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Tuesday
February 14, 2012
11:06pm EST


  >> Book >> Cultural >> ID #1510519  |   Show DetailsPrinter Friendly Page Tell A Friend
HINDI POEMS--4, गज़ल
Book 4 of my collection of Hindi poems, mainly ghazals, in Hindi script, 1776 onward.
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Entry #627057, added on 12-31-08 @ 1:53 pm EST
   Entry Access Restriction: None.
Poems / ghazals , no. 1851- 1875 in Hindi scriptEntry #627057
१८५१. आप को जो पसंद आ गये आज हम--RAS

आप को जो पसंद आ गये आज हम
ख़त्म हो गये सभी ज़िंदगी के सितम

ख़ामियों से हमारी ख़फ़ा आप हैं
सोच करके हमें हो रहा था भरम

ख़्वाब में भी न ये सोच पाये कभी
आपका हम पे हो जायेगा यूँ करम

सिलवटें छंट गयीं हैं दिलों से सभी
छा गयी वो ख़ुशी अब न आयेगा ग़म

आज न पास इतना ख़लिश आइये
आपसे आ रही आज हमको शरम.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२७ अक्तूबर २००८





१८५२. आयी है मुद्दतों के बाद रात चांदनी--RAS

आयी है मुद्दतों के बाद रात चांदनी
दिन की तरह खिली हुयी है आज चांदनी

पहले अंधेरी रात में छिप कर मिला किये
है आज हमारी ये मुलाकात चांदनी

इक चौदहवीं का चांद यहां भी है वहां भी
लायी है हसीं आज ये सौगात चांदनी

डसते रहे तनहाइयों में ग़म के अंधेरे
कर जायेगी जड़ से उन्हें बरबाद चांदनी

वो न सही पर पास में उनका है ग़म ख़लिश
ये ग़म करेगी और भी बेबाक चांदनी.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२७ अक्तूबर २००८




१८५३. हम आपकी खातिर बहुत बदनाम हो गये--RAS

हम आपकी खातिर बहुत बदनाम हो गये
वो वायदे ही मौत का सामान हो गये

इलज़ाम जो हमने सहे क्या कीजिये बयां
ग़म दे गये और आप ही गुमनाम हो गये

न दोस्ती हमसे कभी तो आपको रही
क्यों आप दिल के दुश्मने-आराम हो गये

हमने लुटाये आप पे थे अपने दिलो-जां
न जाने आप किसलिये अनजान हो गये

था पालना दिल में जिसे इक ज़ुर्म सा ख़लिश
मेरे लिये तो आप वो अरमान हो गये.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२७ अक्तूबर २००८




१८५४. वो तीर मोहब्बत के छिप-छिप के चलाते हैं---RAS—ईकविता २८ अक्तूबर २००८


वो तीर मोहब्बत के छिप-छिप के चलाते हैं
पर उनके इशारों को हम समझ न पाते हैं

पल में हैं कभी तोला, पल में हैं कभी माशा
हम पे न कभी अपनी असलियत जताते हैं

गफ़लत में अग़र उनसे गुस्ताखी कर बैठें
नाराज़ बहुत हैं वो रो-रो के दिखाते हैं

क्या है दिल में उनके ये तो ख़ुद ही जानें
न राज़ कभी हमको अपने वो बताते हैं

चाहते हैं बहुत उनको पर समझ नहीं पाते
हम उनकी अदाओं पर सौ जान लुटाते हैं

शोला हैं कभी शबनम बिजली से चमकते हैं
ये नाज़ ख़लिश उनके रह-रह के लुभाते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ अक्तूबर २००८
००००००००००

Tuesday, 28 October, 2008 7:19 AM
From: "Shyamal Kishor Jha" shyamalsuman@yahoo.co.in
खलिश साहब
नमस्कार। मिट जायेगा अंधेरा गर कोशिशें हों दिल से।
दीपावली में मिलकर हम दीप जलाते हैं।।

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman. blogspot. com




१८५५. मंज़िलों को भूल कर राह में भटक गया--RAS

मंज़िलों को भूल कर राह में भटक गया
खो गये असूल सब, वक्त यूँ अटक गया

जब सफ़र शुरू किया, याद रास्ते रहे
मिल गया जो मयकदा, झूम कर मटक गया

जानते हुए कि हैं जाम ये ज़हर भरे
प्यास इस तरह लगी शौक से गटक गया

किस तरह यकीं करूँ ज़िंदगी नहीं रही
कौन था जो मेरे सब रात-दिन सटक गया

आसमां पे किसलिये उड़ान थी भरी ख़लिश
था नसीब में लिखा, ज़मीन पर पटक गया.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ अक्तूबर २००८





१८५६. हमसे हैं ख़फ़ा इतने नज़रें वो चुराते हैं--RAS

हमसे हैं ख़फ़ा इतने नज़रें वो चुराते हैं
कुछ बात नहीं है ग़र पूछो तो बताते हैं

चेहरे पे उदासी है और आंख भी कुछ नम है
होठों पे हसीं झूठी फिर भी दिखलाते हैं

हम ख़ुश तो उन्हें कर दें किस वज़ह से नाख़ुश हैं
इतना भी नहीं हमको आखिर बतलाते हैं

क्या करें मेहरबां वो हम पर जो हो जायें
वो नाहक ही हमको इतना भरमाते हैं

क्या हमसे मोहब्बत है ये ख़लिश बता दें वो
ग़र प्यार नहीं है क्यों इतना शरमाते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ अक्तूबर २००८




१८५६ ए. वो तीर मोहब्बत के छिप-छिप के चलाते हैं—१८५४ और १८५६ को मिला के बनी गज़ल

वो तीर मोहब्बत के छिप-छिप के चलाते हैं
पर उनके इशारों को हम समझ न पाते हैं

पल में हैं कभी तोला, पल में हैं कभी माशा
हम पे न कभी अपनी असलियत जताते हैं

गफ़लत में अग़र उनसे गुस्ताखी कर बैठें
नाराज़ बहुत हैं वो रो-रो के दिखाते हैं

क्या है उनके दिल में ये तो ख़ुद ही जानें
न राज़ कभी हमको अपने वो बताते हैं

चाहते हैं बहुत उनको पर समझ नहीं पाते
बस उनकी अदाओं पर सौ जान लुटाते हैं

शोला हैं कभी शबनम बिजली से चमकते हैं
ये नाज़ हमें उनके रह-रह के लुभाते हैं

नाराज़ उन्हें जाने किस बात पे कर बैठे
हमसे हैं ख़फ़ा इतने नज़रें वो चुराते हैं

क्योंकर वो परेशां हैं कोई समझ न पाये है
कुछ बात नहीं है ग़र पूछो तो बताते हैं

चेहरे पे उदासी है और आंख भी कुछ नम है
होठों पे हसीं झूठी फिर भी दिखलाते हैं

हम ख़ुश तो उन्हें कर दें किस वज़ह से नाख़ुश हैं
इतना भी नहीं हमको आखिर बतलाते हैं

क्या करें मेहरबां वो हम पर जो हो जायें
वो नाहक ही हमको इतना भरमाते हैं

क्या हमसे मोहब्बत है ये ख़लिश बता दें वो
ग़र प्यार नहीं है क्यों इतना शरमाते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२८ अक्तूबर २००८







१८५७. राहों में अंधेरे हैं पांवों में कांटे हैं--RAS

राहों में अंधेरे हैं पांवों में कांटे हैं
हम भी बेख़ौफ़ मग़र मंज़िल पर जाते हैं

मुश्किल है डगर फिर भी हमको न कोई रोके
है ख़बर बहुत ख़तरे राहों में आगे हैं

शैतान हमें चाहे कितना भी ललचाये
बंदे हम भी आखिर उस पाक ख़ुदा के हैं

कोई तो वज़ह होगी हम ज़िंदा हैं अब तक
हर रोज़ भले दुश्मन हमसे टकराते हैं

यारों के यार मग़र दुश्मन के दुश्मन हैं
हम प्यार ख़लिश चाहे बेबाक लुटाते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अक्तूबर २००८





१८५८. हर बात पे वो ये कहते हैं--RAS

हर बात पे वो ये कहते हैं
हम उनके दिल में रहते हैं

उनके दिल के मेहमां लेकिन
हर रोज़ बदलते रहते हैं

वादे उनके सब झूठे हैं
दिल थाम के फिर भी सहते हैं

वो हों जब ग़ैर की बांहों में
दिल ही दिल में हम दहते हैं

वो नहीं वफ़ा के कायल हैं
सब ख़्वाब हमारे ढहते हैं

तुम ख़लिश बहुत नादाँ निकले
अब अश्क भला क्यों बहते हैं.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अक्तूबर २००८




१८५९. आपको भाया—RAS—ईकविता, २९ अक्तूबर २००८

आपको भाया
दिल रंग लाया

ख़्याल कोई है
कुलबुलाया

दिल ने सपना
कोई सजाया

अर्थ मग़र कुछ
समझ न पाया

साठ पुराये
ख़लिश बुढ़ाया.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अक्तूबर २००८






१८६०. एन आर आई की दीवाली---ईकविता, २९ अक्तूबर २००८

जो आज मनाते हो दीवाली सज-धज के
रंगीन चलाते आज पटाखे फुलझड़ियाँ
कितने नोटों को आज हवन कर आये हो
गर्वित हो कर अहसान जताते बच्चों पर
तो दिल पर रख के हाथ ज़रा पूछो अपने
जो अंधा तुमसे मांग रहा था इक पैसा
क्या तनिक दया भी तुमको उस पर आयी थी
झुंझला कर शायद तुमने यही कहा होगा:

“ये दीवाली भी नहीं मनाने देते हैं
इससे तो अपना अमरीका ही अच्छा था
सड़कों पर कोई भिखमंगे न मिलते थे
बाज़ारों में तो रोज़ रात दीवाली थी
हर सुपरमार्किट दीवाली से भी ज्यादा
दीपायमान, रंगीन, चमकता लगता था.”

पर, एन आर आई, नहीं भूलना तुम इतना
न अमरीका में कभी दशहरा मनता है
इक छ्द्मवेष रावण ही पूजा जाता है
जो अन्य देश से तेल-दुल्हन को हरता है
और उसे बचाने कोई अग़र विरोध करे
उस पर बर्बरता से बमबारी करता है

जो डालर कमा रहे हो उन पर लहू लगा
उन बच्चों का जो मेरीनों ने मारे थे
जब बम बरसाये थे स्कूल और बस्ती पर.
गुआंटानामो में बंदी करके जिन्हॆ रखा,
निर्दोष बहुत से तो उनमें बेचारे थे.

तुम डालर चुन कर रोज़ मनाओ दीवाली
हम दीवाला भी अपने घर में सह लेंगे
तुम अपनी जानो, हमको कोई दे भी तो
न पासपोर्ट अमरीका के हाथों लेंगे.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अक्तूबर २००८




१८६१. अपना कोई नहीं मिला तो तनहा जीना सीख लिया--RAS

अपना कोई नहीं मिला तो तनहा जीना सीख लिया
बोतल में न रहा नशा तो आंसू पीना सीख लिया

दुनिया कितनी रंगीं है,
पर मेरा दिल संगीं है
दिल को जहां लगाया था,
केवल धोखा पाया था

संगी साथी छूट गये,
मन के सारे मीत गये
किसके दर अब जाऊं मैं,
दिल कैसे बहलाऊं मैं

टूटे तारों से कैसे बजती मन-वीणा सीख लिया
बोतल में न रहा नशा तो आंसू पीना सीख लिया

लोग कहें क्यों रोते हो,
अश्कों से मुँह धोते हो
मैं कहता क्यों हँसूं यहां
दुख से है ये भरा जहां

दुख न कम हो पायेंगे
दिल तो लोग दुखायेंगे
सांस चलेगी ये जब तक
दिल रोयेगा ये तब तक

प्यार जता कर कैसे दिल जाता है छीना सीख लिया
बोतल में न रहा नशा तो आंसू पीना सीख लिया

दिल तो धड़कन करता है
पर मेरा मन डरता है
टूट चुका है ये पहले
प्यार करे तो अब दहले

मुझको तनहा रहने दो
अब यूँ ही ग़म सहने दो
दुनिया से अब जाऊंगा
फिर वापस न आऊंगा

कैसे लगता है जब ग़म से फटता सीना सीख लिया
बोतल में न रहा नशा तो आंसू पीना सीख लिया

अपना कोई नहीं मिला तो तनहा जीना सीख लिया
बोतल में न रहा नशा तो आंसू पीना सीख लिया.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अक्तूबर २००८




१८६२. मेरी आंखें भीगीं तो क्यों उलझन मीत तुम्हें होती है---RAS

मेरी आंखें भीगीं तो क्यों उलझन मीत तुम्हें होती है
जो हौले से टपका है ये मेरी आंखों का मोती है

मेरी झूठी मुस्कानों से गफ़लत में तुम रहे हमेशा
शायद तुमको नहीं पता था मन में व्याकुलता सोती है

मुझे अकेला रहने दो तुम, नयनों से वर्षा होने दो
मन में जब अंधियारा हो तो कोई चीज़ नहीं सोहती है

बांट नहीं सकता अपना दुख, सहना होगा इसे अकेले
मैं कैसे बतलाऊं तुमको ये मन वीणा क्यों रोती है

कैसी आसानी से तुमने कहा भुला दो मन की पीड़ा
ख़लिश अग़र दिल टूटे तो फिर उसकी याद नहीं खोती है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२९ अक्तूबर २००८






१८६३. नारी मन की गहराई को मत नापो तुम थक जाओगे—RAS—ईकविता, ३० अक्तूबर २००८

नारी मन की गहराई को मत नापो तुम थक जाओगे
हाथ लगेगी तुम्हें पराजय, सिर धुन-धुन कर पछताओगे

परिभाषा नारी नयनों की समझ न पाये ऋषि-मुनि भी
हार चुके भाषाविद, उत्तर नया कहाँ से तुम लाओगे

नयनों ने कुछ कहना चाहा पर तुम उसको समझ न पाये
हृदय कचोटेगा जब तुमको, कैसे मन को समझाओगे

अनजानी ही सदा रहेंगी ये राहें कुछ अनजानी सी
मत समझो कि दीप जला कर मंज़िल तक तुम जा पाओगे

जो दृढ़ है उसको कोमलता युग-युग से ठगती आयी है
हथियारों को ख़लिश पटक दो, नहीं विजित हो कर आओगे.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८
००००००००००००००
Thursday, 30 October, 2008 10:15 AM
From: "Rakesh Khandelwal" rakesh518@yahoo.com

शब्द आपको मिले किन्तु मैं अब भी पथ में भटक रहा हूँ
और विदित है मुझको मेरी ये तलाश होगी अपूर्ण ही
पर मिलते जाते हैं पथ में जो आशीष आप से मुझको
उनसे सदा प्रेरणा मिलती और निराशा रहे चूर्ण ही

०००००००००००००००


Thursday, 30 October, 2008 11:25 AM
From: "Sujata Dua" <aasthamanthan@yahoo.co.in>

Khalish ji,
yun to mujhai aapki sabhi kavitaayain acchi lagti hain ...par yeh bahut khoobsurat hai
Sujata
०००००००००००००




१८६४. सांसों में जैसे अटक सा गया हूँ--RAS

सांसों में जैसे अटक सा गया हूँ
राहों में जैसे भटक सा गया हूँ

रुकना भी मुश्किल, बढ़ना भी मुश्किल,
जैसे अधर में लटक सा गया हूँ

जीता हूँ फिर भी न जाने क्योंकर
ज़हर ज़िंदगी का गटक सा गया हूँ

कब जायेगा, पूछता है ज़माना
सबकी नज़र में खटक सा गया हूँ

जला दो मुझे, ख़त्म हो जाये किस्सा
ख़लिश काठ सूखा, चटक सा गया हूँ.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८





१८६५. मैं मसीहा तो नहीं तुमको बचाऊँ कैसे--RAS

मैं मसीहा तो नहीं तुमको बचाऊँ कैसे
पाप जो तुमने किये उनसे छुड़ाऊँ कैसे

नेक और बद का नहीं फ़र्क खतम हो सकता
पाप को पुण्य का मैं नाम दिलाऊँ कैसे

बारहा तुमको ज़माने ने बहुत समझाया
आज है दोष ज़माने का, बताऊँ कैसे

मैं भी औरों की तरह ज़र-ओ-ज़मीं के बदले
जज-ओ-मुंसिफ़ से गुनाहों को छिपाऊँ कैसे

पैरवी कर न सकूंगा मैं ख़लिश दहशत की
दाग़ दामन पे वकालत के लगाऊं कैसे.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८





१८६६. भूले से अपना ग़म नहीं जग को सुनाना है--RAS

भूले से अपना ग़म नहीं जग को सुनाना है
दिल रो रहा है तो भी लब से मुस्कुराना है

अश्कों से तेरे आंख न होगी किसीकी नम
बेकार यूँ दिन रात का आंसू बहाना है

सबके लिये अपनी ज़रूरतें ही अहम हैं
तुझको जुटाना आप अपना आबदाना है

मत भूल तू मुफ़लिस है और मुफ़लिस ही रहेगा
सरमायेदारों का यहां केवल ज़माना है

न पायेगा अपना कोई तू ढूंढ ले कितना
बेकार ग़ैरों से ख़लिश दिल को लगाना है.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८






१८६७. आओ कुछ बातें करें हम देश की, संसार की--RAS

आओ कुछ बातें करें हम देश की, संसार की
कर चुके बातें बहुत हम प्यार की, दिलदार की

मंदिरो-बाज़ार में बम फट रहे हैं रोज़-रोज़
कुछ करें अब फ़िक्र हम इस आलमे-खूंखार की

दाल-रोटी भी जुटा पाते नहीं मर खप के लोग
किस तरह मंहगाई में गाड़ी चले घर-बार की

क्या पता किस दिन जहां से कूच कर जाऊं ऐ दोस्त
पास बैठो बात कर लें काम की, बेकार की

आये हैं वो तब ख़लिश जब ज़िन्दगी की शाम है
न तमन्ना कुछ बची है यार के दीदार की.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८






१८६८. मुझे अब दोस्त व दुश्मन पे भरोसा न रहा--RAS

मुझे अब दोस्त व दुश्मन पे भरोसा न रहा
मेरी नज़रों में कोई पीर या ओझा न रहा

जो भी आया वही नापाक इरादे ले कर
काम आयेगा कोई मुझको ये धोखा न रहा

मन में आता है कि दुनिया से किनारा कर लूँ
मेरा अपना है जिसे दिल ने ये सोचा न रहा

वक्ते- रुख़सत को तो आना था सो वो आ ही गया
चाहे रो-रो के उसे जितना भी रोका, न रहा

मैं भी अब बन के फ़कीर आज चला घर से ख़लिश
तू भी ख़ुश हो ले ज़माने मेरा बोझा न रहा.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८





१८६९. तुम्हें देखा तो लगा ज़िंदगी मुस्काई थी--RAS

तुम्हें देखा तो लगा ज़िंदगी मुस्काई थी
कुछ तुम्हारी भी निगाह देख के शरमायी थी

मैंने ख़्वाबों में तुम्हें पाया तो अहसास हुआ
कोई ज़न्नत से परी जैसे उतर आयी थी

मैंने देखा था कभी प्यार की नज़रों से तुम्हें
मेरे दिल में भी कभी बर्ख सी लहरायी थी

ग़ैर की बांह में देखा तो लगा मेरे लिये
प्रीत दिल में न तुम्हारे कभी गहरायी थी

यूँ तो इतनी सी हकीकत है ख़लिश सोच ज़रा
ये तबीयत तूने एक बुत से ही बहलायी थी.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३० अक्तूबर २००८





१८७०. मौत आज क्यों दस्तक देने मेरे दर पर आयी है—RAS—ईकविता, ३१ अक्तूबर २००८

मौत आज क्यों दस्तक देने मेरे दर पर आयी है
मरा हुआ है उसे मारने में कैसी चतुराई है

इतनी देर लगा दी तूने, जब आना था न आयी
अब अहसान किया आने का इसमें कौन बड़ाई है

दिन-दिन, पल-पल, तिल-तिल मैंने भुगता है इस जीवन को
राहत कौन अनोखी मत्यु ने मुझ तक भिजवायी है

सही कहा है विद्वानों ने कभी न तुम हिम्मत हारो
बारह बरसों में घूरे की भी होती सुनवाई है

अब तू आये या न आये, दिन तो पूरे हुये ख़लिश
चला-चली की रौनक अब तो ख़ुद ही मुझ पर छायी है

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३१ अक्तूबर २००८
०००००००००००

Thursday, 30 October, 2008 11:56 PM
From: "Sujata Dua" aasthamanthan@yahoo.co.in

खलिश जी,
एक एक शब्द जिन्दगी का कड़वा सच बयान कर रही है ....बहुत बार हम लाचार हो कर अपनी लिये मौत मांगते हैं पर दर्द को जिस तरह से आप कहते हैं वो दर्द तो सहेज कर रखने वाला होता है
सुजाता
००००००००००००००००००





१८७१. होंठ तो हिले नहीं—RAS, ईकविता, ३१ अक्तूबर २००८

होंठ तो हिले नहीं
और ज़ुबां खुली नहीं
साथ न कभी हुआ
और नज़र मिली नहीं

किंतु प्रेम हो गया
मन कहीं पे खो गया
चेतना अचेत है
काल-क्रम ही सो गया

जान न सका कोई
मान न सका कोई
मौन दो दिलों का सुन
गान न सका कोई

दो दिलों का मेल था
धड़कनों का खेल था
कोई दिल रहा सतत
भावना उंडेलता.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३१ अक्तूबर २००८


१८७२. बुला लो पास अपने अब यहां पर दिल नहीं लगता--RAS

बुला लो पास अपने अब यहां पर दिल नहीं लगता
बुलाये बिन मैं आ जाऊं ये मुमकिन हो नहीं सकता

सुना है ख़ूब मिल-जुल कर वहां पर लोग रहते हैं
अग़र ख़ुश भाई हो तो भाई का दिल है यहां जलता

चले जाते हैं सब अपनी ही धुन में बेख़बर हो कर
किसी की दुख भरी आह को नहीं कोई यहां सुनता

सलामत घर रहे अपना सभी चाहते हैं बस इतना
किसे है फ़िक्र घर औरों का बनता है या बिगड़ता

ख़लिश मंज़िल पे न पहुंचा तो क्यों हैरान है इतना
तुझे परवाह न थी ज़ानिब-ए-मंज़िल कभी चलता.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८






१८७३. क्यों पूछते हो मुझसे सताऊं मैं किस तरह--RAS

क्यों पूछते हो मुझसे सताऊं मैं किस तरह
तुम जिस तरह चाहो सता लो आज तिस तरह

हद से गुज़र चुकी है मैं न उफ़ करूंगा अब
खू ज़ाब्ते की पड़ चुकी है मुझको इस तरह

समझो न यूँ कि काम ये आसान है कोई
बहला रहा हूँ मैं ग़मों से दिल को जिस तरह

अब न किसी की चाह है न है कोई उम्मीद
देखा करीब से है ज़माने को इस तरह

बरबाद हो कर भी मेरे दिल में ख़ुशी है यूँ
कोई मनाये मौत का है जश्न जिस तरह

क्यूँ हो रहे हो आज शर्मसार यूँ ख़लिश
लूटा नहीं क्या आज तक किसी को इस तरह.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८




१८७४. ज़िंदगी में यूँ तो रोज़ इक ग़म नया आता रहा—RAS—ईकविता, १ नवंबर २००८

ज़िंदगी में यूँ तो रोज़ इक ग़म नया आता रहा
ग़म सहे इतने कि दिल से ख़ौफ़े- ग़म जाता रहा

जब सभी ने साथ छोड़ा है मेरा मझधार में
आज लगता है न दुनिया से कोई नाता रहा

शुक्रिया ग़म का, सुना जब हाल महफ़िल ने मेरा
दर्द वो छलका गज़ल में, दाद मैं पाता रहा

कौन है दुनिया में जिसको और का ग़म चाहिये
सोच कर मैं ये लबों से सिर्फ़ मुस्काता रहा

हर किसी को ग़म सुनाता न ख़लिश मंज़ूर था
आपको ला कर तसव्वुर में गज़ल गाता रहा.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८







१८७५. तर्के-उल्फ़त करके अपने दिल को समझाता रहा--RAS

तर्के-उल्फ़त करके अपने दिल को समझाता रहा
बेवफ़ा माशूक से अब न मेरा नाता रहा

दिल लगा के भूलना इतना नहीं आसान था
ख़्याल उनका हर घड़ी इस दिल को तड़पाता रहा

न मुझे मालूम था ये बात दो दिन की नहीं
ज़िंदगी भर के लिये अब चैने-दिल जाता रहा

मौत में तबदील मानो ज़िंदगी यूँ हो गयी
मय-ए-ग़म पीता रहा और ज़हरे-ग़म खाता रहा

शिद्दते-ग़म इस तरह मेरी ख़लिश कुछ बढ़ गयी
इस जहां से कूच करने का ख़याल आता रहा.

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
© Copyright 2008 Dr M C Gupta (UN: mcgupta44 at Writing.Com). All rights reserved.
Dr M C Gupta has granted Writing.Com, its affiliates and its syndicates non-exclusive rights to display this work.


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