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About my Mother |
| बिलख ना सकीं छोड़ आया वो घर उन सपनों की खातिर जिस हाथ को पकड कर चलना सीखा था लिखना सीखा था छोड़ आया वो दामन खुद चलनें की खातिर छोड़ आया वो आखें जो छलक ना सकीं बिलख ना सकीं छोड आया अपनों को अपनों की खातिर घर छोड जाना क्या किसी " विदाई" से कम था? वो आज तक खोती रहीं मन ही मन रोती रहीं छोड आया वो यादें उन आँसुओं की खातिर घुट-घुट कर रहना उनका किसी सजा से कम था? या उनकी रजा मे दम था जो छोडी़ सारी हसरतें उन हसरतों की खातिर छिन गया सब कुछ फिर भी वो हारी नही आन-मान संभाले रही छोड आया हूँ हार कुछ जीतने की खातिर दुर गर करना ही था तो जन्म क्यूँ दिया? पालन-पोषण कयूँ किया? पर शायद ये दुनिया की रीति है दुर हुई वो भी कभी कुछ रीतों की खातिर कुछ रिवाजों की खातिर..... |