८
००
बशर = आदमी
चारागर = चिकित्सक
मुज़ाहिद = विधर्मियों से युद्ध करने वाला [ज़िहाद = धर्म के लिये विधर्मियों से युद्ध]




१२८०. मैंने मन से पूछा इक दिन क्यों तू मुझे सताता है —९ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को ९ जनवरी २००८ को प्रेषित


मैंने मन से पूछा इक दिन क्यों तू मुझे सताता है
मन बोला तू पास मेरे ख़ुद ही तो उठ कर आता है

मैंने कब है तुझे बुलाया, मैं तो अपने में खोया
जाने क्या है बात स्वयं में चैन न तुझ को पाता है

आत्मन्येवात्मना तुष्ट: गीता में है लिखा हुआ
स्तिथप्रज्ञ तो वह है जिस को यह जग नहीं लुभाता है

पहले पास आता है मेरे फिर देता है दोष मुझे
मन से परे रहो गीता का ज्ञान यही बतलाता है

लिप्त रहोगे जग में तो फिर जग का ताप सहोगे तुम
ख़लिश तजो इच्छा विवेक गीता का यह दर्शाता है.

• आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्तिथप्रज्ञस्तदोच्यते—गीता के दूसरे अध्याय के पचपनवें श्लोक से
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
९ जनवरी २००८





१२८१. पंकज सुबीर जी सिखाएंगे हमें गज़ल—हिन्दी युग्म को टिप्पणी के रूप में १०-१-०८ को प्रेषित

पंकज सुबीर जी सिखाएंगे हमें गज़ल
वो शायरों की अब बढ़ायेंगे जरा अकल

लिखना गज़ल न जानिये कुछ काम है आसान
सुधरेगी अब हमारी गज़लों की भी कुछ शकल

जब फ़ख्र से कहेंगे महारत हमें मिली
जाने कभी तो आयेगा ऐसा भी कोई कल

काबिल हमें उस्ताद जी पायेंगे या नहीं
शागिर्दगी को हम तो अब घर से पड़े निकल

ग़ालिब हो चाहे दाग़ या हो ज़ौक या फ़िराक
वाज़िब नहीं ख़लिश करें हम और की नकल.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० जनवरी २००८



१२८२. मेरे दिल से निकली आह –एक और गज़ल, ई-कविता को १०-१-०८ को प्रेषित


मेरे दिल से निकली आह
सुनने वाले बोले वाह

एक बार जो भटक गया
फिर न पायी मैंने राह

पूरी हो गयी उम्र मग़र
रही अधूरी मेरी चाह

नफ़रत में थी घुली हुई
मुझ पर जो भी पड़ी निगाह

आलिम जिये ग़रीबी में
ख़लिश चोर कहलाये शाह.

आलिम = विद्वान

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० जनवरी २००८




१२८३. आप के दम से कलम यह चल रही –एक और गज़ल, ई-कविता को १०-१-०८ को प्रेषित


आप के दम से कलम यह चल रही
पीर है बन के गज़ल निकल रही

आप न मिल पाये तो फिर क्यों जियें
है घड़ी क्यों मौत की अब टल रही

शुक्रिया शायर मुझे बना दिया
बेवफ़ाई आप की अब फल रही

जो दिखाई आपने थी बेरुखी
वो मेरे अशआर में है ढल रही

आप से रिश्ता अदावत का सही
पर जुदाई है ख़लिश ये खल रही.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० जनवरी २००८





१२८४. पूछेंगे अगर जो लोग कभी क्यों अश्क बहाया करते हो

पूछेंगे अगर जो लोग कभी क्यों अश्क बहाया करते हो
हम भी कह देंगे पूछ के यूं क्यों दर्द बढ़ाया करते हो

कोई दिल का हाल अगर हम से जानेगा यही कहेंगे हम
आशिक तो सताया दिल का क्यों और सताया करते हो

हम एक सवाल करेंगे ये ग़र उन की इजाज़त मिल जाये
इन झुकी झुकी सी नज़रों को क्यों और झुकाया करते हो

जो आप वफ़ा करते हैं तो हम ने भी की है कुरबानी
दिल के बदले दिल दे के क्यों अहसान जताया करते हो

हम तो हैं नादां हैं ख़लिश हमें मत इतना भरमाया कीजे
क्यों नये मोहब्बत के हम को अन्दाज़ दिखाया करते हो.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
११ जनवरी २००८





१२८५. लफ़्ज़ों में नहीं कहना मुमकिन रिश्ता जो हमारा उन का है —१२ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को १२ जनवरी २००८ को प्रेषित


लफ़्ज़ों में नहीं कहना मुमकिन रिश्ता जो हमारा उन का है
शायद उन को अहसास नहीं इस दिल को सहारा उन का है

दिल-विल से उन्हें कुछ काम नहीं इस राह नहीं वो गुज़रे हैं
और हम हैं कि अब दिल ये हुआ नाकाम बिचारा उन का है

कर लें वो सितम चाहे जितने हम भी हैं गज़ब के दीवाने
इन प्यार की राहों में हम को हर दर्द गवारा उन का है

आंखें थीं झुकी और गालों पर हलकी सी हया की लाली थी
अब तक इन आंखों में वो ही बस एक नज़ारा उन का है

आलम-ए-जुदाई में गोया जीते हैं खलिश लेकिन हम को
पूरा है यकीं लिखा मिलना किस्मत में दुबारा उन का है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
११ जनवरी २००८

००००

From: "Shilpa Bhardwaj" <greatshilps@yahoo.com>
Date: Sat, 12 Jan 2008 07:50:39 -0800 (PST)

Main kitni taareef karun.. aur kin shabdon mein tareef karun...
Itni acchi gazhal aisa lagta hai... muddaton baad padhi hai...
Baar baar padhi... bahot badhai khalish ji...
Kamaal likha hai...
Bahot hi accha... I am speechless.

Regards
Shilpa

०००००००००००००००००

From: "Praveen Parihar" <p4parihar@yahoo.co.in>
Date: Sat, 12 Jan 2008 18:50:59 +0000 (GMT)

खलिश जी,
बहुत ही बढीया । बधाई ।
प्रवीण परिहार
०००००००००००००







१२८६. रहते हैं वो दिल में मेरे पास नहीं वो आते हैं—१५ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को १५ जनवरी २००८ को प्रेषित

रहते हैं वो दिल में मेरे पास नहीं वो आते हैं
पर मेरी तनहाई में भी दूर नहीं वो जाते हैं

प्यार अगर करते हैं तो इज़हार नहीं करते क्योंकर
क्यों न संग जीने मरने की कसमें अकसर खाते हैं

लफ़्ज़ों से कहते हैं हम को चांद सितारे ला देंगे
भैंट नहीं इक गुंचे की भी कभी भूल से लाते हैं

उन के दिल में क्या है ये चेहरे से पढ़ना मुश्किल है
खिंचे खिंचे रहते हैं जैसे नहीं हमें वो चाहते हैं

ख़लिश उन्हें मालूम नहीं कि वो इस दिल के मालिक हैं
दीवाने बन के हम उन के नग़मे नाहक गाते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ जनवरी २००८
From: "Rakesh Khandelwal" <rakesh518@yahoo.com>
Date: Tue, 15 Jan 2008 14:58:22 -0800 (PST)

महेशजी

खूबसूरत अंदाज़ है आपका. यह शेर विशेष अच्छा लगा:

उन के दिल में क्या है ये चेहरे से पढ़ना मुश्किल है
खिंचे खिंचे रहते हैं जैसे नहीं हमें वो चाहते हैं.

सादर

राकेश
००००००००००००००००







१२८७. दुनिया का फेरा कर के जब सूरज घर को आ जाता है —१४ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को १४ जनवरी २००८ को प्रेषित


दुनिया का फेरा कर के जब सूरज घर को आ जाता है
तब दर्द का साया रातों में मेरे दिल पर छा जाता है

एक कौंधती है बिजली सी जब माज़ी के अंधेरे आंगन में
कोई लमहा बीती यादों का दिल पर सौ ग़म ढा जाता है

ऐसा भी कभी होता है मैं ख्यालों में उन के खोता हूं
पल भर चेहरा दिखता है दिल कुछ देर सुकूं पा जाता है

हैं दोस्त सभी रिश्ते नाते कहने के ज़माने में केवल
तकलीफ़ किसी को हो तो क्या दुनिया में किसी का जाता है

कुछ ऐसा तल्ख ख़लिश हम ने अंज़ामेमोहब्बत देखा है
कोई प्यार का नाम जो लेता है सुन कर दिल घबरा जाता है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ जनवरी २००८




१२८८. तारीफ़ करूं कैसे उन की, किन लफ़्ज़ों में तारीफ़ करूं –एक और गज़ल, ई-कविता को १२-१-०८ को प्रेषित


तारीफ़ करूं कैसे उन की, किन लफ़्ज़ों में तारीफ़ करूं
क्यों न मैं जिऊं उन की खातिर, क्यों उन की अदा पे मैं न मरूं

मंज़िल तो अभी है दूर बहुत, है साथ हसीं दिलवर मेरे
राहें न अलग पर हो जायें, मैं सोच के ये हर गाम डरूं

एक प्यार की शय ही दुनिया में इंसान के दिल पर काबिज़ है
जब प्यार नहीं तो जीना क्यों, डर डर के यहां क्यों पांव धरूं

है जिस ने करी दिल की चोरी उस चोर को तो परवाह नहीं
दिल मेरा हुआ है चोरी और चोरी की सज़ा भी आप भरूं

कुछ और ज़ुबां से कहते हैं, नज़रें कहती हैं उन की कुछ
चाहते या नहीं चाहते हम को, मुश्किल से ख़लिश किस भांत तरूं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ जनवरी २००८



तकल्लुफ़

१२८९. सब प्यार की बातें करते हैं क्या है ये बला जाना न कोई —१३ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को १३ जनवरी २००८ को प्रेषित


सब प्यार की बातें करते हैं क्या है ये बला जाना न कोई
दिल हारते हैं आशिक सारे पर हार कभी माना न कोई

जो प्यार की मंज़िल को निकले उस की फ़ितरत में लाज़िम है
कितने ही चाहे दर्द मिलें उफ़ तक लब पर लाना न कोई

जनमों जनमों का रिश्ता है जो सच्चे प्यार में होता है
बुनियादेइश्क है पाक बहुत झूठी कसमें खाना न कोई

करना चाहते हैं सब कोई आसान नहीं है इश्क मग़र
जो ताब न हो ग़म सहने की इन राहों पर आना न कोई

ज़ालिम है ज़माना कब इस को होता है गवारा इश्क ख़लिश
नग़मा-ए-उल्फ़त दुनिया के आगे हरगिज़ गाना न कोई.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१३ जनवरी २००८

0000

From: "shipra verma" <shipraak@yahoo.co.in>
bahut achchha laga aapki gajal

00000000000000





१२९०. दिल की राहों पर निकले हैं मंज़िल का मालूम नहीं —१६ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को १६ जनवरी २००८ को प्रेषित


दिल की राहों पर निकले हैं मंज़िल का मालूम नहीं
कश्ती तो खेते हैं लेकिन साहिल का मालूम नहीं

गै़र कभी लगते हैं हम को कभी हमारे लगते हैं
हमें प्यार है लेकिन उन के ही दिल का मालूम नहीं

अपने और पराये दोनों कतल यहां पर करते हैं
दुश्मन है या दोस्त इरादा कातिल का मालूम नहीं

ग़ज़ल मुखातिब है जिन को वो भी बैठे हैं महफ़िल में
वो तो समझ गये हैं लेकिन महफ़िल का मालूम नहीं

जिस की महबूबा गै़रों के पहलू को गरमाये है
क्या होगा अंज़ाम ख़लिश उस गाफ़िल का मालूम नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१५ जनवरी २००८





१२९१. मेरे मन में जो होता है कविता में कह जाता हूं

मेरे मन में जो होता है कविता में कह जाता हूं
मैं शब्दों का बाजीगर हूं शब्दों में बह जाता हूं

दर्दों से रिश्ता जोड़ा है नहीं तमन्ना खुशियों की
दुनिया जो भी ग़म देती है मैं सारे सह जाता हूं

माना तुम जवान हो लेकिन मत मुझ को ठोकर मारो
गिरती हुई इमारत हूं मैं लो खुद ही ढह जाता हूं

जो सब के आंसू पौंछे है उस के आंसू पौंछे कौन
सब की प्यास बुझा कर मैं खुद ही प्यासा रह जाता हूं

परवाह नहीं ज़माने की मैं लड़ने नाइंसाफ़ी से
मुझ को चाहे मात मिले या ख़लिश मिले शह, जाता हूं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१५ जनवरी २००८







१२९२. आज हम पे इनायत हुई आप की शोख नज़रों से पैगाम हम को मिला

आज हम पे इनायत हुई आप की शोख नज़रों से पैगा़म हम को मिला
हमसफ़र बन गये आज दोनों सनम क्या सुहाना ये ईनाम हम को मिला

आप हैं संग तो फिर हमें फ़िक्र क्या साथ लमहे मोहब्बत के कट जायेंगे
ज़ुल्फ़ सुलझायेंगे हम करेंगे बहुत शौक से आज जो काम हम को मिला

जब तलक आप हम से मुखातिब न थे ज़िन्दगी में बची थी न कोई ख़ुशी
ये ज़माना हमें यूं सताता रहा नाम आशिक का बदनाम हम को मिला

आज दो दिल हुए एक ऐसी घड़ी अब तलक सिर्फ़ ख्वाबों में देखा किये
हाथ थामा है महफ़िल में बढ़ के सनम एक तोहफ़ा सरेआम हम को मिला

आप दुनिया में सब से हसीं हैं मगर साथ हम को दिया शुक्रिया, शुक्रिया
फ़ख्र करते हैं किस्मत पे अपनी ख़लिश एक इशारे का वो दाम हम को मिला.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१६ जनवरी २००८





१२९३. ये सांसों का चलना जीने का बहाना है —१७ जनवरी २००८ का नग़मा, ई-कविता को १७ जनवरी २००८ को प्रेषित


ये सांसों का चलना जीने का बहाना है
चलती हुई सांसों को इक दिन रुक जाना है

जाने न कोई किस पल राहें रुक जायेंगी
दुनिया से रुखसत का इक राग सुनायेंगी
सांसों का हकीकत में इतना ही फ़साना है
चलती हुई सांसों को इक दिन रुक जाना है

जो आज मुखातिब हैं रंगीन बहारों से
कल हाथ मिलायेंगे अनजान सितारों से
हर सांस पे लगता है गर्दिश का निशाना है
चलती हुई सांसों को इक दिन रुक जाना है

मत गर्व करो इतना अपने रूप और बल पे
विश्वास रखो केवल ईश्वर के संबल पे
आखिर तो मरघट ही इंसां का ठिकाना है
चलती हुई सांसों को इक दिन रुक जाना है

ये सांसों का चलना जीने का बहाना है
चलती हुई सांसों को इक दिन रुक जाना है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१७ जनवरी २००८
[तर्ज़-
संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
एक धुँध से आना है एक धुँध में जाना है
--साहिर, धुंध]




१२९४. मैं चला जा रहा था बहुत बेखबर, ज़िन्दगी आज जाने कहां आ गयी

मैं चला जा रहा था बहुत बेखबर, ज़िन्दगी आज जाने कहां आ गयी
आईने में शकल कुछ दिखी इस तरह, देख खुद को नज़र आज शरमा गयी

उम्र का था तकाज़ा भले या बुरे का मुझे होश कुछ भी न बाकी रहा
फ़र्ज़ भूला, नशे में रहा झूमता, ज़िन्दगी यूं जवानी में भरमा गयी

मैं चला था सफ़र पे तो सोचा किया वादियों की बहारों को ले आऊंगा
पांव सहरा में लेकिन उठे न मेरे, राह पेशेहकीकत से घबरा गयी

ग़र ख़ुशी चाहिये अन्दरूनी तुम्हें तो ख़ुशी की तमन्ना सभी छोड़ दो
चाहते हैं जिसे वो कभी न मिला, कोई शय यूं अकेले में समझा गयी

खो दिया है सभी, पा लिया है उसे, अब ज़माने की कोई भी परवाह नहीं
आज मैं मस्त हूं बेख़ुदी में ख़लिश, एक दीवानगी रूह पर छा गयी.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८




१२९५. तुम थे हमारे, जां से भी प्यारे—RAMAS—ईकविता, २४ सितंबर २००८

तुम थे हमारे, जां से भी प्यारे
हम न हुए पर फिर भी तुम्हारे

दिल में तुम्हारे जगह मिल न पायी
कोशिश बहुत कीं, हर बार हारे

तमन्ना अधूरी रही ये हमेशा
ज़ुल्फ़ें हमारी कोई संवारे

मुमकिन हुआ न, कई ख्वाब देखे
हमें कोई छू ले, हमें भी निखारे

किस्मत नहीं थी ख़लिश ये हमारी
वो पास आएं जिन्हें दिल पुकारे.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८





१२९६. डूबती कश्ती को मैं देखा किया साहिल से

डूबती कश्ती को मैं देखा किया साहिल से
मैंने हर एक तमन्ना को मिटाया दिल से

जिसे नज़रों में बिठाया था गिराया उस ने
क्या ख़ता थी मेरी मैं पूछा किया कातिल से

चोर को माफ़ किया शाह ने पायी है सज़ा
न थी उम्मीद कभी ऐसी मुझे आदिल से

मेरी मुश्किल सभी इक बार खतम हो जायें
काश ताबीज़ मिले ऐसा किसी कामिल से

मैं हूं मामूल ख़लिश रोज़ सजाता मज़मा
एक सिक्का न मिला आज तलक आमिल से.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८






१२९७. मैंने सांसों में फंसे दम को निकलते देखा—२९ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को २९ जनवरी २००८ को प्रेषित--RAMAS


मैंने सांसों में फंसे दम को निकलते देखा
मैंने टूटी हुई सांसों को सम्हलते देखा

मैंने जज़्बात छिपाने का हुनर देखा है
मैंने अश्कों में ग़मेदिल को पिघलते देखा

मैंने रंगीन तमन्ना की नुमाइश देखी
चूर अरमान को सीने में मचलते देखा

मैंने देखा है बुढ़ापे को झुका बोझों से
मैंने पुरजोश जवानी को उछलते देखा

मैंने ख़्वाहिश के बहुत रूप ख़लिश देखे हैं
मैंने बूढ़ों को खिलौनों से बहलते देखा.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८
००००००००००

From: "Himanshi Khare" <himanshikhare@yahoo.com
Date: Tue, 29 Jan 2008 10:28:35 -0800 (PST)
bahut achchi ghazal hai. badhai.
Himanshi
००००००००००००००००








१२९८. इशारों से भरी ये ज़िन्दगी मुझ को नहीं भाती —२८ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को २८ जनवरी २००८ को प्रेषित


इशारों से भरी ये ज़िन्दगी मुझ को नहीं भाती
ये रंग-ओ-बू की दुनिया अब मुझे माफ़िक नहीं आती

अंधेरों से हुई है दोस्ती कुछ इस कदर मेरी
मेरे दिल में कोई भी रौशनी हरकत नहीं लाती

हकीकत की ज़मीं पर पांव रखा है तो जाना है
नहीं हासिल कभी होता है कुछ बनने से जज़्बाती

करो मेहनत कमाओ कुछ भले ही चार पैसे हों
न इज्जत पाओगे ग़र खाओगे तुम सिर्फ़ खैराती

तभी तारीफ़ होगी खूबियां दूल्हे में ग़र होंगी
मिलेगा क्या ख़लिश चाहे सजे हों लाख बाराती.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८
०००००००००००००००

pachauriripu <pachauriripu@yahoo.com> wrote:
खलिश जी,

यह नया ख़याल अच्छा लगा।

तभी तारीफ़ होगी खूबियां दूल्हे में ग़र होंगी
मिलेगा क्या ख़लिश चाहे सजे हों लाख बाराती.
अभी तक ऐसा प्रयोग नहीं देखा न ही ऐसी कोई कहावत सुनी है ( मकते के इस शेर को कहावत की तरह प्रयोग किया जा सकता है )।

तीसरा शेर भी अच्छा है।
०००००००

From: "shipraak" <shipraak@yahoo.co.in>
Date: Mon, 28 Jan 2008 17:26:41 -0000
apki ghazal ne jaise kisi dukhti rag pe hath rakh di--bahut bahut
dhanyawad aur badhai
०००००००००००






१२९९. मेरी आंखों में हसीं ख्वाब बहुत मचले हैं —२५ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को २५ जनवरी २००८ को प्रेषित


मेरी आंखों में हसीं ख्वाब बहुत मचले हैं
मैंने अरमान सजा कर के बहुत कुचले हैं

मैंने अपने को सम्हाला है बहुत राहों में
बाद कोशिश के कदम रोज़ यहां फिसले हैं

मैंने मुस्कान ज़माने में बिखेरी हैं बहुत
मेरी आंखों से तन्हा अश्क बहुत निकले हैं

कोई दुनिया की ज़रूरत भी निभाते होंगे
चाहे बदनाम ज़माने में बहुत चकले हैं

ये मोहब्बत ही नहीं सब से अहम शय है ख़लिश
ज़िन्दगी में तो अहम और बहुत मसले हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८
००००००००००००

From: "Rakesh Khandelwal" <rakesh518@yahoo.com>

Date: Fri, 25 Jan 2008 05:56:30 -0800 (PST)

महेशजी,

अच्छी गज़ल है. यह शेर बहुत पसन्द आया

मैंने मुस्कान ज़माने में बिखेरी हैं बहुत
मेरी आंखों से तन्हा अश्क बहुत निकले हैं

सादर

राकेश

००००००००००००





१३००. मैंने कब अपनी ग़रीबी की शिकायत की है —२१ जनवरी २००८ की गज़ल, ई-कविता को २१ जनवरी २००८ को प्रेषित


मैंने कब अपनी ग़रीबी की शिकायत की है
पर ये सच है कि ग़रीबों की हिमायत की है

रोटियां हक हैं ग़रीबों का, न सोचो लोगो
बांट के टुकड़े ग़रीबों पे इनायत की है

राज करना है तो न छीनो ग़रीबों के हकूक
सीख दुनिया में यही एक सियासत की है

काम ले कर के ग़रीबों से न रोज़ी काटो
ये न सोचो कि कोई तुम ने किफ़ायत की है

आज क्यों भूल रहे हो वो हसीं रस्मेज़कात
याद रखो कि ये मज़हब ने हिदायत की है

क्यों है ताकत पे गु़मां बम जो गिराते हो ख़लिश
नहीं मशरिक की ये फ़ितरत है, विलायत की है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ जनवरी २००८

© Copyright 2008 Dr M C Gupta (UN: mcgupta44 at Writing.Com). All rights reserved.
Dr M C Gupta has granted Writing.Com, its affiliates and its syndicates non-exclusive rights to display this work.


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