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| Poems / ghazals , no. 1726- 1750 in Hindi script | Entry #627015 |
१७२६. साथ सुहाना था हमराही जाने क्योंकर रूठ गया--RAS
साथ सुहाना था हमराही जाने क्योंकर रूठ गया
ऐसी ठोकर मारी मेरा प्यार भरा दिल टूट गया
लाख सजाये झूठे सपने नाहक ख़ुद को बहलाया
जो था दिल का भेदी वो ही मेरे दिल को लूट गया
होगा ये अंज़ाम कभी न ऐसा हमने सोचा था
होठों के प्याले से कोई पिला ज़हर का घूंट गया
न चलते हम दिल के पीछे औरों की भी सुन लेते
क्यों सब से रो-रो कर कहते भाग हमारा फूट गया
अच्छा हुआ कि बंधन में बंध जाते इससे पहले ही
प्यार ख़लिश गहरा न पाया रस्ते में ही छूट गया.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१२ अगस्त २००८
१७२७. मिलोगे अब न कभी भी हमसे, आवाज़ दिल से ये आ रही है--RAS
मिलोगे अब न कभी भी हमसे, आवाज़ दिल से ये आ रही है
आ जाये मौत और तुम आ न पाओ ये फ़िक्र हमको सता रही है
बने तो थे हमसफ़र मग़र दो क़दम चले और बिछुड़ गये हैं
हुए थे जिस मंज़िल को मुख़ातिब अभी तलक वो बुला रही है
अकेले रहने की मुश्किलों को समझ न पाये है कोई दूजा
नहीं हो तुम पर तुम्हारी यादों को आज तनहाई ला रही है
न था ये किस्मत में यूं भी होता हमें तुम्हारी वफ़ाएं मिलतीं
सदा तुम्हारी कमी रहेगी नमी ये दिल की बता रही है
ख़लिश ये किस्सा चुक जायेगा न रहे हो तुम और न हम रहेंगे
कहानी छोटी सी ये मोहब्बत की ख़त्म होने अब जा रही है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१५ अगस्त २००८
१७२८. ख़त लिखा न गया न क़लम चल सकी--RAS
ख़त लिखा न गया न क़लम चल सकी
पीर चाह के भी शब्दों में न ढल सकी
प्रीत सब पर जताना मुनासिब न था
चाह ऐसी दबी कि मचल न सकी
कणिका जो नयन कोर में बन गयी
छिप रही, वो सहज ही फिसल न सकी
किंतु मन की घुटन इस तरह कुछ बढ़ी
बूंद पलकों पे आ के संभल न सकी
ख़ाक के तो सुपुर्द हो गयी वो ख़लिश
एक निष्ठुर हृदय को बदल न सकी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२० अगस्त २००८
१७२९. शब्द की गूंज से रह गया मैं ठगा
शब्द की गूंज से रह गया मैं ठगा
अर्थ से मन हमेशा अछूता रहा
भंगिमा का संदेसा तो चीन्हा नहीं
चित्र दिखता मुझे बस अनूठा रहा
कौन जाना पपीहे की मन पीर को
स्वर सुहाने रसीले सभी को लगे
कौन कांटे गिनेगा हृदय के यदि
वेणियों में दिखें पुष्प सुंदर सजे
वह निराकार है किंतु भव रच दिया
गंध से रूप से रंग से जो भरा
एक मानव सरल, एक भोला पथिक
देख राहें सुहानी ठिठक कर रहा
वास्तविकता स्वयं को छिपाये रही
और बन के किरण ज्यों तिमिर छा गया
आंख जब तक खुले सब समय चुक गया
मैं खड़ा शून्य को ताकता भर रहा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२२ अगस्त २००८
१७३०. न हम जानते थे न तुम जानते थे कि मंज़िल पे ऐसी पहुंच जायेंगे हम
न हम जानते थे न तुम जानते थे कि मंज़िल पे ऐसी पहुंच जायेंगे हम
जहां से कदम न कभी मुड़ सकेंगे, कभी लौट कर फिर न आ पायेंगे हम
हमें है ख़बर है कि ये राह पुरख़तर है, बहुत मुश्किलें हैं, बहुत बंदिशें हैं
अग़र साथ सहरा में होगा तुम्हारा तो कांटों पे चल के भी मुस्काएंगे हम
लंबा बहुत ज़िंदगी का सफ़र है, मंज़िल मिली न ही राहें चुकीं हैं
होता नहीं है यकीं उम्र भर को तुम्हारी मोहब्बत में पछतायेंगे हम
न देखो हमारी तरफ़ पर हमारे दिल की तमन्नाओं का ख़्याल कीजे
ग़म तो तुम्हारा सहे जा रहे हैं, कैसे ज़माने को समझायेंगे हम
माना जुदाई में हम जी रहे हैं, मोहब्बत पे लेकिन भरोसा है हमको
तौहीन सच्ची वफ़ा की करोगे तो दुनिया से जा के नहीं आयेंगे हम.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२४ अगस्त २००८
१७३१. मैं हमेशा दर्द दिल का हाय छिपाता रहा--RAS
मैं हमेशा दर्द दिल का हाय छिपाता रहा
बेरहम हो दिल की तमन्नाएं दबाता रहा
जिस किसी के काम आया, बेरुखी से चल दिया
इस ज़माने में सभी से बस यही नाता रहा
जब तलक जिया कभी मैंने ख़ुशी देखी नहीं
रौनकें औरों की ख़ातिर रोज़ जुटाता रहा
मैंने सोचा था कि सच्चे प्यार में तासीर है
बेवफ़ा के दर पे सर हर बार झुकाता रहा
कौन समझेगा ख़लिश लाचार अश्कों की ज़ुबां
आंसुओं की दौलतें बेकार लुटाता रहा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२५ अगस्त २००८
१७३२. दिल मेरा रब के बिना सरता नहीं
दिल मेरा रब के बिना सरता नहीं
मन मेरा करने को कुछ करता नहीं
क्यों करूं मैं फ़िक्र भूख और मर्ज़ की
वो न चाहे तो कोई मरता नहीं
खार चुनने चाहियें ख़ुद पांव से
पीर दूजे की कोई हरता नहीं
अब न दौलत की मुझे ख़्वाहिश रही
पाप की गठरी कभी भरता नहीं
एक रूहानी सफ़र पर चल पड़ा
अब ख़लिश अंज़ाम से डरता नहीं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२६ अगस्त २००८
१७३३. एक बात बताऊं सखि ऐ री--RAS
एक बात बताऊं सखि ऐ री
दुनिया कोई लूट गया मेरी
कहने को दिल की रानी थी
पर बना रखा मुझको चेरी
जब गया तो कड़वी-मीठी सी
यादों की छोड़ गया ढेरी
जब तक मैं कुछ सुधि ले पाती
हो गयी बहुत तब तक देरी
कुछ तू ही बता उपाय मुझे
है मुझे ज़रूरत अब तेरी
कितनी ही अपशंकाओं की
नित लगती है मन में फेरी
अब किसी तरह मौत आ जाये
मेरे सारे दुख हर ले री.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अगस्त २००८
१७३४. मैं प्यार तो तुमसे कर लूं एक शक है जो मन में आता है--RAS
मैं प्यार तो तुमसे कर लूं एक शक है जो मन में आता है
उठती है दिल में बात यही क्या तुमसे मेरा नाता है
पल भर का मिलना जीवन भर मुझको दुश्वार न हो जाये
बरबाद अग़र मैं हो जाऊं, कुछ भी न तुम्हारा जाता है
कानून ज़माने के सारे औरत के पांव की बेड़ी हैं
वह दर्द सहे चाहे कितने पर मर्द खड़ा मुस्काता है
तुम मुझसे प्यार निभाओगे कुछ ये तो मुझे भरोसा हो
एक ख़्याल यही मेरे मन को रह-रह कर के भरमाता है
जो भोली सूरत रखते हैं वो दिल के काले होते हैं
अंज़ामे-मोहब्बत आशिक को एक बात यही सिखलाता है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अगस्त २००८
१७३५. क्या करूं मैं ज़िंदगी मेरी हुयी नाकाम है-- RAS
क्या करूं मैं ज़िंदगी मेरी हुयी नाकाम है
दिन कटे है गर्दिशों में और तनहा शाम है
चल रहा हूं रास्ते लेकिन ख़तम होते नहीं
एक लमहा भी मुझे न मिल सका आराम है
जो मिले वो साथ दो पल का निभा कर चल दिये
तर्क की है दोस्ती, मुझ पर मग़र इल्ज़ाम है
कब तलक उलझाओगी मुझको तमन्नाओ मेरी
नाम तो मेरा तुम्हारी वज़ह से बदनाम है
अलविदा ऐ दोस्त मेरे अब न मिलेंगे ख़लिश
वक्ते-रुख़्सत हो गया, ये आ रहा पैग़ाम है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३१ अगस्त २००८
१७३६. राह अनजानी है, चले हम जाते हैं--RAS
राह अनजानी है, चले हम जाते हैं
यूं ही किसी मंज़र पर पांव थम जाते हैं
बाद मुद्दत के बहुत मिले हैं हम दोनों
चलें उस ओर जहां लोग कम जाते हैं
न हो तू साथ सनम तो सफ़र मुश्किल है
तू अग़र मिल जाये सभी ग़म जाते हैं
तू मिलेगा या नहीं, नहीं इसकी है ख़बर
तेरी गलियों में मग़र ये कदम जाते हैं
ये जवां ज़िस्म ख़लिश, और मोहब्बत का असर
वर्ना इस बर्फ़ में तो ख़ून जम जाते हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ सितंबर २००८
तर्ज़—
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
सुरमई उजाला है, चम्पई अंधेरा है
१७३७. चलते चलते राहों में रिश्ते बन जाते हैं--RAS
चलते चलते राहों में रिश्ते बन जाते हैं
दोस्त कुछ खोते हैं,कुछ नये आते हैं
न अकेले मुमकिन ज़िंदगी का ये सफ़र
दिन तनहाई के बहुत सताते हैं
कोई अच्छा या बुरा नहीं होता है बशर
नाहक ज़माने में तोहमत लगाते हैं
प्यार लाज़िम तो नहीं, कोई न करे, न करे
झूठे वादों से क्यों लोग भरमाते हैं
ये मोहब्बत का असर नहीं तो क्या है ख़लिश
नज़रें मिलाते हुये, आप शरमाते हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ सितंबर २००८
तर्ज़—
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
सुरमई उजाला है, चम्पई अंधेरा है
१७३८. ज़िंदगी का फ़ैसला मेरा कहीं होता रहा--RAS
ज़िंदगी का फ़ैसला मेरा कहीं होता रहा
बेख़बर सा मैं यहां गफ़लत भरा सोता रहा
पैरवी जो कर रहे थे हो गये मेरे ख़िलाफ़
चाल टेढ़ी थी न समझी, वक्त मैं खोता रहा
जो दलीलें पेश कीं वो फ़ेल सारी हो गयीं
अक्ल पे जो था भरोसा वो महज़ थोथा रहा
सोचता था एक दिन गुलशन में आयेगी बहार
बीज निकले खार के जो उम्र भर बोता रहा
कूद कर दरया में बाहर न ख़लिश मैं आ सका
ज़िंदगी की राह का ये आखिरी गोता रहा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२ सितंबर २००८
१७३९. बज़्म में हालत पे मेरी न किसीका ध्यान है--RAS
बज़्म में हालत पे मेरी न किसीका ध्यान है
कोई भी मेरा नहीं सारा शहर अनजान है
मुफ़लिसी को छोड़ कोई भी नहीं है हमसफ़र
बेच डाला है सभी कुछ इक बचा ईमान है
भीड़ है चारागरों की पर दवा कोई नहीं
बांटता हर मोड़ पर पुड़िया कोई लुकमान है
कोई भी ऐसा नहीं जो वक्ते-रुख़्सत दे विदा
जान क्यों सब पर लुटायी, सोच दिल हैरान है
चल दफ़ा हो तू दरे-ज़न्नत पे कैसे आ गया
यूं ख़लिश पूछे ख़ुदा के महल का दरबान है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२ सितंबर २००८
१७४०. सामने मंज़िल खड़ी थी हम मग़र न पा सके
सामने मंज़िल खड़ी थी हम मग़र न पा सके
पांव में थीं बेड़ियां आगे कदम न जा सके
क्या बतायें ये सबब कि क्यों रहे नाकाम हम
जा सके न हम, हमारे पास वो न आ सके
जो तमन्ना थी हमारी न कभी पूरी हुयी
बात अपने दिल की औरों से न हम मनवा सके
यूं तो दुनिया को शिकायत थी नहीं हम से कोई
क्या मग़र रिश्ता हमारा है न ये समझा सके
कुछ मेरी मज़बूरियां थीं कुछ तुम्हारी बंदिशें
ख़्वाब तो देखे ख़लिश अंज़ाम तक न ला सके.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ सितंबर २००८
१७४१. क्यों समझ बैठे मुझे तुम देवता, एक मामूली सा मैं इंसान हूं--RAS
क्यों समझ बैठे मुझे तुम देवता, एक मामूली सा मैं इंसान हूं
सच कहूं तो ख़्याल आता है मुझे, शायद एक इंसांनुमां हैवान हूं
न मुझे ऊंचा बिठाओ इस तरह, फिर ज़मीं पर मैं कभी न आ सकूं
यूं न हो मैं भी यही कहने लगूं, आदमी की शक्ल में भगवान हूं
दूर से जो ढोल सुहाते हैं वो, पास से बर्दाश्त हो सकते नहीं
इस कहावत में बहुत सच्चाई है, मैं नहीं इस तथ्य से अनजान हूं
है मुनासिब दोस्ती के बावज़ूद, एक झीना सा बना परदा रहे
पास मेरे इस तरह आओ न तुम, भेद खुल जायेगा कि शैतान हूं
हैं बहुत कमज़ोरियां भीतर मेरे, दिल, दिमाग़ो-जिस्म की, इखलाक की
क्या दिखा मुझमें कि मेरे हो गये, बस ख़लिश यह सोच कर हैरान हूं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ सितंबर २००८
१७४२. ज़िंदगी में एक ग़म ही तो मेरी पहचान है--RAS
ज़िंदगी में एक ग़म ही तो मेरी पहचान है
जो मुझे ग़म दे गया उसका बहुत एहसान है
ये अलग सी बात है मुझसे वफ़ा न कर सका
राह में उसकी मेरा दिल अब तलक कुर्बान है
क्यों करूं इंसान की परवाह दुनिया में मेरा
कोई भी बेशक नहीं पर संग में दीवान है
न दिया न कोई मंज़िल न है कोई हमसफ़र
चल रहा हूं रास्ता मेरा मग़र सुनसान है
राह में ही टूट जाये सांस मेरी ग़र ख़लिश
लोग तो दफ़ना ही देंगे, ज्यों बशर अनजान है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ सितंबर २००८
१७४३. अनजान रहे वो पहलू में और हम रोये हैं रातों में--RAS
अनजान रहे वो पहलू में और हम रोये हैं रातों में
है असर ज़हर से भी कड़वा उनकी बातों की घातों में
दिल के एहसासों को लफ़्ज़ों में समझाना नामुमकिन है
खालीपन भरा हुआ है मानो हम दोनों के नातों में
उनको तो अच्छी लगतीं हैं दिन रात बहस और तकरीरें
और हमको अच्छा लगता है जीना दिल के जज़्बातों में
कहने को तो हम पर अपनी वो जान निछावर करते हैं
पर रंगेवफ़ा भी तो दिखता कुछ हमको उनकी बातों में
हम नाज़ुक दिल के मालिक हैं वो मालिक हैं तक़दीरों के
कोई हमें बता दे ख़लिश जियें हम कैसे इन हालातों में.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ सितंबर २००८
१७४४. काली घटा के साये घिर-घिर के आ रहे हैं
काली घटा के साये घिर-घिर के आ रहे हैं
तनहाई और ये मौसम मुझको डरा रहे हैं
छोटी सी जान है और ये दिल धड़क रहा है
हालत को देख मेरी वो मुस्करा रहे हैं
कौन है जो हाथ थामे, कौन है सहारा दे जो
और लोग हैं कि ज़बरन मुझको गिरा रहे हैं
वहशत तो उनकी देखो वो तोड़ने को हिम्मत
बर्बादियों के किस्से मुझको सुना रहे हैं
क्या हाल होगा मेरा, अल्लाह तुम्हीं हो हाफ़िज़
तारीक अब अंधेरे आंखों में छा रहे हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
५ सितंबर २००८
१७४५. आपने अच्छा कहा, दिल और अच्छा हो गया—RAS—ईकविता, ५ सितंबर २००८
आपने अच्छा कहा, दिल और अच्छा हो गया
आपकी तारीफ़ सुन कर बादलों में खो गया
आप और वो आपकी बातें लगें प्यारी बहुत
आप आयें ख़्वाब में यह सोचते मैं सो गया
सोच कर कि आंसुओं से गु़ल खिलाऊंगा यहां
बीज अपने प्यार के मैं आपके दर बो गया
आप हैं नाराज़ तो फ़िलहाल तो मैं मुड़ चला
न समझ लेना बला छूटी कि बंदा लो गया
लौट कर वापस ख़लिश मैं आऊंगा अगले जनम
इस जनम में बिन तुम्हें पाये जहां से गो गया.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
५ सितंबर २००८
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Thursday, 11 September, 2008 2:18 AM
From: "Ms Archana Panda" panda_archana@yahoo.com
नमस्कार खालिशजी,
आप हमारी तारीफ़ कर रहे हैं !
ऐसा लगता है जैसे सूरज दीये से कहे की तुझमे कितनी रोशनी है !!!
हमारा करियर तो अभी कुछ बना ही नहीं है | करियर तो आपका देखना चाहिए |
मेडीसिन में आपने जो बुक लिखी है वो आज तक लोग पढ़ते हैं |
हम जैसे लोग तो एक जॉब ठीक से नहीं कर पाते हैं , आपने मेडीसिन से law में कितनी आसानी से स्विच कर लिया और उसमे भी बड़ा नाम किया है ! और फिर उसके साथ साथ साहित्य सेवा ... आपसे सीखना चाहिए की multi-tasking कैसे करना चाहिए | Just awesome !
लेकिन हम आपकी शुभ कामनाओं को माथे से लगाकर स्वीकार करते हैं | आपको इ कविता के एंट्री के दिन से ही उस्ताद माना है | आपके कहे अनुसार , अब हम पद्य और गद्य दोनों में ही लिखने की कोशिश करेंगे |
आशा है आपकी छत्र छाया यूं ही इ कविता के सभी सदस्यों पर बनी रहेगी !
आपसे बस एक अनुरोध है की आप दुःख भरे गीतों की जगह पर खूब प्यार भरे , या मस्ती भरे या हँसी वाले गीत लिखिए | कहते हैं, अगर हम ख़ुद दुखी हैं तो सबसे अच्छा काम यह कर सकते हैं की अन्य दुखी जनों को खुशी और हिम्मत दें |
फिर हमारा दुःख स्वतः ही उड़ जाएगा |
सॉरी ज़्यादा तो नहीं कह गई .... अच्छा अब चुप !
अरे हाँ ! आपकी ये कविता "१७४५. आपने अच्छा कहा, दिल और अच्छा हो गया" सही में class थी !
चलिए , शेष अगली बार ,
अर्चना
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१७४६. सुनो दोस्तो आज बताऊं गज़लों से क्या पाया है—RAS—ईकविता, ७ सितंबर २००८
सुनो दोस्तो आज बताऊं गज़लों से क्या पाया है
गज़ल हज़ारों लिख डालीं, न धेला एक कमाया है
लड़की कोई पटी नहीं, बस पढ़ कर वाह-वाह करती हैं
और उन्हें क्या लाज़िम है यह भेद समझ न आया है
इतने में तो सच कहता हूं लाखों नोट कमा लेता
जितना वक्त गज़ल लिखने में दिन और रात लगाया है
कभी-कभी तो ऐसा लगता है मुझको कि नाहक ही
एक ज़ुनूं में खो कर मैंने सारा वक्त गंवाया है
तभी ख़लिश आवाज़ कहीं से आती है बंदे इसमें
रज़ा है मेरी मैंने ही तो ये फ़न तुझे सिखाया है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
७ सितंबर २००८
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abhi aadarneey khalish jee kee ghazal pad kar main digbhramit ho gayaa hun. dushyant jee ke sher se ghazal likhne kee jo prernaa milee thee use khalish jee kee ghazal ke ek sher ne choor choor kar diyaa-!!!!!
anand
१७४७. एक दिन हाथों से मेरे लेखनी छुट जायेगी यह—
एक दिन हाथों से मेरे लेखनी छुट जायेगी यह
और स्पंदन नाड़ियों का साथ आखिर छोड़ देगा
आंख स्फटिक-खंड सी भर टकटकी देखा करेंगी
स्वप्न की रंगीनियों की पर झलक उनमें न होगी
आज मेरे हृदय में जो भाव उठते हैं निरंतर
आज जो मस्तिष्क मेरा कर रहा गणनाएं प्रतिपल
यह सभी थम जायेगा बस शांति होगी चिर- स्थायी
और जिसका अंश है उसमें मिलन हो जायेगा फिर
जब न होगा पिंड तो फिर बिम्ब भी क्योंकर रहेगा
जब न होगा मन भला फिर भावनाएं क्यों उठेंगी
न रहेगी लेखनी तो क्यों कोई कविता बनेगी
किंतु जीवन अनवरत संसार में यूं ही चलेगा.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ सितंबर २००८
१७४८. शायरी ही बस मेरी पहचान है
शायरी ही बस मेरी पहचान है
शायरी मेरी क़लम की जान है
हैं जवां जज़्बे तो कोई ग़म नहीं
ज़ाहिरी दुनिया अग़र सुनसान है
और क्या दुनिया में मुझको चाहिये
एक मैं हूं एक मेरा दीवान है
इक लंगोटी, चार रोटियां इक क़लम
और क्या लाज़िम मुझे सामान है
क्यों न अब तक था हुआ अहसास ये
सोच कर होता ख़लिश हैरान है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ सितंबर २००८
एद
१७४९. उठ गयी माँ के आंचल की इक कोमल कौंपल से छाया--RAS
उठ गयी माँ के आंचल की इक कोमल कौंपल से छाया
आज किसी के आंसू देखे, फिर मेरा मन भर आया
माता के स्तनों से वंचित फिर कोई नवजात शिशु
त्याग दिया दुनिया के डर से आज किसी माँ ने जाया
क्या जंगल का न्याय कहें या इसको कोरा वहशीपन
जिसका कोई कसूर नहीं दंड क्यों उसने ऐसा पाया
कोई पलता है महलों में और फ़रिश्ता कहलाये
कोई धूल सना है सिर पर बदनामी का है साया
कैसा भाग्य ख़लिश नारी का, प्रेमी द्वारा छली गयी
जनमा जिसको कोख से अपनी, जग का दुश्मन कहलाया.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ सितंबर २००८
Ed
१७५०. विदित मुझे है मेरे ऊपर लांछन लोग लगायेंगे--RAS
विदित मुझे है मेरे ऊपर लांछन लोग लगायेंगे
कुलटा, वेश्या, कलुषित कह कर गलियों मुझे बुलायेंगे
क्यों एतराज़ मुझे हो चाहे कोई सज़ा मुझको दे दो
कैसे करूं गवारा ताने सुत को रोज़ सुनायेंगे
क्या उसको मैं उत्तर दूंगी जब मज़हब के ठेकेदार
बाप कहां है उसके माध्यम से मुझसे पुछवायेंगे
बातों-बातों में मुझसे वो बातें पूछी जायेंगी
पूछ रहे जो ख़ुद उनका उत्तर देते शरमायेंगे
लड़ना है मुझको ख़ुद ही इस मन के झंझावातों से
ख़लिश भला क्यों लूटा जिनने हाथ बढ़ाने आयेंगे.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ सितंबर २००८
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