कितना भागती है ये दुनिया सब व्यस्त हैं खुद में ही ठौर नहीं किसी को भी कहीं कितना जागती है दुनिया। सबको अपनी मंजिल पर जाना है ये तेरा-मेरा बस एक बहाना है दुर्बल को दबाकर बढ़ती है आगे कितना डूबकर झगड़ती है ये दुनिया। छल के जल में सरावोर है साथ हो, पर अंदर छुपा चोर है खुशियां जैसे चुभती हों अंतर में कितना तड़पती और तड़पाती है ये दुनिया। जितना दो उतना और मांगे न दो तो गाली और ताने खुद को माटी की मूरत बस समझे भेड़ चाल सी चलती दुनिया। |