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| Poems / ghazals , no. 1876- 1900 in Hindi script | Entry #627058 |
१८७६. ऐसा जीवन का सफ़र रहा रोते भी गये, हंसते भी गये--RAS
ऐसा जीवन का सफ़र रहा रोते भी गये, हंसते भी गये
चलते भी गये, रुकते भी गये, गिरते भी गये, उठते भी गये
पाने की तमन्ना कुछ न की, कांटों से मोहब्बत की हमने
मुस्कान भरा चेहरा ले कर दिल में आहें भरते भी गये
दिल के अरमां-ओ-ख़्वाहिश ने शैतां बन कर रस्ता रोका
पीछे फिसले कुछ कदम मग़र, मंज़िल की तरफ़ बढ़ते भी गये
ग़ैर-इंसाफ़ी ने सदा हमारी हिम्मत और बढ़ायी है
इंसां के आगे सर न झुका, मौला से मग़र डरते भी गये
अब उम्र चुका ही चाहती है पर क्यों अफ़सोस ख़लिश कीजे
नामुमकिन की परवाह न की, जो मुमकिन था करते ही गये.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
१८७७. कौन है वह?—ईकविता, १ नवंबर २००८
लोग मुझसे पूछते हैं: कौन है वह?
वह जिसे हर शे’र, मुक्तक और गज़ल में
देखता हूँ मैं हमेशा
और जिसको कवि हृदय की कल्पना से
मैं चराचर लोक में अवलोक करता.
कौन है मैं क्या बताऊं?
शब्द मेरे, भाव मेरे, लेखनी भी
किंतु वह जो प्रेरणा है वह परे है
सात पर्दों में छिपा है रूप उसका
कौन है वह मैं स्वयं न जान पाया
किंतु है विश्वास मुझको वह निरंतर
जो मेरे दिल में बसी रहती है पल- पल
वह न हो तो ऊर्जा छिन जाये मेरी
और मेरी लेखनी विश्राम ले ले.
और भला क्यों लेखनी ही?
यह मेरा जीवन न आगे बढ़ सकेगा
किंतु कह सकता नहीं विश्राम लेगा
है निरंतर शब्दमय मेरा यह जीवन
वह यदि न भाव को शब्दों में ढाले
तो मिलेगा चैन न जीवन को मेरे
और जीते जी ख़लिश मर जाऊंगा मैं
वह न होगी तो न रह पाऊंगा मैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
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Saturday, 1 November, 2008 10:08 AM
From: "Sujata Dua" aasthamanthan@yahoo.co.in
arrey arrey ham nain to yun hi pooch liya tha ...aapkai paas to har baat ka jawab hai
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१८७८. जब शब्द मिलेंगे भावों को, कविता ख़ुद ही बन जायेगी--RAS
जब शब्द मिलेंगे भावों को, कविता ख़ुद ही बन जायेगी
जब शिद्दत होगी दिल में तो मंज़िल ख़ुद ही मिल जायेगी
हम राहे-वफ़ा से फिसले हैं, इलज़ाम ये हम पे आया है
पर जब वो हकीकत जानेंगे, ये तोहमत भी मिट जायेगी
कितना आसां है औरों को बिन बात ही मुज़रिम ठहराना
जब बहस सुनेगा मुंसिफ़ क्या है बात असल खुल जायेगी
ये रात अग़रचे संगीं है ज़ुल्म और सितम के साये से
आशा का सवेरा आयेगा, ग़म की महफ़िल ढल जायेगी
जो प्यार की राह पे चलते हैं, बाधाओं से कब डरते हैं
लमहा जो मिलन का आयेगा तो मौत ख़लिश टल जायेगी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
१८७९. कभी तारीफ़ तेरे हुस्न की मैं कर न पाया हूँ--RAS
कभी तारीफ़ तेरे हुस्न की मैं कर न पाया हूँ
निगाहों में अभी तक रूप तेरा धर न पाया हूँ
मुकम्मिल साफ़ हो दुनिया कभी ऐसा नहीं मुमकिन
न हो सिलवट कोई जिसपे मैं वो बिस्तर न पाया हूँ
मुकाम आयेगा कोई तो जहां राहें चुकेंगी ये
सफ़र क्यों छोड़ दूं मंज़िल अभी तक ग़र न पाया हूँ
बुलाया है ख़ुदा ने तो तुम्हें एतराज़ हो क्योंकर
जहाँ कोई मरा न हो मैं ऐसा घर न पाया हूँ
नहीं मुझमें बची है चाह जीने की ख़लिश कोई
न जाने जी रहा कैसे अभी तक मर न पाया हूँ.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
१८८०. मैं तुम्हारे पास, ठहरो, आ रहा हूँ--RAS
मैं तुम्हारे पास, ठहरो, आ रहा हूँ
ज़िंदगी की डोर तोड़े जा रहा हूँ
कब तलक यूँ ही रहूंगा मैं अकेले
आज दुनिया से बहुत उकता रहा हूँ
एक मैं और एक तनहाई बची है
मैं अकेला आज बैठा गा रहा हूँ
तर्के-त’अल्लुक नहीं आसान था पर
ये न सोचो आज मैं पछता रहा हूँ
अब ख़लिश है रूह यूँ आज़ाद मेरी
आज मैं हर एक शय पर छा रहा हूँ.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
१८८१. किंकर्तव्य—RAS, ईकविता, १ नवंबर २००८
आते हैं ऐसे अवसर कुछ
किंकर्तव्य, यह सोच खड़े
हम अनायास रह जाते हैं
निर्णय न कुछ कर पाते हैं
ऐसे में क्या लाज़िम हमको
यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है
पर जितना सरल प्रश्न है ये
उतना ही सीधा उत्तर है
जब प्रश्न उठे ऐसा तो फिर
अध्याय दूसरा गीता का
और सैंतालीसवां श्लोक पढें
और पढ़ कर उसका मनन करें
कह रहे कृष्ण अर्जुन से यह
कर्तव्य कर्म को सदा करो
मत रखो फल की इच्छा तुम
तुम नहीं निमित्त बनो फल के
कर्तव्य क्या है यह अपने
अंतर्मन से ही पूछो तुम
उत्तर मिल जायेगा तुमको
तुम चाहे उसको न मानो
पर यदि कभी विरले क्षण में
ऐसी ही नौबत आ जाये
कि अंतर्मन का भी उत्तर
न स्पष्ट हो सके तुमको तो
फिर याद करो गांधी जी की
उस सदा अचूक कसौटी को
जिसको था “लिटमस टेस्ट” कहा
और पालन जिसका सदा किया
यह टेस्ट मात्र कहता है कि
कोई काम यदि करना हो तो
करने से पहले मन में तुम
कल्पना करो उस व्यक्ति की
जो निर्धन से निर्धनतम हो
जीवन में जिसको देखा हो
उस व्यक्ति का तुम ध्यान करो
फिर अपने मन से यह पूछो
जो कार्य चले करने हो तुम
उसका फल जो भी होगा वह
उस निर्धन व्यक्ति के हित में
होगा या फिर इससे उलटा
यदि हित होता हो निर्धन का
तो कार्य करो बेखटके तुम
आखिर दरिद्र नारायण भी
तो ईश्वर के रूपों में है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१ नवंबर २००८
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Saturday, 1 November, 2008 5:07 PM
From: "Rakesh Khandelwal" rakesh518@yahoo.com
रहा सूत भर दूर सदा ही, अथक प्रयासों का हर प्रतिफ़ल
निष्ठा देती किन्तु दिलासा, है कर्मण्यवाधिकारस्ते
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१८८२. मैं क्यों लिखता हूँ, क्या जानूं—RAS—ईकविता, २ नवंबर २००८
मैं क्यों लिखता हूँ, क्या जानूं
बस लिखता हूँ, इतना जानूं.
कोई पढ़े इसे या नहीं पढ़े
या पढ़े इसे पर आधा ही
कुछ इसमें तथ्य नहीं पाये
या परख नली में उसकी यह
स्तरहीन प्रलाप लगे उसको
तो उसका कोई दोष नहीं
पर मानोगे तुम भी तो यह
कुछ दोष नहीं है मेरा भी.
हम उसी देश के वासी हैं
जहां संविधान ने सबको ही
दी है स्वतंत्रता कहने की
जो चाहें, सीमा के भीतर.
मन में इक भाव उमड़ता है
सहसा ही इच्छा उठती है
कि कलमबद्ध इसको कर दो
यह भाव कहीं उड़ न जाये
ज्यों झौंका कभी हवा का जब
जाता है तो न आने को.
वह इच्छा रूप प्रबल धरती
मैं व्यक्त स्वयं को करने को
इतना आतुर हो जाता हूँ
कि जब तक कलम नहीं पकड़ूँ
न चैन मुझे मिल पाता है.
मैं ख़ब्तीपन से ग्रस्त बहुत
कुछ- कुछ लिखता ही रहता हूँ
कुछ अर्थपूर्ण, कुछ अर्थ –रहित
और कुछ में ऐसा अर्थ निहित
जो स्वयमेव न लक्षित हो
केवल मंथन से गोचर हो.
मैं आत्म-तुष्टि को लिखता हूँ
यदि लगे किसी को वह रुचिकर
तो स्वागत है वह पढ़े मुझे
अन्यथा भूल जाये पढ़ कर.
यदि लगे किसीको बुरा तनिक
तो समझें कि लिखा ही नहीं
जो नहीं प्यार के काबिल था
वह दिल समझें कि दिया नहीं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
२ नवंबर २००८
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Thursday, 30 October, 2008 10:04 PM
From: pachauriripu@yahoo.com
ख़लिश जी, बहुत अच्छे !!!
कुछ अर्थपूर्ण, कुछ अर्थ–रहित
और कुछ में ऐसा अर्थ निहित
जो स्वयमेव न लक्षित हो
केवल मंथन से गोचर हो
वैसे आपसे मिलना कब संभव हो सकेगा ?
रिपुदमन
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१८८३. स्वप्न देखे जा रहा था मैं किसी के प्यार में---RAS
स्वप्न देखे जा रहा था मैं किसी के प्यार में
अब तलक उनके सहारे ही जिया संसार में
रोज़ इक रंगी सुबह आती थी ख़्यालों में मेरे
शाम कटती थी मेरी अरमान के दरबार में
था बहुत नाज़ुक मेरा दिल आज छलनी हो गया
बेवफ़ा कितने दिये सूराख हैं दीवार में
गै़र की बांहों में देखा, रिस पड़े हैं घाव सौ
सोचता हूँ दिल लगाया किसलिये बेकार में.
है ये बेहतर आज कर लूँ ख़ात्मा-ए-ज़िंदगी
क्यों न पा लूँ मैं निज़ाते-ग़म ख़लिश इक बार में.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ नवंबर २००८
१८८४. कोई बच्चा बिलख कर भूख से लाचार रोता है—RAS—ईकविता ३ नवंबर २००८
कोई बच्चा बिलख कर भूख से लाचार रोता है
कोई पकवान से उकता कहीं भर पेट सोता है
परेशां है कोई कि हमसफ़र ही बेवफ़ा निकला
किसी के दिल में साथी न मिला ये दर्द होता है
कोई पाने को बेटा सैंकड़ों मन्नत मनाता है
कोई औलाद से तंग है, तन्हा आंखें भिगोता है
नहीं दुनिया में ख़ुश कोई, जो कल तक मुस्कराता था
वही चेहरे को अपने आंसुओं से आज धोता है
बहुत आसान है किस्मत को अपनी दोष दे देना
ख़लिश इंसान काटे है वही जो बीज बोता है.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ नवंबर २००८
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Friday, 7 November, 2008 12:44 AM
From: "T. Ritesh" toritesh.tripathi@gmail.com
Sirji, bahut badhiya ghazal hai..saare sher umdaa
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Friday, 7 November, 2008 3:16 AM
From: "Dr. Harendra Singh" hsnegi08@yahoo.co.in
mahesh ji
"Koi Baccha Bilakh kar Bhookh se----------" ke liye vadhai sweekar karein.
Main is Ghazal ki aakhiri Sher kw sahmat naheen ho sakta. Baat ko ekdam se kismat ke hawale ya Insaan ke bas mein hona bata dena sahi naheen hai.
Dr. Harendra SinghChandigarh
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१८८५. कोई गीतों में मुस्कुराता है—RAS—ईकविता ९ नवंबर २००८
कोई गीतों में मुस्कुराता है
कोई गज़लों में दर्द लाता है
कोई पढ़ता है उनको जब पाठक
अश्क मुस्का के वह बहाता है
कोई गुज़रे है दिल की राहों से
काम लेता है अश्क-ओ-आहों से
पर कोई दर्द यूँ छिपाता है
राज़ ज़ाहिर न हो निगाहों से
दाग़ दिल पर हज़ार गहरे हैं
और उल्फ़त पे लाख पहरे हैं
कुछ फ़रियाद से नहीं होगा
रीत के ठेकेदार बहरे हैं
ज़िंदगी तो गुज़र ही जायेगी
मौत आनी है वो भी आयेगी
पर जिया कोई तो जिया कैसे
यही दुनिया सदा सुनायेगी
ज़िंदगी इस तरह बसर कर लें
सादगी में ख़लिश सबर कर लें
काम दुनिया में ऐसे कर जायें
नाम अपना यहां अमर कर लें.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
३ नवंबर २००८
१८८६. कौन कहता है कि अमरीका में हम आज़ाद हैं—RAS—ईकविता, ४ नवंबर २००८
(अमरीका में अश्वेत हृदयों के उद्गार)
कौन कहता है कि अमरीका में हम आज़ाद हैं
देश पनपे है मग़र हम तो रहे बरबाद हैं
सिर्फ़ नफ़रत की नज़र से आज तक देखे गये
हम गुलामी की बहुत अश्कों भरी रूदाद हैं
इस तरह अपने ही घर में बन गये हम अजनबी
ज्यों कि सौतेली है माँ हम फ़ालतू औलाद हैं
उठ चुका है सर न अब ये फिर कभी झुक पायेगा
जो करेगा ज़ुल्म हम उसके लिये जल्लाद हैं
अब ख़लिश है वक्त ये कि एक ओबामा उठा
यह बताने के लिये कि ठोस हम फ़ौलाद हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
४ नवंबर २००८ (अमरीका का मतदान दिवस)
१८८७. लिखो कवि, मत मौन रहो यह समय नहीं चुप रहने का--RAS—ईकविता, ५ नवंबर २००८
लिखो कवि, मत मौन रहो यह समय नहीं चुप रहने का
कलम कुठार चलाओ समय है साम्राज्यों के ढहने का
कब तक बम फूटेंगे मंदिर, संसद और बाज़ारों में
कब तक चलन रहेगा निर्दोषों का शोणित बहने का
उठो लड़ो अन्याय से था कहा यही मुरलीधर ने
‘नहीं करेंगे हिंसा’ अब यह समय नहीं है कहने का
निन्यानवे अपशब्द सहे चुपचाप मग़र फिर सिर काटा
तुम भी कह दो शत्रु से आ गया समय अब दहने का
बच्चा, बूढ़ा हो, गृहस्थ हो, सन्यासी हो, उठो सभी
नहीं समय है मूक बने अत्याचारों को सहने का
क्यों न साधु-साध्वी भी हथियार उठायें, लड़ें, ख़लिश
धूमिल रंग न पड़ने दें हम दुनिया के इस गहने का.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
४ नवंबर २००८
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On Wed, 5/11/08, Dr. Rama Dwivedi <ramadwivedi@ yahoo.co. in> wrote:
खलिश जी,
बड़ी ही ��"जपूर्ण कविता है....बधाई...... लेकिन कृपया अन्यथा न लें ’गृहस्थी’ की
जगह ‘गृहस्थ’ होना चाहिए क्यों कि बच्चा ,बूढ़ा आदि के साथ ले रहे हैं...अग्रिम क्षमा याचना के
साथ....
डा. रमा द्विवेदी
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१८८८. अंगूठी अंगूठे को अंगूठा दिखा गयी—RAS—ईकविता, ७ नवंबर २००८
अंगूठी अंगूठे को अंगूठा दिखा गयी
अहसान अंगूठे का इक पल में भुला गयी
जिसने बनाया उसकी वफ़ा को दग़ा दिया
जो अजनबी था उसकी उंगली में समा गयी
किसको पता था तेरी बेवफ़ाई का फ़रेब
जाने हिसाब कोई पुराना चुका गयी
तू पालकी में जा सजी तुझको नहीं ख़बर
इक आंसू अंगूठे की आंख से बहा गयी
तू ख़ुश रहे ये कह के अंगूठा छलक पड़ा
दे के ख़लिश ये प्यार में कैसा सिला गयी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
७ नवंबर २००८
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Saturday, 8 November, 2008 4:13 AM
From: "K.P.Tyagi" kp_kusum@yahoo.com
ख़लिश साहब
आपने तो अंगूठी की सारी दास्तां बयान कर दीबहुत ही सुन्दर भाव हैं. मेरे विचारों को चार चांद लगा दिए.किन शब्दों में शुक्रिया अदा करुं.धन्यवाद सहित
Dr.K.P.Tyagi
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१८८९. इतना प्यार में हुज़ूर, आप न सताइये—RAS—ईकविता ८ नवंबर २००८
इतना प्यार में हुज़ूर, आप न सताइये
हुक्म कीजिये भला, कैसे हम मनाइये
माफ़ी मांगने को हम हैं तैय्यार आपसे
आखिर क्या हुआ कसूर, कुछ तो बताइये
गुस्सा छोड़िये ज़नाब, दुश्मन तो नहीं हैं हम
चलो मान ली ख़ता अब तो मान जाइये
सितम आपने हज़ार हम पे किये हैं मग़र
उनको कहके अहसान, आप न जताइये
सुनके फ़रियादे-दिल ऐसे चुप न रहें
बढ़ जाये न ख़लिश, यूँ न मुस्कुराइये.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ नवंबर २००८
१८९०. जो अधूरी ही रही दिल से निकल पायी न चाह--RAS
जो अधूरी ही रही दिल से निकल पायी न चाह
यूँ छिपाया है कभी लब से निकल पायी न आह
मुझे तकदीर की फ़ितरत पे हंसी आती है
सोचती है कि वो इंसान को कर देगी तबाह
आलमे-शाद ज़माने को पसन्द है लेकिन
लोग ऐसे भी हैं जो ग़म की तका करते हैं राह
क्यों न हम आज सनम तर्क ये रिश्ता कर लें
एक छत के ही तले कर नहीं पायेंगे निबाह
चाहे कितने ही सितम और मुझे दे जाओ
मेरा दावा है ख़लिश नम नहीं पाओगे निगाह.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ नवंबर २००८
१८९१. मुझे गुज़रे हुए दिन याद बहुत आते हैं--RAS
मुझे गुज़रे हुए दिन याद बहुत आते हैं
आ के रातों की वो तनहाई में भरमाते हैं
किसे मालूम है दिल हंसता है या रोता है
यूँ तो कहने को ये दिन-रात गुज़र जाते हैं
बड़ा आसान है कह देना भुला दो उनको
कैसे नादान हैं जो लोग ये समझाते हैं
मेरी आंखों में न हैं अश्क न लब पे आहें
लोग समझें हैं कि ग़म मुझको न तड़पाते हैं
उन्हें क्यों दाग़े-ज़िगर अपने ख़लिश दिखलाऊँ
जो किसी और का न दर्द समझ पाते हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
८ नवंबर २००८
१८९२. दिल्ली काव्य-गोष्ठी वर्णन, ८ नवंबर २००८: कुंडली—ईकविता, ९ नवंबर २००८--RAS
चाय चुकी, पानी चुका, चुके सभी पकवान
जो आये छक कर गये जितने थे श्रीमान
जितने थे श्रीमान संग अपनी श्रीमति के
घर में सके न बोल गोष्ठी में वे चहके
कहै ख़लिश कविराय न इसका कोई उपाय
मौली जी आ सके न दिल्ली पीने चाय.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
९ नवंबर २००८
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Sunday, 9 November, 2008 2:11 AM
From: "shar_j_n" shar_j_n@yahoo.com
चाय न भेजी, थोडी सी काफी दी होती
बच्चों को घर के एक-एक टाफी दी होती
१८९३. टाफ़ी को काफ़ी कहें, भयी पुरानी बात: कुंडली--९ नवंबर २००८
टाफ़ी को काफ़ी कहें, भयी पुरानी बात
बात बात पर बालगण आज करें उत्पात
आज करें उत्पात कि दें माँ-बापहुँ गारी
काव्य-गोष्ठी कर हमसे शत्रुता निकारी
घंटा चार मचायो भब्बड़, फिर पी काफ़ी
हम बच्चन को टार दियो दे कर दुई टाफ़ी.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
९ नवंबर २००८
१८९४. हमें मालूम न था ऐसे भी दिन आयेंगे--RAS
हमें मालूम न था ऐसे भी दिन आयेंगे
आप हंस-हंस के सनम हम पे सितम ढायेंगे
प्यार की क्या है हकीकत ये न जाना था कभी
हमने सोचा था कि हम आपके कहलायेंगे
एक मंज़िल थी मग़र एक सफ़र हो न सका
न गुमाँ था कि अलग आपसे हो जायेंगे
आप न होंगे तो यादों का ख़ज़ाना होगा
दिले-बरबाद को ख़्यालों से ही बहलायेंगे
आज ये रिश्ता ख़लिश तर्क हुआ जाता है
नहीं मुमकिन कि बिना आपके जी पायेंगे.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
९ नवंबर २००८
१८९५. न मेरी कोई आज महफ़िल है—RAS (alternating end clap)
मेरी कोई न आज महफ़िल है
मेरी कोई न आज मंज़िल है
ज़िंदगी का असूल है जाना
मेरी ख़्वाहिश ही मेरी कातिल है
मैंने अरमान जब तलक पाले
मेरे दिल पर बहुत पड़े छाले
मेरी ख़्वाहिश रही अधूरी सब
मैंने ग़म के लिखे बहुत नाले
आज दिल में सुकून आया है
आज रूहानी दिल पे साया है
न तमन्ना न कोई ख़्वाहिश है
चैन सब ओर आज छाया है
आज कोई मुझे बुलाये क्यों
मेरी नज़रों में ख़्वाब लाये क्यों
आखिरी है पड़ाव जीवन का
सब्ज़बाग अब कोई दिखाये क्यों.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० नवंबर २००८
१८९६. आज इतना न पास आओ तुम-- RAS (alternating end clap)—ईकविता, १० नवंबर २००८
आज इतना न पास आओ तुम
मेरे ख़्यालों में न समाओ तुम
नई ख़ुशियों के ख़्वाब दे कर के
मेरे दिल को न यूँ सताओ तुम
मेरी दुनिया में दर्द छाये हैं
कई सैलाब ग़म के आये हैं
मेरा सीना है ज़ख़्म से छलनी
मैंने आंसू सदा बहाये हैं
न जवानी को ऐसे ठुकराओ
तुम बहारों के साथ मुस्काओ
हुस्न को और तुम उभरने दो
मेरी वीरनगी पे मत जाओ
तुम न सह पाओगे सितम मेरे
हैं अंधेरे ख़लिश मुझे घेरे
मुझे तनहाई में ही रहने दो
तुम किसी और संग लो फेरे.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० नवंबर २००८
१८९७. न मैं उम्मीद कोई रखता हूँ-- RAS (alternating end clap)
न मैं उम्मीद कोई रखता हूँ
न मैं सपनों में ही विचरता हूँ
जानता हूँ मैं अपनी सीमाएं
झूठे वादे नहीं मैं करता हूँ
जो मिला दे गया मुझे धोखा
कोई क्यों छोड़ता भला मौका
मुझे लू के मिले थपेड़े हैं
न मिला है बहार का झौंका
मैं सदा बन के इक रहा बोझा
दिल कहे सबसे तू अलग हो जा
एक गुमनाम ज़िंदगी कर ले
कहीं सहरा की राह में खो जा
हाल मेरा न पूछना कोई
न ख़बर हो न सूचना कोई
चील, गिद्ध और कौए खा लेंगे
न मेरी लाश फूँकना कोई.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
१० नवंबर २००८
१८९८. अभी थोड़ी सी सांस बाकी है-- RAS (alternating end clap)
अभी थोड़ी सी सांस बाकी है
अभी थोड़ी सी आस बाकी है
दिल की धड़कन मरी नहीं अब तक
अभी तो एहसास बाकी है
और खंजर घुसाओ गहरा तुम
वार फिर से चलाओ लहरा तुम
हाथ क्यों कांपता है ऐ ज़ालिम
इस चमन को बनाओ सहरा तुम
चंद लमहों का मेरा जीना है
आज ये डूबता सफ़ीना है
चार हफ़्ता थी ज़िंदगी मेरी
चुक रहा आज ये महीना है
पर न सोचो कि पार पाओगे
मेरी रूह को न मार पाओगे
कल नये ज़ंग की सुबह होगी
तुम ख़लिश और हज़ार पाओगे.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
११ नवंबर २००८
१८९९. हुआ ज़माना, गुज़र चुके जो वो आज दिन क्यों याद आ रहे हैं--RAS
हुआ ज़माना, गुज़र चुके जो वो आज दिन क्यों याद आ रहे हैं
चेहरे पे जिनके थी मुस्कुराहट, क्यों आज आंसू बहा रहे हैं
सितम ही करना उन्होंने सीखा, ये आज क्या हो गया है उनको
हैं कौन से ग़म जो उनके दिल में हज़ार नश्तर लगा रहे हैं
जिन्हें न मन्दिर न मस्जिदों में, न था भरोसा कुछ मन्नतों में
वही इबादत करो ख़ुदा की, ये पाठ सबको पढ़ा रहे हैं
करम ख़ुदा का हुआ है उन पर जो आज इतने बदल गये हैं
कभी शहन्शाह थे आज ख़ुद को इंसान अदना बता रहे हैं
है शुक्र आये वो रास्ते पर, गुरूर उनका सब उड़ गया है
कभी ख़लिश वो ख़ुद उड़ रहे थे पर फ़ाख़्ता अब उड़ा रहे हैं.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
११ नवंबर २००८
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ई-कविता के दोस्तो,
आप सब का रहमो-करम है कि मेरी शायराना रूह को ज़िंदा रखा और अभी भी मुझे एक अनसोची, अनचाही, अनजानी पर अनमोल मंज़िल की ओर चलने में मदद कर रहे हैं--
इस सफ़र में हो गयीं उन्नीस सदियां ख़त्म अब
कौन जाने क्या खिलाये ग़ुल सदी अब बीसवीं.
--ख़लिश
१९००. नयी पीढ़ी को सलीके लग रहे बेकार अब—RAS—ईकविता, ११ नवंबर २००८
नयी पीढ़ी को सलीके लग रहे बेकार अब
टूटती सी लग रहीं हैं शर्म की दीवार अब
अब नहीं कीमत रही इंसान की दुनिया में कुछ
निरपराधों पर बमों से हो रहे हैं वार अब
कोई क्या दे अब ज़कत दीनो-धरम के नाम पर
लूटने में लग गये मज़हब के ठेकेदार अब
दिन गुज़ारे हैं बहुत रंगीनियों में आज तक
रात अंधेरी मेरी किस्मत में लिखी यार अब
ग़म नहीं इंसां ने तोड़ा है मेरे दिल को ख़लिश
बस गया है मेरे दिल में वो ख़ुदा दिलदार अब.
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
११ नवंबर २००८
००००००००००००००
Monday, 10 November, 2008 9:10 PM
From: "shar_j_n" shar_j_n@yahoo.com
Adarneey Khalish Ji, CONGRATS,will write a proper comment later :)
Rgds...Shardula
००००००००००००००
Monday, 10 November, 2008 10:18 PM
From: "Banwari lal Gaur" blgaur36@yahoo.co.in
dear Maheshji !
bahut dinon se aapki gazlen padh rahan hoon, din pratidin nikhar ke liye badhai .
GAUR.
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