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Tuesday
February 14, 2012
11:51pm EST


  >> Book >> Cultural >> ID #1510442  |   Show DetailsPrinter Friendly Page Tell A Friend
HINDI POEMS--3, गज़ल
Third part of Hindi poems in Hindi script, mainly ghazals, Serial no. 1226--1775
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Entry #626996, added on 12-31-08 @ 9:34 am EST
   Entry Access Restriction: None.
Poems / ghazals , no. 1401- 1425 in Hindi scriptEntry #626996



१४०१. तनहाई अब रास आ गयी तनहा तनहा रहता हूं – १९ मार्च २००८ का नग़मा, ई-कविता को १९ मार्च २००८ को प्रेषित


तनहाई अब रास आ गयी तनहा तनहा रहता हूं
पर दिल का ये राज़ किसी से नहीं कभी मैं कहता हूं

कोई मुझ से मिलने आये अब मुझ को दरकार नहीं
अपने से ही कह लेता हूं चुप ही सब ग़म सहता हूं

मुझे सजाने से क्या हासिल एक तीरगी छायी है
बूढ़ी सी हूं एक इमारत न जाने कब ढहता हूं

दुनिया में तिनके से ज्यादा मेरा कोई वज़ूद नहीं
नदी वक्त की बहती है मैं भी उस के संग बहता हूं

जो थोड़ा बाकी वज़ूद है वो भी जब मिट जायेगा
तभी सुकूं होगा रूहानी ख़लिश बात सच कहता हूं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१३ मार्च २००८





१४०२. मैं तुझे यूं सलाम करता हूं

मैं तुझे यूं सलाम करता हूं
जान तेरे ही नाम करता हूं

यही कहता हूं कोई पूछे तो
प्यार का ही मैं काम करता हूं

और किस के लिये जिऊं तुझ को
याद मैं सुबह शाम करता हूं

बंद अपनी ज़ुबान रखता हूं
गिले शिकवे तमाम करता हूं—to change

आप का हूं ख़लिश मैं दीवाना
आज ऐलान आम करता हूं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१३ मार्च २००८




१४०३. मेरे मन में बवाल उठता है – १४ मार्च २००८ का नग़मा, ई-कविता को १४ मार्च २००८ को प्रेषित


मेरे मन में बवाल उठता है
जब भी दिल में खयाल उठता है
तू ने क्यूं बेवफ़ाई की मुझ से
एक बस ये सवाल उठता है

मेरी उल्फ़त में इक सचाई थी
झूठ की शय न कुछ समायी थी
एक शिद्दत थी मेरे दिल में जो
प्यार का नाम ले के आयी थी

तेरे सपने अजीब रंग के थे
तेरे आदाब नये से ढंग के थे
तूने मझधार में मुझे छोड़ा
मैंने सोचा था राही संग के थे

उम्र भर की मुझे तन्हाई है
बात अब ये समझ में आई है
चाहे कितनी वफ़ा करे कोई
मिले अकसर ही बेवफ़ाई है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८





१४०४. तुम ने समझा मेरे आंसू बस चंद बूंद हैं पानी की --– एक और गज़ल, ई-कविता को १४ मार्च २००८ को प्रेषित


तुम ने समझा मेरे आंसू बस चंद बूंद हैं पानी की
दे कर के दर्द ये जतलाया जैसे कोई मेहरबानी की

खारे पानी के कतरों से इन की तुलना करने वाले
हैं झलक मात्र मेरे आंसू दिल की पुरदर्द कहानी की

तुम क्या जानो क्या बीते है दुनिया में औरत के मन पर
औरत की कोख में पलती है मरदों की भूल जवानी की

जो प्यार दिया उस ने एहसास न उस का तो तुम कर पाये
अब चले सफ़र पर तो उस से करते हो मांग निशानी की

अपने जीवन पर नहीं ख़लिश कुछ ज़ोर चले है औरत का
जाने बहाव कब रुक जाये, करते हो बात रवानी की.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८




१४०५. नाप कर रखें कदम, मंज़िल को वो ही पाये हैं --– एक और गज़ल, ई-कविता को १४ मार्च २००८ को प्रेषित


नाप कर रखें कदम, मंज़िल को वो ही पाये हैं
यूं तो कहने को बहुत इन रास्तों पर आये हैं

बज़्म में ग़र बात दिल की हो सुनाना चाहते
तो असूलेशायरी से क्यों कदम भरमाये हैं

दाद मिलती है तभी सुर भी हो, लय हो, ताल भी
यूं तो हर महफ़िल में नग़मे हर किसी ने गाये हैं

हैं जो आदाबेमोहब्बत भूलना मत तुम उन्हें
न कभी सस्ते में हासिल इश्क के सरमाये हैं

जो तज़ुर्बेकार हैं उन की सलाह है पुर-असर
पर ख़लिश चलने से उस पे नौजवां घबराये हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८





१४०६. मैं कायल चित्र बनाने का, पर उन्हें बेचना क्या जानूं—अप्रकाशित रचना, यूनिकवि को १४-३-०८ को प्रेषित

मैं कायल चित्र बनाने का, पर उन्हें बेचना क्या जानूं
यूं ही कविता कह देता हूं रस और लक्षणा क्या जानूं

मैं मूर्तिकार हूं पत्थर में बस प्राण फूंकना आता है
मूरत किस दाम बिकेगी मैं ये कीमत गुनना क्या जानूं

सुर ताल और लय का ज्ञान नहीं जब दिल तड़पे गा लेता हूं
संगीत शास्त्र के नियमों का विश्लेषण करना क्या जानूं

मेरे मन की अभिलाषाएं उड़ती हैं मुक्त गगन में जब
स्वप्निल गाथा बन जाती है, वैसे मैं लिखना क्या जानूं

अनजान ख़लिश पर सरस्वती बस कृपा तुम्हारी बनी रहे
उत्कंठा मन में बनी रहे मैं और भला क्या क्या जानूं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८





१४०७. है कोई आस जो मचलती है – १५ मार्च २००८ का नग़मा, ई-कविता को १५ मार्च २००८ को प्रेषित


है कोई आस जो मचलती है
दिल की हर चाह हाथ मलती है
क्या करूं जानता हूं इंसां की
नहीं किस्मत कभी बदलती है

आज बरबादियों का आलम है
हर तरफ़ बढ़ रहा सितम, ग़म है
न सहारा न दोस्त है कोई
वक्त भी रह गया बहुत कम है

मेरा जीना तो इक बहाना है
मौत को तो ज़रूर आना है
पांव में दम नहीं रहा लेकिन
अभी मंज़िल भी मुझ को पाना है

चलो अब मौत ही चली आये
सारा किस्सा ये ख़त्म हो जाये
थक गया हूं ख़लिश बहुत अब तो
मेरी रूह कुछ निज़ात तो पाये.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८








१४०८. ढूंढता हूं आज वो परछाइयां – १६ मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को १६ मार्च २००८ को प्रेषित--RAMAS


ढूंढता हूं आज वो परछाइयां
खो गयीं जो, रह गयीं तनहाइयां

बज रहीं हैं ज़िंदगी में सब तरफ़
सिर्फ़ सन्नाटों भरी शहनाइयां

ग़म मुझे इतना मिला है बेहिसाब
भर गयीं दिल की सभी गहराइयां

मैं खिजा के फूल की मानिन्द था
रास न आयीं मुझे रानाइयां

राहे-उल्फ़त चल दिया लेकिन ख़लिश
थीं लिखीं तकदीर में रुसवाइयां.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८
रानाई = हुस्न, सुन्दरता
रुसवाई = बदनामी







१४०९. फ़र्ज़ करो हम दोनों इक दिन इक दूजे के हो जायें – १७ मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को १७ मार्च २००८ को प्रेषित


फ़र्ज़ करो हम दोनों इक दिन इक दूजे के हो जायें
दुनिया की सब फ़िक्र भुला इक दूजे में ही खो जायें

फ़र्ज़ करो हम साथ रहें दिन भर और ढेरों बात करें
रात आये तो इक दूजे की बाहों में ही सो जायें

फ़र्ज़ करो हम ख्वाब सुहाने मन की आंखों से देखें
सपनों की दुनिया में खो कर प्रेम नगरिया को जायें

फ़र्ज़ करो दुनिया-ए-उल्फ़त में हम खो जायें ऐसे
वापस न आ पायें कभी इस दुनिया से हम जो जायें

ऐसे में फिर ख़लिश बता देना क्या हम को लाज़िम है
प्रेम नगरिया चलने का तुम करो फ़ैसला तो जायें.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१४ मार्च २००८
• अमीर खुसरो के निम्न नग़मे से प्रेरित हो कर, जिसे मुजफ़्फ़र अली ने कम्पोज किया और छाया गांगुली ने गाया है.

फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों,
फ़र्ज़ करो दिवाने हों...
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें,
झुठे हों अफ़साने हों...

फ़र्ज़ करो ये जी की विपता,
ज़ी से जो सुनाई हो...
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी,
आधी हमने छुपाई हो...

फ़र्ज़ करो तुम्हें खुश करने के,
ढूंढे हमने बहाने हों...
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे,
सचमुच के मयखाने हों...

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झुठा,
झुठी प्रीत हमारी हो...
फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में,
साज़ भी हमपर भारी हो...

फ़र्ज़ करो ये ज़ोग भी झुठा,
हमने ढोंग रचाया हो...
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त,
बाकी सब कुछ माया हो...




१४१०. मेरी तक़दीर में लिखा था शायर एक दिन बनना – १८ मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को १८ मार्च २००८ को प्रेषित


मेरी तक़दीर में लिखा था शायर एक दिन बनना
कलम काग़ज़ छिपा कर जेब में दीवाना हो फिरना

बताऊं ग़र किसी को सोचता मिसरों में हूं हर दम
कहेगा लाज़मी है ख़ब्तगाहों में मुझे रहना

रदीफ़ोकाफ़ियों से काम क्या है आम इंसां को
उसे तो रात दिन रोटी कमाने की जुगत करना

रहे मुफ़लिस हमेशा शायरी पर मरने वाले सब
नहीं फ़ितरत में शायर की कभी दौलत पे है मरना


वो करता बज़्म को रौशन सुकूं देता है हर दिल को
ख़लिश लाज़िम है शायर को शमा बन के सदा जलना.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ मार्च २००८




१४११. कोई मेरी कलम को छीन ले यह हो नहीं सकता --– एक और गज़ल, ई-कविता को १८ मार्च २००८ को प्रेषित


कोई मेरी कलम को छीन ले यह हो नहीं सकता
वज़ह जीने की है मेरी इसे मैं खो नहीं सकता

ये फ़ितरत है मेरी लिखी है हाथों की लकीरों में
ये ऐसा दागे़दिल है चाह कर भी धो नहीं सकता

गज़लगोई खुदा की देन है एहसान है उस का
किताबें पढ़ के इस के बीज इंसां बो नहीं सकता

ये मेरी शायरी ही सिर्फ़ इक दौलत है दुनिया में
लुटा सकता हूं मैं ख़ुद को, लुटा इस को नहीं सकता

गज़ल, अश्कों व दर्दों का, ख़लिश नाता है इक गहरा
गज़ल लिखेगा क्या जो दर्द में भी रो नहीं सकता.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ मार्च २००८
००००००००००००००००००००००

Devi Nangrani <devi1941@yahoo. com> wrote:
mahesh ji
aapki soch ka vistaar aur kalam ki bulandian apne aanchal mein jaane
kitne khayal samet leti hai. mujhe is gazal ka matla ati arthpoorn
laga. ye hamara janm sidh adhikar hai aur akhtiyaar bhi.
kahte hai kalam rachnakar se cheen lo to vahhhhhhhhhhhh. ......... ..!!
aapki rachnaoon ko padna ek anubhav sa hai.
Devi
००००००००००००००००००००००००




१४१२. जब मर्ज़ बहुत ही बढ़ जाये चारागर काम नहीं आते --– एक और गज़ल, ई-कविता को १८ मार्च २००८ को प्रेषित

जब मर्ज़ बहुत ही बढ़ जाये चारागर काम नहीं आते
यादें तो आती रहती हैं मिलने हर शाम नहीं आते

किस्मत को क्यों कोसें अपनी, बेकार उन्हें दिल दे बैठे
सोचा ही नहीं कि सर्दी के मौसम में आम नहीं आते

बोएं खेतों में फ़सल अग़र, लाज़िम है इक अरसा बीते
जादू की तरह तो मेहनत के रंगीं ईनाम नहीं आते

कोई बात नहीं खाली हाथों उन के घर से हम लौट आये
बेहतर होता लेकिन फिर भी हो के बदनाम नहीं आते

सच्ची जो दुआ हो इक दिन तो वो अपना रंग दिखायेगी
पर ख़लिश ख़ुदा के घर से भी यकदम अंज़ाम नहीं आते.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ मार्च २००८




१४१३. आज मिले जो हम और तुम क्या कहिये किस की किस्मत है --– एक और गज़ल, ई-कविता को १८ मार्च २००८ को प्रेषित


आज मिले जो हम और तुम क्या कहिये किस की किस्मत है
नूरेमोहब्बत बरपा है क्या कहिये किस की हिश्मत है

एक ज़रूरत के ही हिस्से मैं और तुम हम दोनों हैं
न कोई राज चलाने वाला और न कोई हश्मत है

कदम कदम हम साथ चलें तो ये रस्ता कट जायेगा
दो दिल साथ धड़कते हों ग़र तभी प्यार की अज़्मत है

अलग अलग थे जब हम दोनों कितनी तब तनहाई थी
आज हमें इक दूजे की फ़ितरत से कितनी निस्बत है

ख़ुदा करे ये सफ़र ख़लिश ता-उम्र कभी भी खत्म न हो
यही राह है, यही है मंज़िल इसी में दिल को फ़ुरसत है.

हिश्मत = इकबाल, श्रेष्ठता
हश्मत = नौकर-चाकर
अज़्मत = महत्व, अहमियत, सम्मान, आदर

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१८ मार्च २००८





१४१४. माना कि ग़मों की आंधी है, पर फूल का मौसम आयेगा – २० मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को २० मार्च २००८ को प्रेषित


माना कि ग़मों की आंधी है, पर फूल का मौसम आयेगा
थिरकेंगे पांव नई धुन पे, मन झूम के नग़मे गायेगा

जब संगीं रात खतम होगी, सूरज झांकेगा अंबर से
मन में नई आशा जागेगी अंधियारा ये छिप जायेगा

हैं ज़ुल्मोसितम टूटे तुम पर, शमशीर भी अब ये टूटेगी
आवाम का जोश बढ़ेगा तो दिल शाहों का थर्रायेगा

मंज़िल तो मिलेगी लेकिन कुछ कुर्बानी तो करनी होगी
जो राहेवतन पर जां देगा तारीखेवतन पर छायेगा

अपनी खातिर तो रो रो कर सब लोग ख़लिश जी लेते हैं
जो हंस के फांसी चढ़ जाये, राह दुनिया को दिखलायेगा.


महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१९ मार्च २००८




१४१५. देते हैं बधाई वो हम को हम सोच के ये चुप रहते हैं -– एक और गज़ल, ई-कविता को १९ मार्च २००८ को प्रेषित


देते हैं बधाई वो हम को हम सोच के ये चुप रहते हैं
ग़ुमनाम सुखनबर वो भी हैं जो हम से आला कहते हैं

कर के जो शोर चौराहे पर माहिर है भीड़ जुटाने के
उन जैसे उथले दरिया तो बरसात में अकसर बहते हैं

जो दर्द उठाती है दिल में होती है तान पपीहे की
हर नुक्कड़ पर यूं तो मेंढक टर-टर ही करते रहते हैं

ये काम नहीं नादानों का, आदाब हैं मुश्किल लिखने के
ग़र नींव न हो मज़बूत महल इक थाप लगे और ढहते हैं

तारीफ़ ख़लिश उस की कीजे जो लिख कर भी चुप रहता है
जो खु़द अपनी तारीफ़ करे उस को बिरले ही सहते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१९ मार्च २००८







१४१६. क्यों आये हो मुझ को समझाने, न समझो मुझ को होश नहीं – २१ मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को २१ मार्च २००८ को प्रेषित


क्यों आये हो मुझ को समझाने, न समझो मुझ को होश नहीं
मालूम मुझे है सब यारो, अनजान नहीं, बेहोश नहीं

मैं जानता हूं महबूब मेरा रहता है ग़ैर के पहलू में
मैं राज़ तुम्हें बतलाता हूं, पहले सा मुझ में जोश नहीं

एक उम्र बितायी है संग में, इस रिश्ते को अब क्या तोड़ूं
मैं रस्मेवफ़ा से वाकिफ़ हूं, मैं बेपरवाह मदहोश नहीं

ये दिल की बातें हैं इन पर न ज़ोर किसी का चलता है
कोई ख़ता नहीं उस की ग़र आता रास मेरा आगोश नहीं

कुछ उस के भी दिल में थोड़ा अफ़सोस कभी होता होगा
है ख़लिश सज़ा काफ़ी इतनी, मैं करता उस पर रोष नहीं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२० मार्च २००८





१४१७. ऐ वतन की हवा, आ मेरे पास आ -– एक और गज़ल, ई-कविता को २१ मार्च २००८ को प्रेषित


ऐ वतन की हवा, आ मेरे पास आ
सरज़मीं की वो ख़ुशबू मेरे पास ला

रंग होली के, वो रागिनी फाग की
वो नज़ारे मुझे आज फिर तू दिखा

आज मैं बेवतन हो गया इस तरह
नाखतम आज तुझ से हुआ फ़ासला

कोई मौका मिले, कोई तदबीर हो
आसमां से चला आऊं पांखें हिला

अब न होगा मिलन, चुक गयी ज़िन्दगी
सिर्फ़ ख्वाबों का है अब ख़लिश सिलसिला.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२१ मार्च २००८






१४१८. मेरी तनहाई ही मेरी बनी हर दम की साथी है -– एक और गज़ल, ई-कविता को २१ मार्च २००८ को प्रेषित


मेरी तनहाई ही मेरी बनी हर दम की साथी है
कभी मुझ को हंसाती है, कभी मुझ को रुलाती है

जवानी की ख़ुशी इकबारगी छा जाये है मन पे
तसव्वुर में कभी तसवीर कोई मुस्कराती है

यकायक फिर बहारों में वो मंज़र याद आता है
सिसकती है वफ़ा जब ख़ून के आंसू बहाती है

कहूं किस से मैं दिल का दर्द जब हद से गुज़रता है
ज़ुबां तो बंद रहती है क़लम तब काम आती है

मेहरबानी है मौला की कि तुकबन्दी जो करता हूं
गज़ल की शक्ल में जाने वो कैसे ढल ही जाती है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२१ मार्च २००८




१४१९. मेरा महबूब ग़र ख़ुद हाथ से तकदीर लिख जाता

मेरा महबूब ग़र ख़ुद हाथ से तकदीर लिख जाता
तो न ये इंतज़ार होता न फिर दिल में मलाल आता

न किस्मत में लिखा था हाथ कोई थामता मेरा
कोई तो राह दिखलाता, कोई मंज़िल पे पहुंचाता

नहीं ऐसा तो कि मज़बूर हूं मैं पांव से अपने
कोई जो हमसफ़र होता मेरे दिल में सुकूं लाता

मग़र मुझ को बदा था मैं जिऊं तनहाई में केवल
अगर मिलता कोई तो दोस्ती वो न निभा पाता

चलो ये वक्तेतनहाई भी अब तो हो चला पूरा
ख़लिश अब चंद दिन का ही बचा दुनिया से है नाता.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२१ मार्च २००८





१४२०. पूरे तो नहीं होते लेकिन सपनों को संजोना अच्छा है

पूरे तो नहीं होते लेकिन सपनों को संजोना अच्छा है
घटता तो नहीं है दर्द मग़र आंखों को भिगोना अच्छा है

कहते हैं असली दोस्त किसी को मुश्किल से ही मिलता है
तनहा रहने की निस्बत कोई दोस्त बनाना अच्छा है

आदाबेसुखन की गहराई तक पहुंच नहीं होती सब की
न दाद मिले, इरशाद मिले, कोई नज़्म सुनाना अच्छा है

कहते हैं जंग और इश्क में सारे दांव लगाना वाज़िब है
रूठा हो अग़र महबूब तो फिर झूठा ही बहाना अच्छा है

जो प्यार की राह पे चलते हैं अकसर धोखा खा जाते हैं
दिल चाहे टूटे ख़लिश मग़र फिर भी तो लगाना अच्छा है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२१ मार्च २००८






१४२१. बेवफ़ाई का जो इलज़ाम लगा है सर पे -– एक और गज़ल, ई-कविता को २१ मार्च २००८ को प्रेषित

बेवफ़ाई का जो / इलज़ाम लगा / है सर पे
क्यूं न सुन के वो / कलेजे में कोई / ग़म तड़पे

शम्म-ए-दिल से / किया प्यार की राह / को रौशन
तेरे कांटों को चुना /अपनी पलक / पर धर के

क्या कहूं मुझ को / मिला ऐसा मोहब्बत में सिला
इश्क की बात चली दिल में हैं शोले भड़के

मैं कोई पीर न / मैं शाह, न मैं / हाकिम हूं
कोई क्यों मुझ से डरे, सर को झुका/ये दर पे

यूं ही इक रोज़ ज़माने से चला / जाऊंगा
कौन है आंख ख़लिश जिस से कि आं/सू ढलके.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२१ मार्च २००८

०००००००००००००

Date: Sun, 23 Mar 2008 00:29:37 -0700 (PDT)
"Ripudaman" pachauriripu@yahoo.com




खलिश जी प्रणाम !


यह आप की ग़ज़ल का संभावित बहर है :-
=============================
बेवफ़ाई का जो / इलज़ाम लगा / है सर पे
2122 2 2 / 11 2 1 12 / 2 11 2
क्यूं न सुन के वो / कलेजे में कोई / ग़म तड़पे
12 1 11 2 2 / 1 22 2 22 / 11 112
शम्म-ए-दिल से / किया प्यार की राह / को रौशन
111-1-11 2 / 1 2 121 2 21 / 2 211
तेरे कांटों को चुना /अपनी पलक / पर धर के
22 2 2 2 12 / 112 111 / 11 11 2
क्या कहूं मुझ को / मिला ऐसा मोहब्बत में सिला
12 12 11 2 / 12 22 21111 2 12
इश्क की बात चली दिल में हैं शोले भड़के
111 2 21 12 11 2 2 22 112
मैं कोई पीर न / मैं शाह, न मैं / हाकिम हूं
2 22 21 2 / 2 21, 1 2 / 211 2
कोई क्यों मुझ से डरे, सर को झुका/ये दर पे
22 12 11 2 12, 11 2 12/ 2 11 2
यूं ही इक रोज़ ज़माने से चला / जाऊंगा
2 2 11 21 1 2 2 2 12 / 22 2
कौन है आंख ख़लिश जिस से कि आं/सू ढलके.
2 1 2 2 1 1 1 1 11 2 1 2 /2 112

=============================
अब पहले मिसरे को अगर देखें तो जो बहर निकलता है वह इस प्रकार है :-
बेवफ़ाई का जो / इलज़ाम लगा / है सर पे
2122 2 2 / 11 2 1 12 / 2 11 2
सो नीचे लिखे हुए किसी भी एक बहर पर बाकी के मिसरे कसे जा सकते हैं :-
2122 2 2 / 2 2 2 2 / 2 11 2
2122 2 2 / 2 2 2 2 / 2 2 2 ***
2122 2 2 / 2 2 1 12 / 2 11 2
2122 2 2 / 2 2 1 12 / 2 2 2
2122 2 2 / 11 2 1 12 / 2 11 2
अब आप देखिए, कि हर मिसरा अलग ही बहर में है| मैं पहले मिसरे का 2nd type of combination ( जिसके आगे तीन सितारे लगे हैं) ले कर आपकी ग़ज़ल कर काम करने की नीचे कोशिश कर रहा हूँ। सभी मिसरो की, A,B,C, D से numbering की है :-
( मिसरा संख्या D और E .. सही न कर सका... हथियार डाल दिए, आप कोशिश कर के देखें )
(A)
बेवफ़ाई का जो / इलज़ाम लगा / है सर पे
2122 2222 2222 2
(B)
अब न सुन के वो / कलेजे में कोई / ग़म तड़पे
2 1 2 2 2 / 1 22 2 22 / 2 2 2 ( यहाँ ’क्यूं’ की जगह ’अब’ लगा दिया है, अर्थ बदल गया है, पर मिसरा कुछ कसा है; ’कलेके’ शब्द का ’क’ बहर बिगाड़ रहा है’ सो {१} या तो कोई ’दो दीर्घ मात्राओं वाला शब्द प्रयोग करें या... {२} ’वो’ और कलेजे के ’क’ की जगह ... एक दीर्घ {२.१} या ऐसा शब्द जिसमें दो लघु हों ...प्रयोग करें)
(C)
शम्म-ए-दिल से / किया प्यार की राह / को रौशन ( यह गलत है )
2 1 2 2 2 / 1 2 121 2 21 / 2 22
कि शम्म-ए-दिल से / राह वफ़ा की / यूं है रौशन ( सही है ... option (अ) )
2 1 2 2 2 / 2 2 2 2 2 2 22
न शम्म-ए-दिल से / राह वफ़ा की / अब है रौशन ( सही है ... option (ब) )
2 1 2 2 2 / 2 2 2 2 2 2 22
(D)
तेरे कांटों को चुना /अपनी पलकों / पर धर के
22 2 2 2 12 / 22 2 2 / 2 2 2
(E)
क्या कहूं मुझ को / मिला ऐसा मोहब्बत में सिला
12 12 2 2 / 12 22 21111 2 12
मोहब्बत क्या यादो में बसती आंधियाँ हैं
2 1 2 2 2 2 2 2 2 2 2 22 2
(F)
इश्क की बात चली दिल में हैं शोले भड़के ( यह पहले से ही सही था, यानि पहले मिसरे से मेल खाता था )
2 1 2 2 2 2 2 2 2 22 2 2
(G)
मैं 'न’ कोई पीर, न / मैं शाह, न मैं / हाकिम हूं ( यहाँ second place पर बस एक ’न’ शब्द लगाने से बहर ठीक हो गया )
2 1 22 -2 2 / 2 2 -2 2 2 2- 2
(H)
कोई क्यों मुझ से डरे, सर को झुका/ये दर पे ( यह गलत है )
22 12 11 2 12, 11 2 12/ 2 2 2
सर झुकाये हर दम और डरे किसलिए मुझसे!
2 1 2 2-2 2 2, 2-2 2 2 2 2
( यह प्रयोग कैसा रहेगा; माफ़ कीजिएगा, मैने, अर्थ, संदर्भ दोनो बदल दिए, पर यह मात्र उदाहरण है )
(I)
यूं ही इक रोज़ ज़माने से चला / जाऊंगा { यहाँ गलती है, पर नीचे मैंने ज़रा सा शब्दों को आगे पीछे किया तो सब ठीक हो गया}
2 2 2 2 2 2 2 2 12 / 22 2
मैं चला / जाऊंगा जब इक रोज़ ज़माने से
2 1 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2
(J)
कौन है आंख ख़लिश जिस से कि आं/सू ढलके.
21 2 2 -2 2 2 2 1 2 2 2 2 ( यहाँ कुछ सुधार करके ..थीक हो जायेगा; जैसे ’कि’ से स्थान पर 'तब’, ’अब’ या ’फिर’ शब्द अगर प्रयोग करें तो यह मिसरा भी 2122 2222 2222 2 बहर में आ जायेगा )
जैसे:-
कौन है आंख ख़लिश जिस से तब आंसू ढलके.
2 1 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2


बाकी अगले पत्र में .....

रिपुदमन पचौरी




१४२२. मुझ पे इलज़ामेबेवफ़ाई है -– एक और गज़ल, ई-कविता को २३ मार्च २००८ को प्रेषित


मुझ पे इलज़ामेबेवफ़ाई है
क्यों हुयी प्यार में रुसवाई है

दिल को देना गुनाह बन बैठा
प्यार करने की सज़ा पायी है

ये भी बाक़ी था देखना मंज़र
आज किस्मत जहां पे लायी है

मैं जो कहता हूं दिल लिया है तो
मुझ से कहते हैं क्या गवाही है

क्या करूं कुछ समझ न आये है
जान पे इस तरह बन आयी है

कोई इतना ख़लिश बताये तो
क्यों ये इलज़ामेबेवफ़ाई है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२२ मार्च २००८





१४२३. फिर आज मना लो तुम होली – २२ मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को २२ मार्च २००८ को प्रेषित


फिर आज मना लो तुम होली
अब शाम खतम दुख की हो ली

कोई घोटे आज ठंडाई को
कोई फांक रहा भंग की गोली

जो कल तक आंख लजाये थी
मस्त आंखों से वह भी बोली

मत डरो, गुलाल मलो मैंने
है नयनों में मस्ती घोली

कोई जीवन सूखा न छूटे
भीगे दामन, भीगे चोली

होली का ले के नाम ख़लिश
सब लाज शरम मैंने खो ली.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२२ मार्च २००८




१४२४. आशा और निराशा दोनों दो पहलू हैं जीवन के -– एक और गज़ल, ई-कविता को २२ मार्च २००८ को प्रेषित

आशा और निराशा दोनों दो पहलू हैं जीवन के
सच्चे भाव दिखाते हैं ये भोले मानव के मन के

चिर आशा में जिया न कोई, आशा कब पूरी होतीं
नहीं मिले जब मनचाहा, टूटें मन माला के मनके

न ही कभी निराशा नित दिन जीवन में छायी रहती
हिम पातों के बाद आते हैं मस्ती के दिन फागन के

आस-निरास, और तिमिर-उजाला क्रम से आते रहते हैं
सूखे पीछे ज्यों आते हैं बादल घिर के सावन के

ख़ुशियां मैंने सभी कबूलीं, ग़म से क्यों मुंह मोड़ूं मैं
ख़लिश ज़रूरी हैं दोनों हिस्से जीवन के दामन के.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२२ मार्च २००८




१४२५. फूल कहां से पाऊंगा मैं जीवन में कांटे बो के – २३ मार्च २००८ की गज़ल, ई-कविता को २३ मार्च २००८ को प्रेषित


फूल कहां से पाऊंगा मैं जीवन में कांटे बो के
मुझ को अपने ग़म सहने हैं तनहाई में रो रो के

किस से करूं शिकायत मेरा कोई नहीं है दुनिया में
यूं ही उम्र कटेगी अब तो जैसे तैसे रो धो के

राम नाम न जपा कभी भी देख बुढा़पा पछताया
भरी जवानी वक्त गंवाया दिन में नाहक सो सो के

वेद कुरान बाइबल सब ने कितना ही समझाया था
लेकिन राह गुनाह की पकड़ी कदम नहीं उस से रोके

अंत समय सर धुनने से अब ख़लिश नहीं कुछ भी होगा
चेत अभी भी तर सकता है शरण प्रभु की तू हो के.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२२ मार्च २००८


© Copyright 2008 Dr M C Gupta (UN: mcgupta44 at Writing.Com). All rights reserved.
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